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    Home»विशेष»निकाय चुनाव परिणाम: पीठ पर वार और सामने प्यार का हुनर
    विशेष

    निकाय चुनाव परिणाम: पीठ पर वार और सामने प्यार का हुनर

    shivam kumarBy shivam kumarMarch 1, 2026Updated:March 2, 2026No Comments8 Mins Read
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    विशेष
    यह राजनीति है, यहां जीत में भी हार और हार में भी जीत छिपी होती है
    पांव जमीन पर होने चाहिए, जुबान से चुनाव नहीं जीते जाते
    नगर निकाय चुनाव का परिणाम ऐसी कई कहानियां बयां करता है
    चलिए परिणाम जो भी हो एक बार जोर से बोलिये जोगीरा सारारारारा…

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    झारखंड में होली से पहले ही होली मनायी जा रही है। नगर निकाय चुनाव के परिणाम की घोषणा के बाद विजयी प्रत्याशी और उनके समर्थक होली मना रहे हैं। उनके खेमों में जश्न का माहौल है। लेकिन होली के जश्न से इतर इस नगर निकाय चुनाव के परिणाम ने झारखंड की राजनीति के किताब में एक नया पाठ जोड़ा है। यह पाठ किसी उपलब्धि या नुकसान के लिए नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक दलों के लिए है। इस पाठ के अनुसार, झारखंड की राजनीति की जमीन अब बहुत उर्वर हो गयी है। यहां की गांवों की जमीन में रचा-बसा झारखंड मुक्ति मोर्चा अब अपनी जड़ें फैलाने लगा है। उसकी जड़ें शहरों तक पसरने लगी है, जबकि भाजपा की जड़ें फैलने की बजाय सिकुड़ने लगी हैं। यह राजनीति की जमीन के प्रकृति बदलने का स्पष्ट संकेत है। नगर निकाय चुनाव परिणाम ने झारखंड की राजनीति में यह अध्याय जोड़त हुए संकेत भी दे दिया है कि अब केवल जुबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलने वाला है। अब काम करना ही होगा, ताकि जनता का भरोसा और आधार बना रह सके। दोस्तों को पहचानने, दुश्मनों को पहचान कर अलग-थलग करने और पीठ पर वार करनेवालों से सतर्क रहने का दौर अब शुरू हो गया है। यह सीख खास कर भाजपा के लिए है, जिसका झारखंड का शहरी दुर्ग दरक चुका है। रांची और मेदिनीनगर भले ही उसके समर्थित प्रत्याशियों ने जीत ली हो, लेकिन हकीकत यही है कि इसमें उन प्रत्याशियों का निजी प्रभाव बहुत हद तक कारण रहा। झारखंड में भाजपा का शहरी किला ध्वस्त होने का सीधा मतलब यही है कि पार्टी को यहां नये सिरे से काम करना होगा। विचार करना होगा। झारखंड के नगर निकाय चुनाव के परिणाम के क्या हैं मतलब और क्या हैं इसके संदेश, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    झारखंड में नगर निकाय चुनाव संपन्न हो गया है। अब झारखंड की जनता होलियाना मूड में आ चुकी है। जीते हुए प्रत्याशी और उनके समर्थक तो होली से पहले ही रंग-गुलाल एक-दूसरे को लगा रहे हैं और जीत का जश्न मन रहे हैं, रंग-गुलाल उड़ा रहे हैं, वहीं हारे हुए प्रत्याशी और उनके समर्थक मायूस हैं। मंथन कर रहे हैं। हार का कारण तलाश रहे हैं। यह दौर उनका भरोसा तोड़ेगा। अपने ही साथियों पर शक करेगा। लेकिन होली तो वे भी खेलेंगे। गम मिटाने का प्रयास भी करेंगे। कोई दवा का सहारा लेगा, तो कोई दारू का। लेकिन उनकी मुस्कान किसने छीनी, इस पर चर्चा भी करेंगे। होली उनके दुख को कम जरूर कर देगा। लेकिन यह निकाय चुनाव परिणाम कई प्रत्याशियों के लिए सवेरा, तो कइयों के लिए मंथन की घड़ी लेकर जरूर आया है। सिर्फ प्रत्याशी ही नहीं, दलों के लिए भी यह घड़ी आत्ममंथन का है। अपने वजूद का है।
    एक तरफ इस नगर निकाय चुनाव में भाजपा जहां ग्रामीण तो छोड़ ही दीजिये, शहरों में भी सिमटती दिख रही है, तो वहीं झारखंड की माटी की सबसे बड़ी पार्टी, ग्रामीण क्षेत्रों की चहेती, झामुमो अब शहरों में भी अपनी दमदार धमक दे चुका है। यह भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के लिए भी एक संकेत है। झामुमो भले ही क्षेत्रीय पार्टी है। लेकिन जिस तरीके से वह अपनी किलेबंदी को मजबूती दे रहा है, यह दूसरों के लिए सीखने वाली बात है। सीखने वाली बात यह है कि जो मेहनत करेगा, उसे उसका फल जरूर मिलेगा। थोड़े कंधे पर सबको जीवन भर ढोते रहेगा। निकाय चुनाव में भाजपा जहां अति आत्मविश्वास का शिकार होती दिखी, तो वहीं झामुमो ने लो प्रोफाइल मेंटेन करते हुए निकाय चुनाव में कई सीटों पर अपना दबदबा दिखा दिया। देवघर में तो उसने इतिहास ही रच डाला। कांग्रेस भी इस लड़ाई में पीछे नहीं रही। उसने भी अपनी उपस्थ्ति दर्ज करायी है। रांची भाजपा का गढ़ मानी जाती है, लेकिन कांग्रेस भी यहां बहुत पीछे नहीं रही है। उसने भी यहां बेहतरीन प्रदर्शन किया। भले वह चुनाव हार गयी, लेकिन हार का अंतर बहुत नहीं है। मात्र 14 हजार 363 का है। झामुमो अगर रांची से प्रत्याशी नहीं देता, तो शायद यहां का परिणाम कुछ और ही होता। यह तो रोशनी खलखो की अपनी छवि है और उनके काम करने का तरीका, जिसने उन्हें शुरूआती रुझान से ही आगे रखा। रांची को रोशनी पर भरोसा है।

    बिना स्वार्थ के राजनीति कैसी
    निकाय चुनाव दलीय आधार पर तो नहीं हुआ, लेकिन हर दल को अपनी ताकत और उपस्थिति तो दिखानी थी। सिर्फ दल ही नहीं, दल के बागियों को भी अपनी अहमियत बतानी थी। तो सभी कूद पड़े मैदान में। यानी, आ देखें जरा, किसमें कितना है दम। खैर सभी दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों को समर्थन दिया। अंतत: यह समझना होगा कि यह राजनीति का अखाड़ा है। यहां सभी की अपनी-अपनी नीति होती है। अपना-अपना स्वार्थ होता है। बिना स्वार्थ के राजनीति कैसी। सभी ने अपना-अपना दांव चला। कोई साथ में कदम से कदम मिला कर, तो कोई, हम हैं, हम हैं, मुंह से बोल कर। जनता भी तैयार बैठी थी। सब कुछ समझ रही थी। झारखंड ऐसे ही बिहार से अलग थोड़े हुआ है। उसे पता है कि उसके लिए क्या बेहतर है। तो शुरू हुआ खेल। इस चुनाव में यह देखने को मिला कि कई विधायक और सांसद अपने-अपने क्षेत्रों में, अपने ही दल या गठबंधन के साथियों को स्थापित होते नहीं देख सकते। ऊपरी तौर पर भले ही उनकी उंगली प्रत्याशी के पक्ष में दिखायी देती हो, लेकिन आतंरिक तौर पर एक उंगली के अलावा चार उंगली अपनी ही तरफ रही। ‘मैं’, ‘मैं’ ओर ‘मैं’, दूसरा कोई नहीं। मेरे से आगे बढ़ जायेगा। वे भविष्य की राजनीति के बारे में सोच रहे थे। भला कैसे चाहते कि भविष्य में उनका कोई विकल्प अपने ही क्षेत्र से सामने खड़ा हो जाये। पावर सेंटर बंट जाये। इसी सोच ने कई प्रत्याशियों का चुनावी परिणाम बदल दिया। जो जीत का सपना बुने हुए थे, हार में तब्दील हो गया। अब बुरा न मानो होली है, बोलकर सभी गले लगेंगे, ‘लिटिल-लिटिल’ कहकर मन हल्का करेंगे। कहा न कि यह राजनीति है, यहां जीत में भी हार छुपी होती है और हार में भी जीत।

    न गांव के रहे, न ही शहर के
    एक तरफ जहां रांची की जनता ने भाजपा समर्थित रोशनी खलखो को चुना, तो वहीं दूसरी तरफ हजारीबाग की जनता ने नयी उम्मीद अरविंद राणा को तलाशा। एक तरफ मेदिनीनगर की जनता ने फिर से भाजपा समर्थित अरुणा शंकर पर भरोसा जताया, तो वहीं देवघर में भाजपा को भारी निराशा का सामना करना पड़ा। वहां जनता ने झामुमो समर्थित रवि राउत को अपना रहनुमा चुना। भाजपा के लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे का दबदबा यहां काम न आया। तो वहीं गिरिडीह में भी भाजपा चारों खाने चित हो गयी और झामुमो प्रत्याशी प्रमिला मेहरा ने बाजी मार ली। एक तरफ आदित्यपुर की जनता ने भाजपा समर्थित संजय सरदार को चुना, तो पास के मानगो ने कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी और पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता पर भरोसा जताया। धनबाद की बात करें, तो भाजपा से बागी हुए संजीव सिंह को जनता ने अपना आशीर्वाद दिया है, तो भाजपा समर्थित संजीव कुमार अग्रवाल को सिरे से नकार दिया। यहां झामुमो समर्थित और भाजपा से बागी उम्मीदवार चंद्रशेखर अग्रवाल दूसरे नंबर पर रहे। चास से निर्दलीय उम्मीदवार भोलू पासवान ने जीत दर्ज की, तो भाजपा समर्थित उम्मीदवार अविनाश कुमार को हार का मुंह देखना पड़ा। इस जीत और हार में कई कहानियां हैं। भविष्य के कई संकेत छिपे हैं। पीठ पर वार और सामने से प्यार का हुनर भी छिपा है। यह परिणाम बताता है कि पांव जमीन पर होने चाहिए, जुबान से चुनाव नहीं जीते जाते। भाजपा को मंथन करना होगा कि कैसे और क्यों, वह न गांव के रही, न ही शहर की। इस चुनाव में यूजीसी ने भी अपनी भूमिका बांधी। इसका भी असर वोटरों में देखा गया। कई तो घरों में ही रह गये। झामुमो झारखंड में एक अलग राह पकड़ता हुआ दिखायी पड़ता है। पीछे हुए अनुभवों से उसने सीखा है। वह अब अपना विस्तार करना चाहता है और सफलतापूर्वक कर रहा है। कांग्रेस जहां थी, वहीं है। लेकिन बागियों ने अपना लोहा जरूर मनवा लिया है।

    हर शहर अपनी अलग कहानी बयां कर रहे
    नगर निगम चुनावों के परिणाम हर शहर की अपनी अलग कहानी बयां कर रहे हैं। यहां बिसात किसी और ने बिछाई, चाल कोई और चलता रहा, जीत, हार में तब्दील हुई और हार, जीत में। जीता हुआ प्रत्याशी खुद पर गुमान कर रहा और हारे हुए पर कोई और। हजारीबाग में भाजपा के एक बड़े वर्ग की सक्रियता का लाभ किसी और को मिल गया। खुद का प्रत्याशी देवघर में भाजपा के बागी उम्मीदवार ने करीब 14 हजार वोट काट डाले, जिसका फायदा झामुमो को हो गया। यहां जीता कोई, मूंछ पर ताव कोई और दे रहा। मानगो में अल्पसंख्यक मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन निर्णायक रहा। गिरिडीह में मंत्री सुदिव्य कुमार की रणनीति असरदार रही। आदित्यपुर में मजबूत संगठन और कैडर वोट ने भाजपा समर्थित प्रत्याशी को विजय दिला डाली। चास में पूर्व कार्यकाल के कामकाज पर जनता के भरोसे का फायदा मिला। मेदिनीनगर में वोटों के बंटवारे के बावजूद मजबूत कैडर और अपने काम के जरिये भाजपा समर्थित प्रत्याशी ने जीत सुनिश्चित की। चलिए परिणाम जो भी हो एक बार जोर से बोलिये जोगीरा सारारारारा

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