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    Home»विशेष»अमेरिका तय नहीं कर सकता भारत की विदेश नीति
    विशेष

    अमेरिका तय नहीं कर सकता भारत की विदेश नीति

    shivam kumarBy shivam kumarMarch 8, 2026Updated:March 8, 2026No Comments9 Mins Read
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    विशेष
    भारत खुद सक्षम, ट्रंप को कह दो उसका गुलाम नहीं है भारत
    भारत को अब आर्थिक ही नहीं, सैनिक महाशक्ति बनना होगा
    देश में तेजी से लोकप्रिय हो रहे रेवड़ी कल्चर के लोभ को छोड़ना होगा

    तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत के सामने चुनौतियां बढ़ने लगी हैं। घरेलू मोर्चे पर छोड़ भी दिया जाये, तो अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत को अपने करीबी सहयोगी और दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका से ही लगातार झटके दिये जा रहे हैं। पहले अमेरिका ने टैरिफ का डर दिखा कर भारत को रूस से सस्ता तेल खरीदने से रोक दिया और अब उसने भारत को एक महीने तक रूस से तेल खरीदने की मोहलत दी है। इतना ही नहीं, अमेरिका के विदेश उप मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने साफ कहा है कि अमेरिका कभी भी भारत को चीन की तरह विकसित नहीं होने देगा। ईरान के साथ चल रहे युद्ध के कारण अपने ही घर में चौतरफा घिर रहे ट्रंप प्रशासन के इस भारत विरोधी रवैये का स्वाभाविक तौर पर भारत में विरोध हो रहा है, लेकिन इस कड़वाते कूटनीतिक माहौल में यह भी तय करना बेहद महत्वपूर्ण है कि इन परिस्थितियों में भारत के पास क्या विकल्प है और उसके लिए कौन सा रास्ता ठीक रहेगा। आरोप-प्रत्यारोप से परे जाकर अब यह तय करने का समय आ गया है कि भारत अपना रास्ता खुद चुने और उस पर आगे बढ़ने की गति खुद तय करे। इसके लिए अब देश में तेजी से लोकप्रिय हो रही रेवड़ी संस्कृति पर भी सख्ती से रोक लगाना जरूरी हो गया है, ताकि उस पर खर्च होनेवाली रकम का इस्तेमाल बौद्धिक और सैन्य ताकत बढ़ाने में किया जा सके। भारत के पास अब इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है, क्योंकि दुनिया अब पूर्व की तरफ देख रही है। भारत जैसे देश ही दुनिया का नेतृत्व करने के लिए सामने आयेंगे, यह तय हो गया है। यह तय है कि भारत की विदेश नीति अमेरिका तय नहीं कर सकता, तो फिर आगे की राह क्या होनी चाहिए और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    दुनिया में तेजी से बदलते घटनाक्रमों ने भारत को भी एक हद तक प्रभावित किया है। ईरान पर इस्राइल और अमेरिका का हमला और ईरान की जवाबी कार्रवाई ने पूरी दुनिया में अलग किस्म का तनाव कायम कर दिया है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत के सामने चुनौतियां भी बढ़ गयी हैं। भारत के सामने ये चुनौतियां खास कर अमेरिका के बदलते रुख के कारण पैदा हुई हैं। अमेरिका का ट्रंप प्रशासन भारत के प्रति अपने रवैये में लगातार परिवर्तन करता आ रहा है। इस बदलते रवैये का वह छाती ठोक कर एलान भी करता है। उदाहरण के लिए पहले उसने भारत को टैरिफ का डर दिखा कर रूस से सस्ता तेल खरीदने से रोक दिया और अब, जबकि वह खुद ईरान के खिलाफ युद्ध के कारण चौतरफा घिरने लगा है, तो उसने भारत को रूस से तेल खरीदने की अनुमति देने की घोषणा की है। इतना ही नहीं, अमेरिका के विदेश उप मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने तो दिल्ली में कह दिया कि भारत को चीन जैसा बाजार विकसित करने की अनुमति अमेरिका कभी नहीं देगा। अमेरिका का यह रुख भारत के लिए अपमानजनक ही नहीं, उसकी संप्रभुता पर चोट है।

    क्या है भारत की विदेश नीति
    भारत की विदेश नीति हमेशा से उसकी संप्रभुता, राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांतों पर आधारित रही है। समय-समय पर विश्व की महाशक्तियों ने अपने प्रभाव के माध्यम से विभिन्न देशों की विदेश नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश की है, लेकिन भारत उन देशों में से रहा है, जिसने अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक पहचान को बनाये रखा। आज जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है और नयी शक्ति-संतुलन की स्थितियां बन रही हैं, तब यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश भारत की विदेश नीति को प्रभावित या तय कर सकते हैं। इसका सीधा उत्तर है—नहीं।

    भारत का सिद्धांत है रणनीतिक स्वायत्तता
    भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है रणनीतिक स्वायत्तता। यह सिद्धांत कोई नया नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता के बाद से ही भारत की कूटनीति का आधार रहा है। शीत युद्ध के दौर में जब दुनिया दो बड़े गुटों—अमेरिका और सोवियत संघ—में बंटी हुई थी, तब भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया था कि वह किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ेगा। उस समय भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को आगे बढ़ाया और यह संदेश दिया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ही विदेश नीति तय करेगा। गुटनिरपेक्ष आंदोलन केवल एक कूटनीतिक रणनीति नहीं था, बल्कि यह भारत की स्वतंत्र सोच और वैश्विक दृष्टि का प्रतीक था। उस दौर में भी भारत पर विभिन्न प्रकार के दबाव थे, लेकिन उसने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यही परंपरा आज भी जारी है, हालांकि बदलते वैश्विक संदर्भों में इसकी अभिव्यक्ति का स्वरूप कुछ अलग दिखाई देता है।

    भारत की बहुआयामी कूटनीति
    आज की दुनिया शीत युद्ध के दौर की तरह द्विध्रुवीय नहीं है, बल्कि बहुध्रुवीय होती जा रही है। ऐसे में भारत की कूटनीति भी बहुआयामी हो गयी है। भारत एक ओर अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी बनाये हुए है। इसी तरह यूरोप, जापान, आसियान देशों और मध्य-पूर्व के साथ भी भारत के संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की नीति इसका एक बड़ा उदाहरण है। पश्चिमी देशों ने रूस के खिलाफ कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाये और कई देशों पर दबाव भी डाला कि वे रूस से दूरी बनायें। लेकिन भारत ने इस मुद्दे पर संतुलित और स्वतंत्र रुख अपनाया। भारत ने युद्ध का समर्थन नहीं किया, लेकिन उसने रूस के साथ अपने ऊर्जा और रक्षा संबंधों को भी समाप्त नहीं किया। भारत ने बार-बार यह कहा कि संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही इस संकट का समाधान संभव है। इस दौरान अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों की ओर से अप्रत्यक्ष दबाव भी देखने को मिला कि भारत रूस से तेल खरीद कम करे या बंद कर दे। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। एक विकासशील और विशाल आबादी वाले देश के रूप में भारत के लिए सस्ती ऊर्जा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय लिया और रूस से तेल आयात जारी रखा।

    मल्टी अलाइनमेंट कूटनीति
    यह वही नीति है, जिसे आज मल्टी-अलाइनमेंट या बहु-संतुलन की कूटनीति कहा जाता है। भारत अब किसी एक गुट के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय विभिन्न देशों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग करता है। उदाहरण के लिए, भारत चौतरफा सुरक्षा वार्ता (क्वाड्रिलेटरल सिक्यूरिटी डायलॉग) यानी क्वाड के माध्यम से अमेरिका, जापान और आॅस्ट्रेलिया के साथ इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग करता है। वहीं दूसरी ओर वह ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में भी सक्रिय भूमिका निभाता है, जिनमें रूस और चीन जैसे देश भी शामिल हैं। भारत की यह संतुलित कूटनीति उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका को भी दर्शाती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक और सामरिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। जब भारत ने जी-20 की अध्यक्षता संभाली, तब उसने वसुधैव कुटुंबकम के विचार को आगे बढ़ाते हुए वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत किया।

    अमेरिका का बदलता रवैया
    जाहिर है कि भारत के इस बढ़ते वैश्विक प्रभाव ने अमेरिका को बेचैन कर दिया है। उसे लगने लगा है कि भारत लगातार मजबूत हो रहा है, तो उसने तरह-तरह से भारत को परेशान करने की नीति अपनायी। इसलिए अब भारत के लिए इसका जवाब देना जरूरी हो गया है।

    भारत को अपनी ताकत बढ़ानी होगी
    अमेरिकी चुनौती का जवाब देने के लिए अब भारत को अपनी ताकत बढ़ानी होगी। अब केवल आर्थिक ताकत बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि भारत को सैनिक महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही रेवड़ी संस्कृति पर नियंत्रण करना होगा। भारत एक कल्याणकारी राष्ट्र है, लेकिन यह सिद्धांत तब तक ही लागू रह सकता है, जब तक भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप इसी तरह रहे। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत अपने कल्याणकारी सिद्धांत को कुछ समय के लिए छोड़ दे और अपनी ताकत बढ़ाने की तरफ ध्यान दे। अमेरिका निश्चित रूप से दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक है और भारत के साथ उसके संबंध भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए हैं और तकनीकी सहयोग भी बढ़ा है। लेकिन इसके बावजूद भारत ने हमेशा यह स्पष्ट रखा है कि उसकी विदेश नीति किसी बाहरी दबाव से संचालित नहीं होगी। यह भी ध्यान रखना होगा कि आज की वैश्विक राजनीति में किसी भी देश के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहना आसान नहीं है। आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा के कई आयाम ऐसे हैं, जिनमें देशों को एक-दूसरे के साथ सहयोग करना पड़ता है। भारत भी इससे अलग नहीं है। लेकिन सहयोग और निर्भरता में अंतर होता है। भारत सहयोग को स्वीकार करता है, लेकिन निर्भरता को नहीं।
    आज भारत जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में उसकी वैश्विक भूमिका और भी महत्वपूर्ण होगी। आर्थिक विकास, तकनीकी नवाचार और सैन्य क्षमता के साथ-साथ भारत की कूटनीतिक सक्रियता भी बढ़ रही है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि कोई अन्य देश भारत की विदेश नीति तय कर सकता है, वास्तविकता से दूर है। इसलिए यह स्पष्ट है कि अमेरिका सहित कोई भी महाशक्ति भारत की विदेश नीति तय नहीं कर सकती। भारत अपने राष्ट्रीय हितों, वैश्विक जिम्मेदारियों और रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर ही अपने निर्णय लेता है। यही नीति उसे एक आत्मविश्वासी, स्वतंत्र और जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

    भारत का उदय भारत ही तय करेगा: जयशंकर
    भारत का उदय भारत ही तय करेगा, यह हमारी ताकत से तय होगा, न कि दूसरों की गलतियों से। विदेश मंत्री जयशंकर का यह बयान अमेरिकी विदेश उप मंत्री के उस बयान के एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका भारत के साथ व्यापार मामले में दो दशक पहले हुई चीन जैसी गलती नहीं करेगा।

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