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    Home»दुनिया»नेपाल का ‘जेन जी’ आंदोलन: सुशासन की आड़ में संसद फूंकने की थी बड़ी साजिश, मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा!
    दुनिया

    नेपाल का ‘जेन जी’ आंदोलन: सुशासन की आड़ में संसद फूंकने की थी बड़ी साजिश, मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा!

    shivam kumarBy shivam kumarMay 28, 2026No Comments6 Mins Read
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    काठमांडू। नेपाल की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख देने वाले ‘जेन जी (Gen Z) आंदोलन’ को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आई है। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने और देश में सुशासन की मांग को लेकर 8 और 9 सितंबर 2025 को काठमांडू की सड़कों पर जो बवाल हुआ था, वह कोई स्वतःस्फूर्त गुस्सा नहीं था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विस्तृत जांच रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि युवाओं के इस प्रदर्शन की आड़ में देश को हिंसा और आगजनी की भट्टी में झोंकने का एक बेहद खतरनाक और पूर्व-नियोजित षड्यंत्र रचा गया था।

    शांतिपूर्ण प्रदर्शन को ‘हाइजैक’ करने की थी तैयारी मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस आंदोलन के पीछे दो स्पष्ट विचारधारा वाले समूह काम कर रहे थे। पहला समूह जहां सोशल मीडिया पर लगी पाबंदी के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज बुलंद करना चाहता था, वहीं दूसरे समूह की मंशा बेहद खतरनाक थी। इस दूसरे समूह ने बेहद योजनाबद्ध तरीके से पूरे आंदोलन को “हाइजैक” करने की रूपरेखा तैयार की थी। इनका अंतिम मकसद माइतीघर में जुटी युवाओं की भारी भीड़ का फायदा उठाकर नेपाल के संसद भवन और सिंहदरबार जैसी संवेदनशील सरकारी इमारतों में आगजनी करना और देश में अराजकता फैलाना था।

    डिजिटल माध्यमों से रची गई हिंसा की स्क्रिप्ट आंदोलन को हिंसक और विध्वंसात्मक बनाने की यह साजिश जमीनी स्तर पर उतरने से पहले ही डिजिटल स्पेस में शुरू हो चुकी थी। जांच में पाया गया है कि कुछ शरारती तत्वों ने देश के विभिन्न विद्यालयों के डिजिटल बोर्ड और आधिकारिक वेबसाइट्स को हैक कर लिया था। इन हैक किए गए प्लेटफॉर्म्स पर “No more screens, we are on streets” (अब स्क्रीन नहीं, हम सड़कों पर हैं) और “We dont want likes – we want change – 8 September 2025” (हमें लाइक्स नहीं, बदलाव चाहिए) जैसे भड़काऊ नारे प्रदर्शित किए गए थे, ताकि छात्रों को उकसाया जा सके।

    इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि प्रदर्शन से ठीक एक दिन पहले, यानी 7 सितंबर को “Wake Up Nepal” नाम के एक टिकटॉक अकाउंट से एक वीडियो जारी किया गया। इसमें खुलेआम अपील की गई थी कि “कल के प्रदर्शन में कुछ भी हो सकता है, इसलिए सभी लोग मोलोटोव कॉकटेल (पेट्रोल बम) के साथ तैयार रहें।” इसके साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से नेपाल के संसद भवन और सिंहदरबार को जलते हुए दिखाने वाली फर्जी तस्वीरें और वीडियो पहले ही बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए गए थे। यह इस बात का पुख्ता सबूत है कि प्रदर्शनकारियों के दिमाग में पहले से ही विध्वंस का खाका खींच दिया गया था।

    मासूम छात्रों को ‘मानव ढाल’ बनाने की घिनौनी साजिश मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में एक और बेहद संवेदनशील और गंभीर पहलू का खुलासा हुआ है। सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस को पंगु बनाने के लिए आंदोलन के रणनीतिकारों ने स्कूली छात्रों को “मानव ढाल” के रूप में इस्तेमाल करने की साजिश रची थी। इसके लिए बाकायदा ‘नेपाल पुलिस’ के नाम से एक फर्जी फेसबुक पेज बनाया गया। इस पेज के जरिए यह अफवाह फैलाई गई कि यदि छात्र अपनी स्कूल यूनिफॉर्म (वर्दी) पहनकर प्रदर्शन में आएंगे, तो पुलिस उनके खिलाफ बल प्रयोग या लाठीचार्ज नहीं कर पाएगी। इस झांसे में आकर बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे प्रदर्शन का हिस्सा बन गए, जिससे सुरक्षाकर्मी भी पशोपेश में पड़ गए। सुरक्षा बलों के आधिकारिक बयानों के आधार पर आयोग ने इस तथ्य की पुष्टि की है।

    मेडिकल की ‘अडवांस तैयारी’ ने खड़े किए सवाल रिपोर्ट के अनुसार, “हामी नेपाल” नामक संस्था के पदाधिकारी सुदन गुरूंग, अंकित मल्ल और खेमराज साउद ने जिला प्रशासन कार्यालय से केवल 500 से 800 लोगों की उपस्थिति का अनुमान जताकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति ली थी। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही माइतीघर मंडला में प्राथमिक उपचार के लिए बड़े-बड़े टेंट, स्वास्थ्य स्वयंसेवक और तीन एम्बुलेंस तैनात कर दी गई थीं। आयोग ने इस अति-सक्रियता को बेहद संदिग्ध माना है।

    8 सितंबर की सुबह जब आंदोलन के मुख्य चेहरे रक्षा बम और जस्मिन ओझा अपने समूह के साथ मौके पर पहुंचे, तो वे भी इतनी बड़ी मेडिकल तैयारी देखकर चौंक गए। उन्होंने सुदन गुरूंग से सीधे सवाल किया कि “जब प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण होना है, तो युद्ध स्तर पर चिकित्सा व्यवस्था क्यों की गई है?” हालांकि, सुदन गुरूंग इसका कोई तार्किक जवाब नहीं दे सके।

    ‘TOB’ गैंग की एंट्री और भड़की हिंसा सुबह करीब साढ़े 10 बजे माइतीघर से शुरू हुआ यह मार्च देखते ही देखते बेकाबू हो गया। प्रशासन द्वारा तय किए गए दायरे को लांघते हुए भीड़ बबरमहल के रास्ते नया बानेश्वर स्थित एवरेस्ट होटल के सामने पहुंच गई। कुछ ही समय में यह भीड़ करीब 25 हजार लोगों में तब्दील हो गई। इसी बीच, अचानक काले रंग की टी-शर्ट पहने और शरीर पर “TOB” नाम का टैटू गुदवाए 15 से 20 बाइक सवारों का एक रहस्यमयी समूह भीड़ के बीच दाखिल हुआ।

    दोपहर करीब 12 बजे सुदन गुरूंग के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बैरिकेड्स को तोड़ना शुरू कर दिया और प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने का प्रयास किया। जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो सुरक्षा बलों पर भारी पथराव किया गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को मजबूरन आंसू गैस के गोले और वाटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा। इसके बाद भीड़ और उग्र हो गई। हिंसक तत्वों ने संसद भवन के गेट नंबर 1 पर हमला बोल दिया, सशस्त्र पुलिस के वाटर कैनन वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया और यहां तक कि मानवाधिकार आयोग की निगरानी टीम की गाड़ियों और एम्बुलेंस में भी तोड़फोड़ कर आग लगा दी।

    आयोजकों पर गिरेगी गाज, जांच जारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने निष्कर्ष में स्पष्ट किया है कि भले ही आंदोलन की शुरुआत सुशासन के नाम पर हुई थी, लेकिन इसे “TOB” समूह ने पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया था। आयोग ने कहा है कि जब आंदोलन हिंसक रूप ले रहा था, तब मुख्य आयोजकों ने घुसपैठियों को रोकने या स्थिति को संभालने का कोई प्रयास नहीं किया। इसलिए, इस हिंसा में हुई जनधन की भारी क्षति की मुख्य जिम्मेदारी आयोजकों की ही बनती है। इसके साथ ही आयोग ने सरकार को निर्देश दिया है कि “TOB” लिखे टी-शर्ट और टैटू वाले बाइकर्स कौन थे और वे किसके इशारे पर नेपाल को सुलगाने आए थे, इसकी उच्च स्तरीय गहन जांच की जाए।

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