मेदिनीनगर: झारखंड के पलामू जिले के मेदिनीनगर स्थित बंगीय दुर्गाबाड़ी में दुर्गापूजा के अवसर पर मां दुर्गा का दरबार सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया गया है। श्रद्धालुओं की ओर से मन्नत पूरी होने पर मां को चढ़ाए गए आभूषणों से देवी का भव्य शृंगार किया जाता है। यहां पिछले 112 वर्षों से बंगाली परंपरा के अनुसार दुर्गापूजा मनाई जा रही है।
7 से 8 किलो सोने-चांदी के आभूषणों से शृंगार
दुर्गाबाड़ी पूजा समिति से जुड़े सैकत चटर्जी के अनुसार, इस वर्ष मां दुर्गा को लगभग 7 से 8 किलोग्राम सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया गया है। इनमें सोने की आंखें, बिंदी, नथ और चूड़ियों के साथ चांदी के हार, सीता हार, मांगटीका, कमरबंद, बाजूबंद, पायल और अन्य आभूषण शामिल हैं। इस बार भक्तों द्वारा पहले दान किए गए आभूषणों को पिघलाकर तैयार किया गया मां का मुकुट भी आकर्षण का केंद्र है।
चार पीढ़ियों से चली आ रही शृंगार की परंपरा
बंगीय दुर्गाबाड़ी में मां दुर्गा की प्रतिमा का शृंगार विशेष परंपरा के तहत किया जाता है। आयोजक राजीव मुखर्जी के मुताबिक, पिछले चार पीढ़ियों से सुकुमार इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। षष्ठी की रात मां का विशेष शृंगार किया जाता है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर मां को सोने-चांदी के आभूषण अर्पित करते हैं।
चक्षुदान की रस्म रहती है खास आकर्षण
यहां दुर्गापूजा के दौरान चक्षुदान की रस्म भी विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि मां की आंखें तैयार होने के बाद प्रतिमा का स्वरूप जीवंत प्रतीत होता है और भक्तों को ऐसा अनुभव होता है, मानो मां उन्हें देख रही हों। विसर्जन से पहले मां की प्रतिमा के भाव और आंखें श्रद्धालुओं को भावुक कर देती हैं।
बैंक लॉकर में सुरक्षित रखे जाते हैं आभूषण
श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए आभूषणों को सालभर बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है। दुर्गापूजा की षष्ठी तिथि पर इन्हें निकालकर मां का शृंगार किया जाता है। दशमी के दिन विसर्जन से पहले सभी आभूषणों की गिनती कर रजिस्टर में विवरण दर्ज किया जाता है और फिर उन्हें बैंक लॉकर में जमा कर दिया जाता है। सुरक्षा के लिए दुर्गाबाड़ी परिसर में सीसीटीवी कैमरे और बैरिकेडिंग की व्यवस्था भी की जाती है।
बंगाली संस्कृति और आस्था का अनूठा संगम
मेदिनीनगर की बंगीय दुर्गाबाड़ी में आयोजित दुर्गापूजा बंगाली संस्कृति, परंपरा और श्रद्धा का अनूठा उदाहरण है। 112 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा न केवल बंगाली समुदाय, बल्कि दूसरे समुदायों के श्रद्धालुओं को भी आकर्षित करती है।
