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    Home»देश»प्रवासियों का दर्द : कौन जाए लौटकर उस परदेेेेस, जहां कई रातें गुजरी खाली पेट
    देश

    प्रवासियों का दर्द : कौन जाए लौटकर उस परदेेेेस, जहां कई रातें गुजरी खाली पेट

    shivam kumarBy shivam kumarJune 18, 2020No Comments3 Mins Read
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    दिल में दर्द और आंखों में आंसू लिए प्रवासियों के घर वापसी का सिलसिला लगातार जारी है। अब असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों से बड़ी संख्या में कामगार अपने घर को लौट रहे हैं। अपने गृह जनपद में ट्रेन से उतरते ही यह लोग जहां घर वापसी की व्यवस्था करने के लिए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को धन्यवाद दे रहे हैं। वहीं, प्रवास के लिए गए राज्य सरकारों को जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं। प्रवासी कामगारों के मन में वहां की राज्य सरकार के प्रति काफी आक्रोश है, सिर्फ सरकार ही नहीं, फैक्ट्री मालिकों और स्थानीय लोगों के प्रति भी यह अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं। देशव्यापी लॉकडाउन के बाद दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कोलकाता आदि शहरों से तो बड़ी संख्या में लोग पैदल ही वापस अपने गांव आ गए। लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों से आने का सिलसिला रेलवे द्वारा 05646 गुवाहाटी-लोकमान्य तिलक टर्मिनल स्पेशल एक्सप्रेस के चलने के बाद शुरू हुआ।

    सप्ताह में दो दिन गुरुवार और सोमवार को आने वाली इस ट्रेन से बेगूसराय तथा बरौनी जंक्शन पर सैकड़ों लोग उतर रहे हैं। इसमें बेगूसराय, समस्तीपुर, दरभंगा और मुजफ्फरपुर तक के प्रभाती शामिल हैं। गुरुवार को सुबह ठीक 8:50 बजे जब ट्रेन बेगूसराय स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर रुकी तो उतरने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। गुवाहाटी, अगरतला, मणिपुर, दिसपुर, बोंगाईगांव, कोकराझार, न्यू जलपाईगुड़ी आदि से आए तीन सौ से अधिक लोग यहां उतरे। आने वालों में दर्जनों लोग सपरिवार आए हैं और अब वहां लौटकर नहीं जाएंगे। स्टेशन पर उतर कर रोसड़ा जाने के लिए बस का इंतजार कर रहे रामकिशुन राय, सुखदेव राय, लालू महतों, विपिन महतों, सुगिया देवी, रीना देवी आदि ने बताया कि बिहार में काम नहीं मिलने के कारण हम सब परदेस में जाकर मेहनत मजदूरी करते थे। लेकिन यह नहीं पता था कि ऐसी आफत आएगी और मुश्किल समय में परदेस के पड़ोसी दुश्मन बन जाएंगे। वहां जिस कंपनी में काम करते थे, उसने भी तुरंत किनारा कर लिया। राज्य सरकार ने घर वापसी का कोई जुगाड़ नहीं किया, मकान मालिक हेय दृष्टि से देखते थे। बिहार के रहने वाले सैकड़ों लोगों को कई रातें खाली पेट गुजारनी पड़ी, छोटे बच्चे दूध के लिए परेशान हो जाते थे, लेकिन कोई देखने वाला नहीं था। बाहर निकलते थे तो पुलिस लाठी लेकर खदेड़ती थी, खाने-पीने के सामान का दाम दोगुना हो गया था। घर वापस होने का भी कोई जुगाड़ नहीं लग रहा था, कोई गाड़ी वाला आने के लिए तैयार नहीं था, ट्रक वाले आने के लिए तैयार होते थे तो मनमाना किराया मांग रहे थे। जिसके कारण हम लोग किसी तरह दिन गुजारते रहे, वह तो भला हो मोदी सरकार का, जिसने हम सबका दुख-दर्द समझा और स्पेशल ट्रेन चलाई गई। लेकिन ट्रेन से आने में भी काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा, मोबाइल से टिकट बुक नहीं हो पा रहा था। वहां के जो साइबर कैफे वाले टिकट काटते थे, उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति पांच सौ रुपए तक अधिक वसूला। अब इतनी जलालत झेलकर भला कौन जाए परदेस। वहां जाकर हमने उन्हें बनाया, लेकिन अब कंगाल होकर घर लौट रहे हैं। अपने जन्मभूमि में ही रहना है, यहीं खुरपी चलाएंगे, यहीं कुदाल चलाएंगे, मजदूरी करेंगे, बेगारी करेंगे, लेकिन लौटकर नहीं जाना है।
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