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    Home»Breaking News»यह एक आइपीएस की पीड़ा नहीं, अनुशासनहीनता है
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    यह एक आइपीएस की पीड़ा नहीं, अनुशासनहीनता है

    azad sipahiBy azad sipahiAugust 15, 2020Updated:August 15, 2020No Comments5 Mins Read
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    सिस्टम के लिए खतरनाक है जामताड़ा एसपी का रवैया’यह केवल क्षेत्राधिकार या दो राज्यों के बीच का मामला नहीं

    स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीन अंगों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में से यदि कोई भी बेपटरी होने लगे, तो यह खतरनाक हो सकता है। जामताड़ा के एसपी अंशुमन कुमार द्वारा हाल में की गयी टिप्पणियां इसी खतरे की ओर संकेत करती हैं। इस आइपीएस अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से जो कुछ कहा है, वह उनकी पीड़ा नहीं, बल्कि घोर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। इस अधिकारी ने न केवल भारतीय शासन व्यवस्था पर सवाल उठाये हैं, बल्कि उस शपथ का भी उल्लंघन किया है, जिसे लेकर वह भारतीय पुलिस सेवा में आये हैं। आखिर इस आइपीएस अधिकारी को इतना कुछ कहने की जरूरत क्यों पड़ी और वह साबित क्या करना चाहते हैं, यह गहन जांच का विषय हो सकता है। देश की सबसे कठिन प्रतियोगिता परीक्षा पास कर आइपीएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा में शामिल होने के सात साल बाद अंशुमन कुमार की टिप्पणियों से नौकरशाही में बवंडर उठना स्वाभाविक तो है, लेकिन इसे हल्के में लेना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है, क्योंकि सिस्टम का अंग ही यदि सिस्टम पर सवाल उठाने लगे, तो फिर इसका सुचारू रूप से चलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आखिर अंशुमन कुमार की इन टिप्पणियों के मतलब क्या हैं और इनका नौकरशाही पर क्या असर पड़ेगा, इन सवालों की पड़ताल करती आजाद सिपाही ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।

    आजाद भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जब नौकरशाही को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का फौलादी कवच करार दिया था, तब शायद उन्होंने यह नहीं सोचा था कि कभी यह कवच खुद को ही निगलने के रास्ते पर बढ़ चलेगा। जामताड़ा के एसपी अंशुमन कुमार ने ठीक यही काम किया है। उन्होंने भारतीय शासन व्यवस्था और वर्तमान सिस्टम पर जिस तरह के सवाल उठाये हैं, वे किसी बौद्धिक परामर्श के विषय तो हो सकते हैं, लेकिन एक नौकरशाह के लिए बेहद आपत्तिजनक हैं। ये टिप्पणियां इसलिए भी अनुचित हैं, क्योंकि खुद अंशुमन कुमार उसी संविधान और नियम-कानून का पालन करने की शपथ लेकर इस सेवा में आये हैं।

    नौकरशाही की सर्वाधिक लोकप्रिय परिभाषाओं में मैक्स वेबर की परिभाषा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें कहा गया है कि नौकरशाही प्रशासन की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें विशेषज्ञता, निष्पक्षता तथा मानवता का अभाव होता है। वर्तमान भारतीय व्यवस्था में यह परिभाषा अपवादों को छोड़ कर सटीक बैठती है। और जब अंशुमन कुमार जैसे नौकरशाहों की तरफ से इस तरह की टिप्पणियां आती हैं, तब तो मैक्स वेबर की परिभाषा अक्षरश: सही साबित होती है।

    कल्पना कीजिये कि एक शख्स, जिसने इस देश की सबसे कठिन प्रतियोगिता परीक्षा पास की हो और जिसके पास एक जिले की पुलिस की कमान हो, वह उसी व्यवस्था को गलत बता रहा है, जिसे बनाये रखने की शपथ उसने ली है। अंशुमन कुमार को इस बात से शिकायत है कि उनके जिले का उपायुक्त, जो किसी जिले का प्रशासनिक प्रमुख होता है, उनसे जूनियर है। वह उपायुक्त और जिलाधिकारी के पद को ही बेकार और अनुपयोगी बता देते हैं। ऐसा लिखते समय अंशुमन कुमार यह भूल जाते हैं कि जिस संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर वह आइपीएस बने, उसी आयोग की परीक्षा पास कर वह व्यक्ति आइएएस बना है। इसके अलावा उसे सरकार ने उपायुक्त बनाया है। अंशुमन कुमार को यह भी समझना चाहिए कि उनके पास अपनी शिकायतों के निवारण के लिए कैट जैसे न्यायाधिकरण का विकल्प है। यदि उन्हें शिकायत थी, तो वह इन विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते थे। अंशुमन कुमार को यह भी समझना चाहिए कि कोई व्यक्ति चाहे कितना भी तेज-तर्रार क्यों न हो, यदि वह अनुशासित नहीं है, तो उसकी सारी तेजी बेकार हो जाती है।

    वैसे भारत में नौकरशाहों के बगावती तेवर नये नहीं हैं। हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में टॉपर रहे शाह फैसल ने इस्तीफा दिया था, क्योंकि उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर के साथ नाइंसाफी हो रही है। इसी तरह आइएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने भी इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि उनके मुताबिक देश में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। झारखंड में इससे पहले भी कई नौकरशाहों ने अपनी व्यथा सार्वजनिक मंचों पर व्यक्त की है, लेकिन किसी ने व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाया, क्योंकि ऐसे अधिकारी जानते हैं कि वे उसी व्यवस्था के अंग हैं।

    अब लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि सिस्टम को कठघरे में खड़ा करनेवाले ऐसे अधिकारी के साथ क्या बर्ताव किया जायेगा। अंशुमन कुमार इतने भोले तो हो नहीं सकते कि उन्हें इन टिप्पणियों के परिणामों के बारे में जानकारी नहीं होगी। उन्होंने कानून की किताबें पढ़ी होंगी और आइपीएस अधिकारी के अधिकार और कर्तव्य से भली-भांति परिचित होंगे।

    तभी तो ट्वीट कर विवाद पैदा करने के बाद उन्होंने अपना अकाउंट ही बंद कर दिया, ताकि अदालत में खुद को पाक-साफ साबित कर सकें। अंशुमन कुमार ने अपना ट्विटर अकाउंट बंद कर यही साबित किया है कि वह व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और उसे खरी-खोटी सुनाने के बावजूद उसका अंग बने रहना चाहते हैं। ऐसा अधिकारी, जिसके कंधे पर आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी हो, कभी भी खतरनाक हो सकता है। अपनी टिप्पणियों के कारण वह विवादों में आ चुके हैं और इस स्थिति में उन पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता है। इसलिए व्यवस्था बनाये रखने और पुलिस तंत्र के प्रति लोगों का भरोसा कायम रखने के लिए सरकार को कुछ कड़े फैसले लेने होंगे। इन फैसलों से अंशुमन कुमार जैसे बागी अधिकारियों के हौसले पस्त होंगे, क्योंकि बगावत से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपनी टिप्पणियों से नौकरशाही में हड़कंप मचानेवाले इस आइपीएस अधिकारी के साथ क्या सलूक किया जाता है। हालांकि यहां यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि झारखंड को ऐसे अधिकारी की सेवाओं की जरूरत नहीं है, क्योंकि अनुशासनहीनता बाद में अव्यवस्था को जन्म देती है, जिसका बोझ झारखंड नहीं ढो सकता।

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