आजाद सिपाही
कोरोनाकाल में लगातार बंद चल रहे स्कूलों पर मनमानी और अवैध फीस वसूली का आरोप लगाते हुए पैरेंट्स ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि स्कूल बिना बच्चों को पढ़ाए अवैध फीस वसूल रहे हैं। पूरे राज्य में अभिभावकों और उनके बच्चों का मानसिक उत्पीड़न हो रहा है। अवैध वसूली पर रोक लगाने और उचित फीस निर्धारण के लिए हाईकोर्ट से न्याय की गुहार लगाई गई है। याचिका पर सुनवाई 25 जून को होगी।
जब कुछ किया ही नहीं तो फीस कैसी
यह याचिका मुरादाबाद पैरेंट्स ऑफ आल स्कूल एसोसिएशन के सदस्यों (अनुज गुप्ता एवं अन्य) द्वारा दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 2020-2021 व संपूर्ण कोरोना काल में निजी स्कूल मनमानी और अत्यधिक स्कूल फीस वसूल रहे हैं। बार-बार एसएमएस व फोन कर अभिभावकों व बच्चों का मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है। कोरोना के कारण स्कूल बंद हैं और उनके द्वारा कोई भी सेवा प्रदान नहीं की गई। ऐसे में उस काल की फीस कैसे वसूली जा सकती है?
पैरेंट्स का कहना है कि ऑनलाइन पढ़ाई ठीक से नहीं हुई है।
8 तरह की फीस ले रहे स्कूल संचालक
1. ट्यूशन फीस
2. एग्जाम फीस
3. स्पोर्ट्स
4. साइंस लैबोरेटरी
5. लाइब्रेरी
6. कंप्यूटर
7. एनुअल फंक्शन
8. ट्रांसपोर्ट फीस
अभिभावकों की समस्याओं के निवारण के लिए नहीं कोई समिति
अधिवक्ता शाश्वत आनंद व अंकुर आज़ाद के माध्यम से दायर याचिका में बताया गया है कि राज्य सरकार द्वारा यूपी स्व-वित्तपोषित स्वतंत्र स्कूल (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2018, निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों पर लागू होता है। यह नियम ऐसे शिक्षण संस्थानों द्वारा फीस की अनुचित मांगों पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया है।
इस अधिनियम की धारा 8 में निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा ली जाने वाली फीस को विनियमित करने और उसके संबंध में छात्रों अभिभावकों की शिकायतों को सुनने के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में ‘जिला शुल्क नियामक समिति’ के गठन का प्रावधान है। हालांकि, आज तक प्रदेश में निजी स्कूलों के शुल्क विनियमन व अभिभावकों की समस्याओं के निवारण के लिए शायद ही ऐसी कोई समिति बनाई गई है।
राज्य सरकार ने केवल ट्यूशन फीस लेने का दिया है आदेश
इस अधिनियम की धारा 4 (3), जोकि 17 जून, 2020 के एक अध्यादेश (अब संसोधन अधिनियम) के माध्यम से शामिल की गई है। इसके तहत राज्य सरकार मान्यता प्राप्त स्कूलों द्वारा ली जा रही फीस को दैवीय आपदा, महामारी के समय माफ किया जा सकता है।
गौरतलब है कि बीते दिनों राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर ये आदेश दिया है कि कोई भी निजी स्कूल ट्यूशन फीस के अलावा और कोई फीस नहीं लेगा। इसमें एग्जाम फीस, स्पोर्ट्स, साइंस लैबोरेटरी, लाइब्रेरी, कंप्यूटर, एनुअल फंक्शन व ट्रांसपोर्ट फीस आदि शामिल हैं। इन्हें माफ करने का आदेश दिया गया था। इसके बाद भी निजी स्कूल नहीं मान रहे हैं। राज्य सरकार के आदेश को दरकिनार कर मनमानी फीस वसूल रहे हैं।
स्कूलों ने राज्य सरकार के आदेशों को ठेंगा
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सभी स्कूल लंबे समय से बंद हैं। कुछ स्कूलों में नाम के लिए ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। परीक्षाएं भी फिजिकली नहीं हो रही हैं। इसके बाद भी निजी स्कूल राज्य सरकार के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। यही नहीं राज्य सरकार आपने आदेश को सुचारु ढंग से लागू भी नहीं करवा पा रही है।
राज्य सरकार की उदासीनता का उठा रहे फायदा
याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार की निष्क्रियता के कारण, मुरादाबाद जिले व प्रदेशभर में शायद ही कोई ऐसा स्कूल है जो अभिभावकों और बच्चों को पूरी फीस के लिए परेशान न कर रहा हो। अधिकांश निजी स्कूलों ने अलग से ट्यूशन फीस नहीं दिखाया है। सभी हेड की फीस को एक ही जगह कम्पोजिट फीस / समग्र शुल्क में समाहित कर दिया है। इस प्रकार निजी स्कूल न सिर्फ राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देशों का मजाक उड़ा रहे हैं, बल्कि 2018 के शुल्क विनियमन अधिनियम के जनादेश का भी घोर उल्लंघन कर रहे हैं। यह अमानवीय और अनैतिक है।
स्कूल नाम काटा रहे और ऑनलाइन क्लास से भी बाहर कर रहे
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जो अभिभावक फीस नहीं दे पा रहे हैं उनके बच्चों को न तो ऑनलाइन क्लास में बैठने दिया जा रहा है और न ही उन्हें परीक्षा में बैठने दे रहे हैं। इसके अलावा उच्च कक्षाओं में प्रोन्नत भी नहीं किया जा रहा है। कई स्कूल तो गरीब बच्चों का नाम भी काट दे रहे हैं।
बढ़ रहा ऑनलाइन ट्यूशन का बोझ
ऐसे हालात में अभिभावकों को आनलाइन क्लास के लिए लैपटॉप, टेबलेट या समर्टफोने का खर्च करना पड़ रहा है। महंगे इंटरनेट कनेक्शन मजबूरी हो गया है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य, व अन्य फैसलों का हवाला देते हुआ कहा गया है कि निजी स्कूलों में मुनाफाखोरी रोग बन गया है। न्यायलय जनता के हित में हस्तक्षेप कर अभिभावकों के पक्ष में शुल्क विनियमन का आदेश दे सकता है।