आज से तीन दशक पहले जब झारखंड आंदोलन उफान पर था, आॅल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन या आजसू को इस आंदोलन का युवा चेहरा माना जाता था। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद 19 साल में इस संगठन के राजनीतिक अवतार ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन इसने अपनी पहचान को कभी नेपथ्य में नहीं जाने दिया। संघर्ष और प्रतिबद्धता की बदौलत इसने हर दिन राजनीति का नया मुकाम हासिल किया है। स्पष्ट विजन, मुद्दों की समझ और जनता के बीच जाकर राजनीति करने का माद्दा रखनेवाले आजसू को आज झारखंड की बड़ी ताकत माना जाता है, तो इसके पीछे इसके नेताओं-कार्यकर्ताओं का बलिदान शामिल है। झारखंड बनने के बाद महज दो विधानसभा सीटों से चुनावी राजनीति करनेवाली इस पार्टी ने आज राज्य की कम से कम 20 सीटों पर अपना जनाधार बना लिया है। इन सीटों पर आजसू चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में है। यही कारण है कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी अपने इस सहयोगी पर आंख बंद कर भरोसा करती है, उसे अपनी कामयाबी के सफर का हमसफर बताती है। आजसू के इस विस्तार के पीछे पार्टी नेतृत्व का बड़ा हाथ माना जाता है। आखिर आजसू ने ऐसा क्या किया कि झारखंड के सबसे पुराने और ताकतवर राजनीतिक दल झामुमो को रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ रहा है। आजसू के विस्तार के कारणों की पड़ताल करती आजाद सिपाही पॉलिटिकल ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।