झामुमो को रक्षात्मक रुख अपनाने पर कर दिया है मजबूर
15 नवंबर, 2000 से पहले आॅल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को महज झारखंड आंदोलन का छात्र-युवा संगठन माना जाता था, लेकिन दो दशक में ही इस संगठन ने न केवल खुद को राजनीति का मजबूत खिलाड़ी साबित कर दिया है, बल्कि 17वीं लोकसभा में अपनी मौजूदगी भी दर्ज करा दी है। वर्ष 1986 में जमशेदपुर में स्थापित इस संगठन की नींव असम के छात्र संगठन आॅल असम गण परिषद (अगप) की तर्ज पर डाली गयी थी, हालांकि उस समय किसी ने इस बात की कल्पना नहीं की थी कि आजसू कभी झारखंड की राजनीति में एक बड़ा हस्ताक्षर साबित होगा।
लेकिन तमाम उतार-चढ़ावों और राजनीतिक झंझावातों को झेलते हुए आजसू ने दो दशक के भीतर ही झारखंड की राजनीति के पटल पर एक नयी इबारत लिखने में सफलता हासिल कर ली है।
आक्रामक राजनीति है सक्सेस मंत्र
यदि आजसू की राजनीति की समग्र समीक्षा की जाये, तो यह बात आसानी से कही जा सकती है कि सुदेश महतो के नेतृत्व में आजसू ने हमेशा आक्रामक राजनीति को तरजीह दी है। पिछले 19 साल में अधिकांश समय सरकार का हिस्सा रहने के बावजूद आजसू ने जनता से जुड़े मुद्दों से खुद को कभी अलग नहीं रखा। पार्टी ने जन मुद्दों के प्रति हमेशा प्रतिबद्धता रखी और सीधे जनता के बीच जाने का माद्दा दिखाया, जो झारखंड की राजनीति के लिए नयी चीज थी। झामुमो के संस्थापकों, खास कर शिबू सोरेन ने जिस तरह सूदखोरों और महाजनों के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया था, लगभग उसी तर्ज पर आजसू नेतृत्व ने झारखंड के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर संघर्ष किया। यह संघर्ष इतना प्रभावी हुआ कि आज आजसू के कार्यक्रमों में 40-50 हजार महिलाओं की भागीदारी आम हो गयी है।
क्षेत्रीय दलों की नकारात्मक छवि को तोड़ा
झारखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की छवि बहुत अच्छी नहीं रही है। चाहे झारखंड पार्टी हो या झामुमो या कोई और दल, ये कभी भी अकेले चुनावी मैदान में सफल नहीं हो सके। इन दलों ने हमेशा नकारात्मक मुद्दों को ही तरजीह दी और अपनी राजनीति को चमकाने का उद्देश्य पूरा करने में लगे रहे। इसके विपरीत आजसू ने हमेशा सकारात्मक मुद्दों पर ही राजनीति की। तात्कालिक चुनावी लाभ की बजाय इसने दूरगामी असर का आकलन किया, अपनी ताकत को संगठित किया और फिर एकजुट होकर संघर्ष किया। आजसू को इसका लाभ उसे बाद में मिला।
चुनावी जीत-हार को हावी नहीं होने दिया
आजसू की राजनीतिक कामयाबी का एक बड़ा कारण यह रहा कि उसने चुनावी जीत-हार को कभी पार्टी के मनोबल पर हावी नहीं होने दिया। यह आजसू में ही संभव हुआ कि अपने अध्यक्ष की लगातार चुनावी हार ने भी पार्टी को बिखरने नहीं दिया। अपने गृह क्षेत्र सिल्ली से लगातार दो बार विधानसभा का चुनाव हारने के बावजूद सुदेश महतो ने पार्टी के साथ-साथ अपना हौसला भी बनाये रखा। लोहरदगा में कांग्रेस से हारने के बावजूद आजसू पर निराशा हावी नहीं हो सकी।
आज की चुनावी राजनीति में जहां चुनावी हार बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों को हताशा के गर्त में धकेल देती है और सफलता उनके सिर चढ़ कर बोलने लगती है, आजसू ने दोनों ही परिस्थितियों में संयम बनाये रखा। यह अलग किस्म की राजनीति है।
सहयोगी होने का भरोसा कायम रखा
आजसू की राजनीति में भरोसे का अहम रोल है। पार्टी ने कभी अपने सहयोगियों का हाथ नहीं छोड़ा और न कभी इसकी कोशिश ही की। लोकसभा चुनाव में आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो ने भाजपा की जीत के लिए जिस तरह पूरी पार्टी को लगातार सक्रिय रखा, वह आज की राजनीति में कम ही देखने को मिलता है। आजसू केवल गिरिडीह में लड़ रहा था, लेकिन पार्टी पूरे राज्य में सक्रिय थी। इसलिए भाजपा की कामयाबी में आजसू की बड़ी भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है।
लगातार जारी रहा विस्तार का दौर
आजसू की एक खासियत यह भी रही कि उसने अपने विस्तार के दौर को कभी थमने नहीं दिया। पार्टी ने हमेशा खुद को जनता से जोड़े रखा। चाहे सिल्ली हो या रामगढ़, गोमिया हो या डुमरी, लोहरदगा हो या गिरिडीह, संथाल हो या कोल्हान, आजसू के लोग लगे रहे, जूझते रहे। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पार्टी कार्यकर्ता निराश नहीं हुए। जनसंपर्कों और अपने व्यवहार से उन्होंने इलाके में अपनी मौजूदगी बनाये रखी। इससे पार्टी के जनाधार में विस्तार होता रहा। इस विस्तार ने ही झामुमो की आक्रामकता को लगभग खत्म कर दिया है।
क्या है विधानसभा चुनाव की रणनीति
आजसू इस बार पूरी मजबूती से विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। उसका भाजपा के साथ तालमेल होना निश्चित है। इसके साथ ही यह भी तय है कि आजसू कम से कम 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा। हालांकि पार्टी ने 20 सीटों पर लड़ने की तैयारी की है। अब देखना यह है कि भाजपा के 65 प्लस के लक्ष्य को हासिल करने में आजसू के विस्तार का कितना योगदान होता है।