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    बार-बार हारी हुई बाजी ही क्यों खेलती है कांग्रेस

    azad sipahiBy azad sipahiOctober 10, 2021No Comments6 Mins Read
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    कांग्रेस को झटका : पीके की टिप्पणी के बाद ग्रैंड ओल्ड पार्टी का खोखलापन आया सामने

    उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई घटना के सहारे देश की राजनीतिक मुख्यधारा में अपनी वापसी का रास्ता तलाश रही कांग्रेस बड़ी दुविधा में फंस गयी है। देश के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, यानी पीके ने भविष्यवाणी की है कि लखीमपुर खीरी कांड से कांग्रेस की वापसी की संभावना नगण्य है, जबकि पार्टी ने अपनी पूरी ताकत यहां झोंक रखी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर भारतीय राजनीति की इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी रणनीति और मुद्दों के मामले में इतनी विपन्न कैसे हो गयी है। पार्टी नेतृत्व प्रणब मुखर्जी और अहमद पटेल सरीखे रणनीतिकार और संकट मोचक का विकल्प अब तक नहीं तलाश सकी है, इसलिए पार्टी के निचले स्तर के नेता और कार्यकर्ता चिंता में हैं। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं ने तो कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी और दूसरे चर्चित नामों को पार्टी में लाने के आलाकमान के फैसले पर भी सवाल उठाये हैं। उनका कहना है कि छात्र राजनीति से सीधे देश स्तर की राजनीति के मैदान में इनकी इंट्री तभी स्वीकार्य हो सकती है, जब इनकी वैचारिक प्रतिबद्धता सामने आये। पीके की पार्टी में इंट्री के सवाल पर कांग्रेस में सिर फुटव्वल अब पुरानी बात हो चुकी है। कांग्रेस नेतृत्व के इस खोखलेपन का भारतीय राजनीति और खास कर 2024 के आम चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, इसकी संभावना के बारे में अभी तो कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहां से कोई भी रास्ता निरापद नजर नहीं आता। कांग्रेस की इस कमजोरी, दुविधा और आगे की संभावनाओं को टटोलती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।

    लखीमपुर खीरी कांड के बाद अचानक से चर्चा में आयी कांग्रेस पर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने निशाना साधा है। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर कांग्रेस का नाम लिये बिना लिखा है कि जो लोग या पार्टियां यह सोच रही हैं कि ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ के सहारे विपक्ष की तुरंत वापसी होगी, तो वे गलतफहमी में हैं। उनको निराशा ही हाथ लगेगी। उन्होंने आगे लिखा है कि दुर्भाग्य से ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ की जड़ों और उसकी संगठनात्मक संरचना में बड़ी कमियां हैं। फिलहाल इस समस्या का कोई समाधान भी नहीं है। इस टिप्पणी के बाद देश में खुद को विपक्षी पार्टियों का ‘अगुवा’ साबित करने की कांग्रेस की महत्वाकांक्षा को करारा झटका तो लगा ही है, बंगाल की तृणमूल कांग्रेस और बिहार में राजद के साथ उसके रिश्ते भी लगातार खराब होते दिखाई दे रहे हैं।

    प्रशांत किशोर की टिप्पणी का कांग्रेस आलाकमान ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन इस मुद्दे पर उसकी वैचारिक शून्यता जरूर सामने आ गयी। पीके की टिप्पणी पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रतिक्रिया दी और बिना नाम लिये प्रशांत किशोर के ट्वीट का जवाब ट्वीट से दिया। बघेल ने कहा कि कांग्रेस के चुनाव नहीं जीत पानेवाले नेताओं को अपने पाले में मिलाकर ‘राष्ट्रीय विकल्प’ बनने की उम्मीद कर रहे लोगों को बहुत निराशा होगी, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प के मुद्दे का कोई त्वरित समाधान नहीं हो सकता। बघेल की तरफ से आयी प्रतिक्रिया पर पीके कोई जवाब देते, इससे पहले तृणमूल कांग्रेस ने इसका जवाब दिया। उसने ट्वीट कर कहा, पहली बार सीएम बने भूपेश बघेल जी, बात तो आपने अच्छी कही है, लेकिन अपने वजन से ज्यादा बोल गये। इससे आपको कोई फायदा नहीं होनेवाला। आलाकमान को खुश करने की अच्छी कोशिश की आपने। खैर..क्या कांग्रेस इस एक और ट्विटर ट्रेंड के जरिये अमेठी में अपनी ऐतिहासिक हार को भुला देना चाहती है?
    हालांकि इस विवाद के बारे में जब कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि वह किसी कंसल्टेंट की टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक बयान पर उन्होंने कहा, राजनीति में सबको कोशिश करने का अधिकार है, पर आखिर में जिसे जनता स्वीकारेगी, वही आगे बढ़ पायेगा और जनता की लड़ाई जमीन पर केवल और केवल उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी लड़ रहे हैं।

    अहम है पीके की टिप्पणी
    कई राजनीतिक पार्टियों को सत्ता तक पहुंचा चुके प्रशांत किशोर के इस ट्वीट को आगामी चुनाव की दृष्टि से अहम माना जा रहा है। बंगाल चुनाव के बाद अटकलें थीं कि पीके कांग्रेस का हाथ थाम सकते हैं, लेकिन उनके इस ट्वीट ने सभी अटकलों पर लगभग विराम लगा दिया है। प्रशांत किशोर अभी भी विपक्ष को भाजपा से मुकाबला करने लायक नहीं मानते हैं। उन्होंने पहले भी एक बयान में कहा था कि पार्टियों को अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करने की जरूरत है। ऐसे में उनके नये बयान को चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है।

    कांग्रेस के लिए झटका है पीके का बयान
    लखीमपुर खीरी कांड के बाद उत्तरप्रदेश में अपनी खोयी हुई जमीन तलाश कर रही कांग्रेस के लिए पीके का यह बयान बड़ा झटका है। कांग्रेस पार्टी के सहारे अन्य राजनीतिक दल भी विपक्ष को हवा देना चाह रहे थे, लेकिन पीके अभी भी कांग्रेस को विपक्ष का नेतृत्व करने लायक नहीं मानते हैं।

    क्यों दुविधा में है कांग्रेस
    देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस दुविधा और विचार शून्यता के ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसका असर उसके लिए महंगा पड़ रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस को वह ठौर हासिल नहीं हो रहा है, जो उसे 2014 के पहले हासिल था। तब भारत और बाकी दुनिया भी लगभग मान चुकी थी कि कांग्रेस को इस जगह से हिला पाना नामुमकिन है। लेकिन प्रणव मुखर्जी और अहमद पटेल जैसे तपे-तपाये नेताओं के अवसान और ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद जैसे युवा जोश वाले नेताओं की विदाई के बाद कांग्रेस आलाकमान वैचारिक शून्यता की स्थिति में आ गया है। इन नेताओं की जगह उसके पास नवजोत सिंह सिद्धू सरीखे अगंभीर और बड़बोले नेता आ गये हैं, जिनके पास न विचार है और न ही जनाधार। पार्टी ने कन्हैया कुमार तथा जिग्नेश मेवाणी जैसे नेपथ्य में जा चुके विवादित नेताओं को अपने पाले में करने को बड़ा राजनीतिक कदम बनाने का प्रयास किया, लेकिन इन दोनों नेताओं की इंट्री ने इसके बदले एक सवाल पैदा कर दिया है। कांग्रेसी ही सवाल उठा रहे हैं कि जिस कांग्रेस को गांधीजी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, के कामराज और सोनिया गांधी सरीखे नेताओं ने रास्ता दिखाया और राजनीति की उस ऊंचाई पर पहुंचाया, उसे दोबारा हासिल करने में सिद्धू जैसा अगंभीर नेता, यौन शोषण के आरोपों से घिरे हार्दिक पटेल, देश के टुकड़े-टुकड़े करने का नारा लगानेवाले कन्हैया कुमार और समाज को जातीय हिंसा की आग में झोंकनेवाले जिग्नेश मेवाणी या प्रियंका गांधी के सहायक संदीप सिंह कितने मददगार होंगे। ये सभी नेता कहने के लिए युवा तो हैं, लेकिन इनकी स्वीकार्यता कांग्रेस के उन स्वनामधन्य शख्सियतों के मुकाबले कितनी है, यह अभी देखना बाकी है।

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