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    Home»ताजा खबरें»न्यूक्लियर और डीजल इलेक्ट्रिक दोनों सबमरीन का इस्तेमाल करेगी भारतीय नेवी
    ताजा खबरें

    न्यूक्लियर और डीजल इलेक्ट्रिक दोनों सबमरीन का इस्तेमाल करेगी भारतीय नेवी

    shivam kumarBy shivam kumarOctober 5, 2021No Comments2 Mins Read
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    नेवी को न्यूक्लियर (परमाणु) सबमरीन का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं, इस पर बहस छिड़ी हुई है. इसी बीच सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारतीय नौसेना ने फैसला किया है कि वह भविष्य में न्यूक्लियर और पारंपरिक (डीजल इलेक्ट्रिक) दोनों पनडुब्बियों का निर्माण और इस्तेमाल करेगी.

    भारतीय अफसर ने आजतक से बातचीत में कहा कि ऑस्ट्रेलिया की नेवी ने फ्रांस के साथ 90 अरब डॉलर के डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के समझौते को रद्द कर अमेरिका से न्यूक्लियर सबमरीन लेने का फैसला किया है. वहीं, भारतीय परिस्थितियों और भौगोलिक स्थिति के चलते मांग है कि हमें दोनों सबमरीन का इस्तेमाल करना चाहिए.

    भारत को दोनों तरह की सबमरीन की क्यों है जरूरत?

    अधिकारी ने कहा, ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए, खुले महासागरों और उस क्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों में खतरा अधिक है. ऐसे में उनका फ्रांस के साथ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के समझौते को रद्द करने के पीछे की वजह को समझा जा सकता है. जबकि हमारे लिए तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ खुले समुद्र में खतरे से निपटने की जरूरत है. यही वजह है कि भारतीय नेवी ऐसा बेड़ा बनाएगी, जिसमें न्यूक्लियर और डीजल इलेक्ट्रिक दोनों सबमरीन दोनों का इस्तेमाल हो.

    न्यूक्लियर सबमरीन बनाने में दोगुना खर्चा

    उन्होंने कहा, भारत जैसे देश के लिए, दोनों प्रकार की पनडुब्बियों का इस्तेमाल आर्थिक रूप से अधिक मायने रखता है. उन्होंने बताया परमाणु हमले में सक्षम पनडुब्बियों के संचालन और निर्माण की लागत डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के निर्माण की लागत से दोगुनी है.

    अधिकारी ने बताया कि भारत के लिए कलवारी श्रेणी (स्कॉर्पीन) के तहत 6 पनडुब्बियों के निर्माण की पूरी परियोजना की लागत 25,000 करोड़ रुपए है. वहीं, DRDO द्वारा बनाई जाने वाली पहली तीन परमाणु हमले में सक्षम पनडुब्बियों को बनाने के प्रस्ताव में 50,000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है.

    न्यूक्लियर सबमरीन ज्यादा बेहतर

    भले ही न्यूक्लियर और डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के बीच लागत का अंतर ज्यादा है, लेकिन परमाणु पनडुब्बियां नौसेनाओं को एक बड़ी क्षमता प्रदान करती हैं. क्योंकि ये सबमरीन महीनों तक समुद्र के अंदर रह सकती हैं. इन्हें डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की तरह नियमित अंतराल पर समुद्र की सतह पर आने की जरूरत नहीं है.

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