पावर, यानी अधिकार ऐसा नशा है, जिसकी लत आसानी से नहीं छूटती। हमारे देश में तो खैर पावर की पूजा होती है और पावरफुल बनना हर किसी का सपना होता है। इसलिए सरकारी सेवा से रिटायर होनेवाले नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद भी पावर का सुख भोगने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि केवल झारखंड में ऐसा होता है, बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी आम तौर पर पूर्व नौकरशाहों को विभिन्न आयोगों और संवैधानिक निकायों में एडजस्ट करने की परंपरा आजादी के बाद से ही चल रही है। ये नियुक्तियां कहीं से असंवैधानिक नहीं होती हैं, क्योंकि कानून में इस तरह का प्रावधान कर दिया गया है। लेकिन नैतिक रूप से यह गलत है, क्योंकि रिटायर होने के बाद कोई अधिकारी शारीरिक और मानसिक रूप से उतना सक्षम नहीं होता कि वह नयी जिम्मेदारी के साथ पूरा न्याय कर सके। इसका दूसरा पहलू यह है कि रिटायर अधिकारियों की नियुक्ति के कारण नयी प्रतिभाओं को अवसर नहीं मिलता और वे कुंठित होती हैं। राजनीति में रिटायर नौकरशाहों द्वारा किस्मत आजमाने की कहानियां भी हमारे देश में भरी पड़ी हैं, लेकिन सरकारी संस्थाओं में नियुक्ति पर अब विचार का समय आ गया है। रिटायर नौकरशाहों की दोबारा नियुक्ति के औचित्य पर आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।
पिछले साल एक सितंबर को जब पूर्व आइएएस अधिकारी राजीव कुमार को देश का चुनाव आयुक्त बनाया गया, तब इस पर खूब विवाद हुआ। विवाद इस मुद्दे पर था कि एक रिटायर्ड आइएएस अधिकारी को दोबारा इतने महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करना उचित है! राजीव कुमार की नियुक्ति के पक्ष में दलील दी गयी कि चुनाव आयुक्त का पद केंद्रीय सचिव के समकक्ष होता है और इस पर इससे नीचे के रैंक के अधिकारी की नियुक्ति नहीं हो सकती। राजीव कुमार किसी संवैधानिक संस्था में नियुक्त होनेवाले न तो पहले रिटायर्ड अधिकारी हैं और न अंतिम। उनसे पहले भी और उनके बाद भी केंद्र और दूसरे राज्यों में कई पूर्व अधिकारियों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया गया है। पिछले ही साल महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सात पूर्व आइएएस अधिकारियों को एक साथ मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया।
जहां तक झारखंड का सवाल है, तो यहां भी कई पूर्व नौकरशाहों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किये जाने की परंपरा अब लगभग स्वीकार्य हो चुकी है। न केवल नौकरशाह, बल्कि रिटायर्ड जज, पत्रकार और इंजीनियरों को भी नियुक्त किया जाता रहा है। यह सिलसिला लगातार जारी है और इस पर अब सवाल भी नहीं उठाये जाते।
हाल ही में पूर्व आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी को झारखंड लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इसी तरह पूर्व मुख्य सचिव डॉ डीके तिवारी को राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाये जाने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गयी है। पूर्व आइएएस अधिकारी मुख्तियार सिंह से लेकर लक्ष्मी सिंह और आरएस पोद्दार से लेकर शिव बसंत तक को विभिन्न सरकारी संगठनों में नियुक्त किया जा चुका है।
यह बीमारी केवल राज्यों में ही नहीं है, बल्कि केंद्र में भी रिटायर्ड नौकरशाहों की नियुक्ति की परंपरा रही है। विभिन्न न्यायाधिकरणों, केंद्रीय बोर्डों और दूसरी संस्थाओं में ऐसे पूर्व नौकरशाहों को पद, पैसा, प्रतिष्ठा और सुविधाएं हासिल होती हैं। सरकारी संस्थाओं को छोड़ भी दिया जाये, तो कई निजी कंपनियों में भी उनके लिए खूब अवसर पैदा किये जाते हैं। कई बड़ी निजी कंपनियों ने पूर्व आइएएस अधिकारियों, बड़े लोक उपक्रमों के पूर्व प्रमुखों और पूर्व आइपीएस अफसरों को मोटी तनख्वाह देकर अपने यहां नियुक्त कर रखा है। इन रिटायर अफसरों पर ये मेहरबानियां यूं ही नहीं बरसती हैं, बल्कि राजनीतिक दलों का भरोसा जीतने की उनकी कवायद रंग लाती हैं। इसलिए रिटायरमेंट के बाद भी उनके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। सरकार में तो यहां तक होता है कि यदि कोई उपयुक्त पद नहीं होता, तो पूर्व नौकरशाहों को सलाहकार या किसी सरकारी उपक्रम में निदेशक बना दिया जाता है।
क्या कहता है नियम
कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के नियमों के मुताबिक, सामान्य रूप से सेवानिवृत्ति की आयु के बाद सेवा के विस्तार या दोबारा नियुक्ति के किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा नियमों में यह भी कहा गया है कि सेवा विस्तार या पुन: नौकरी के प्रस्ताव का औचित्य दुर्लभ अथवा असाधारण परिस्थियों में ही ठहराया जा सकता है। विस्तार तभी दिये जा सकते हैं, जब दूसरे अधिकारी उस काम के लिए ‘पूरी तरह तैयार’ न हों या फिर विचाराधीन अधिकारी ‘असाधारण गुण’ रखता हो। रिटायर हो रहे किसी अधिकारी को विस्तार देने या सरकारी सेवा में फिर से लेने के लिए इन दोनों शर्तों का पर्याप्त रूप से स्थापित होना आवश्यक है।
कई नौकरशाह और राजनीतिज्ञ इस रुझान को खतरनाक करार देते हैं, जो सक्रिय नौकरशाहों की भूमिका को कमजोर करता है। यह भी माना जाता है कि रिटायर होने के बाद नौकरशाहों की ऐसी नियुक्तियों से शक्तियां असिर किसी व्यक्ति विशेष में केंद्रित हो जाती हैं। यह सही भी है, क्योंकि कोई पूर्व नौकरशाह किसी संस्था में नियुक्त हो जाये, तो उसमें काम कर रहा अधिकारी उसकी वरीयता के बोझ तले दबता रहेगा और इससे काम भी प्रभावित होगा।
यहां सवाल यह भी उठता है कि आखिर इन पूर्व नौकरशाहों को इतना उपकृत करने के लिए सरकारें उतावली क्यों होती हैं। इसका राजनीतिक कारण ही प्रमुख है। नौकरशाही अकसर राजनीतिक नेतृत्व के कहे अनुसार ही चलती है। इसलिए नौकरशाह अपना अधिकांश समय राजनीतिक नेतृत्व का भरोसा जीतने में व्यतीत करते हैं। उनके रिटायरमेंट के बाद उनके राजनीतिक बॉस उनकी स्वामिभक्ति का पुरस्कार देने के लिए सेवा विस्तार या दोबारा नियुक्त करते हैं।
यह सही है कि ये नियुक्तियां असंवैधानिक नहीं होतीं। राजनीतिक नेतृत्व को इसका विशेषाधिकार हासिल होता है। लेकिन नैतिक रूप से इसे कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता है। सरकारी सेवा के रिटायरमेंट का मतलब ही यही होता है कि उस अफसर की मानसिक और शारीरिक क्षमता चुकने लगी है। इसलिए उसे कोई नयी जिम्मेदारी देना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कहा जा सकता है।
रिटायर हो चुका अफसर नयी जिम्मेदारी के साथ कितना न्याय कर सकेगा, यह सोचनेवाली बात है। लेकिन बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है कि पावर, पैसा और प्रतिष्ठा को इतनी आसानी से छोड़ पाना इस भौतिकवादी युग में हर किसी के लिए संभव नहीं है। इसलिए रिटायर हो रहा अफसर अपने सेवा काल में ही अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए हाथ-पैर मारना शुरू कर देता है। इस क्रम में उसका तो भला हो जाता है, लेकिन राज्य की प्रतिभाओं के साथ अन्याय हो जाता है। झारखंड में भी यही हो रहा है। रिटायर नौकरशाहों के फिर से महत्वपूर्ण पदों पर आ जाने से प्रतिभाओं की हकमारी हो रही है। दूसरे नौकरशाह भी अपने सेवा काल में किसी न किसी राजनेता से गहरे रूप से जुड़ जाते हैं और उनके हित में काम करते हैं। बाद में इसी सेवा का मेवा उन्हें मिलता है।