विशेष
लो प्रोफाइल में रहते हैं, लेकिन अपनी काबिलियत का महत्व समझते हैं
मुद्दों की समझ गहरी है जो आने वाले दिनों में दिखेगी
चुनौती तो कई हैं लेकिन मिशन एक झारखंड फतह
दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की झारखंड प्रदेश इकाई ने अपने एक तपे-तपाये नेता आदित्य प्रसाद साहू को अपना अध्यक्ष चुना है। आदित्य साहू झारखंड भाजपा का ऐसा चेहरा हैं, जो हमेशा लो प्रोफाइल में रह कर अपना काम करते हैं। वह न तो गुटबाजी करते हैं और न ही इसमें विश्वास करते हैं। वह सबके दोस्त हैं और सबके चहेते भी। सबसे अहम वह बोलते कम हैं, लेकिन काम अधिक करते हैं। गंभीर हैं तो मुद्दों की समझ भी गहरी है। उन्हें पता है कि काम कैसे करना है और कैसे करवाना है। आदित्य साहू के प्रदेश अध्यक्ष बनाने से युवा कार्यकर्ताओं में एक अलग जोश दिखाई पड़ रहा है। उनमें नया भरोसा भी जगा है। आदित्य साहू में कई ऐसे गुण हैं, योग्यता है, जिससे झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने में सहायक बनी। लेकिन यह कुर्सी अपने साथ कई चुनौतियां लेकर आयी है और आदित्य साहू को इन चुनौतियों का न केवल सामना करना होगा, बल्कि उनसे पार भी पाना होगा। झारखंड भाजपा के नये अध्यक्ष के सामने की चुनौतियों की फेहरिस्त तैयार करने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि आखिर आदित्य साहू को इस पद के लिए क्यों उपयुक्त समझा गया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आदित्य साहू झारखंड भाजपा का एक विश्वसनीय और प्रमाणित चेहरा हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि वह ओबीसी होने के बावजूद सभी वर्गों और जातियों में समान रूप से लोकप्रिय और सम्मानित हैं। भाजपा ही नहीं, दूसरे राजनीतिक दलों में भी उनकी बातें गंभीरता से सुनी जाती हैं। राज्यसभा सांसद बनने के बाद उन्होंने जिस तरह काम किया है, उसकी हर तरफ सराहना होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाये, तो आदित्य साहू झारखंड प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनने के सर्वथा योग्य थे। आदित्य साहू के सामने क्या हैं चुनौतियां और क्या होगी उनकी रणनीति, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष की तलाश राज्यसभा सांसद आदित्य साहू पर जाकर खत्म हो गयी है। राज्यसभा सांसद आदित्य साहू झारखंड भाजपा के नये अध्यक्ष चुन लिये गये हैं। आदित्य साहू की ताजपोशी के जरिये भाजपा ने कई बड़े राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है।
रणनीति और चुनौतियां
झारखंड भाजपा इस समय कई स्तरों पर चुनौतियों से जूझ रही है। राज्य की राजनीति में आदिवासी समुदाय की निर्णायक भूमिका रही है, जहां झामुमो का पारंपरिक प्रभाव मजबूत है। इसके अलावा कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के साथ बना विपक्षी गठबंधन भाजपा के लिए निरंतर दबाव का कारण बना हुआ है। 2019 के बाद हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जिससे कार्यकर्ताओं में भी एक हद तक निराशा देखी गयी। ऐसे में नये प्रदेश अध्यक्ष से संगठन को फिर से सक्रिय और आक्रामक बनाने की अपेक्षा की जा रही है। आदित्य साहू को अध्यक्ष बनाने का एक बड़ा संदेश यह भी है कि भाजपा उत्तर प्रदेश और बिहार की ही तरह झारखंड में भी ओबीसी राजनीति को लेकर आगे बढ़ेगी। यूपी में पंकज चौधरी और बिहार में संजय सरावगी के बाद अब झारखंड में भी भाजपा ने ओबीसी चेहरे पर दांव लगाया है। राज्य में ओबीसी आबादी 50 प्रतिशत से भी अधिक आंकी गयी है। भाजपा के कई विधायक भी ओबीसी समुदाय से आते हैं।
आदित्य साहू को क्यों सौंपी गयी कमान
अब सवाल उठता है कि पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं को छोड़कर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने आदित्य साहू पर क्यों भरोसा जताया और आदित्य साहू के सामने झारखंड में क्या चुनौतियां होंगी। इनमें से पहले सवाल का जवाब यही है कि आदित्य साहू झारखंड भाजपा का ऐसा चेहरा हैं, जो कभी किसी गुट में नहीं रहे। वह हमेशा से पार्टी के लिए काम करते रहे और ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर की नीति पर चलते रहे। आदित्य साहू को एक संगठनात्मक नेता के रूप में देखा जाता है। वे लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं और पार्टी के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। वे झारखंड भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका में भी रहे, जहां संगठनात्मक चुनाव, बूथ सशक्तिकरण और कार्यकर्ता संवाद जैसे कार्यों में उनकी सक्रियता सामने आयी। राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका अनुभव उन्हें राष्ट्रीय राजनीति की समझ भी देता है, जिसका लाभ प्रदेश संगठन को मिल सकता है।
जमीन से जुड़े कार्यकर्ता को टॉप पोस्ट
संगठन की दृष्टि से भी आदित्य साहू को कमान मिलना एक बड़ा संदेश है। एक ऐसा राज्य, जहां पार्टियों में दल-बदल आम बात है, भाजपा ने एक ऐसे चेहरे को कमान सौंपी है, जो भाजपा मूल का है। जमीन से जुड़ा हुआ है और एक सामान्य कार्यकर्ता से यहां तक पहुंचा है। आदित्य साहू ने पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ता स्तर से अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था। वे संगठन के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग दायित्व संभाल चुके हैं, जिनमें महासचिव से लेकर उपाध्यक्ष तक की जिम्मेदारी शामिल है। उन्हें झारखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने का अनुभव भी है। वे पलामू और कोल्हान क्षेत्रों में काम कर चुके हैं। लिहाजा उनका पूरे राज्य के कार्यकर्ताओं के साथ जीवंत और आत्मीय संबंध हंै।
जातीय संतुलन की कवायद
भाजपा ने राज्य की राजनीति में जातीय संतुलन बैठाने का प्रयास भी किया है। जहां पूर्व मुख्यमंत्री और प्रमुख आदिवासी चेहरा बाबूलाल मरांडी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, वहीं आदित्य साहू के रूप में भाजपा ने संगठन को ओबीसी चेहरा दिया है। इससे पहले भी भाजपा ने यही प्रयोग किया था, जब ओबीसी नेता रघुवर दास और आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा और बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी थी। राज्य में आदिवासियों की संख्या करीब 25 प्रतिशत है। ऐसे में भाजपा ने आदिवासी और ओबीसी नेतृत्व को आगे किया है।
नगर निकाय चुनाव में होगी अग्निपरीक्षा
आदित्य साहू के सामने झारखंड में इस साल होने वाले नगर निकाय चुनाव 2026 किसी अग्निपरीक्षा के कम नहीं होंगे। हालांकि निकाय चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़ा जाता है, लेकिन पार्टी किसी भी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है। बहुत जल्द नगर निकाय चुनाव की अधिसूचना भी जारी कर दी जायेगी। ऐसे में भाजपा चाहेगी कि उसके ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी नगर पंचायत और नगर निगम में जीत दर्ज करें, जिन्हें वह अपना समर्थन दे।
ओबीसी, आदिवासी वोट बैंक के बीच भरोसा बनाने की चुनौती
झारखंड की राजनीति में आदिवासी, ओबीसी और ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हाल के वर्षों में झारखंड में भाजपा का इस वर्ग से जुड़ाव कमजोर पड़ा है। झारखंड में करीब 50 प्रतिशत ओबीसी आबादी बतायी जाती है। वहीं 25 फीसदी आदिवासी। ऐसे में आदित्य साहू के लिए इन समुदायों के बीच भरोसा दोबारा कायम करने की चुनौती होगी। आदित्य साहू का संगठनात्मक अनुभव और युवाओं से जुड़ाव भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
साहू की टीम में युवाओं को मिलेगा मौका
अब नजरें होंगी आदित्य साहू की नयी टीम पर। माना जा रहा है कि इसमें युवाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जायेगा, ताकि आने वाले समय के लिए पार्टी को मजबूत किया जा सके। भाजपा झारखंड में लगातार दूसरी बार चुनाव हारी है और ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाये रखना उनके लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आदित्य साहू चुनावी राजनीति, सामाजिक समीकरण और कार्यकर्ताओं के मनोबल, यानि तीनों मोर्चों पर पार्टी को कितनी प्रभावी दिशा दे पाते हैं। झारखंड जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक तानाबाना वाले राज्य में उनकी सफलता ही भाजपा के भविष्य की राह तय करेगी।

