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अब इस समस्या की तरफ गहराई से ध्यान देने की है आवश्यकता
रांची पुलिस ने बच्चा चोर गिरोह का खुलासा कर रच दिया इतिहास
रांची पुलिस ने बच्चा चोर गिरोह का पर्दाफाश कर एक ऐसी सच्चाई पर से पर्दा उठाया है, जिस पर अंश-अंशिका के अपहरण से पहले कोई विशेष ध्यान नहीं देता था। इस साल की शुरूआत में जब धुर्वा इलाके से अंश और अंशिका रहस्यमय तरीके से लापता हुए और उसके बाद जिस तरह की संवेदनशीलता और जागरूकता सामने आयी, उससे पुलिस पर भी दबाव बढ़ा। 12 दिन बाद जब दोनों बच्चे बरामद किये गये, तब पुलिस को भी लगा कि यह मामला कितना गंभीर है। अब रांची पुलिस ने बच्चा चोरी कर उनका सौदा करनेवाले गिरोह का पर्दाफाश कर अपनी क्षमता तो साबित की ही है, इस अनैतिक नेटवर्क के खतरनाक पहलुओं को सामने लाकर इतिहास बनाया है, जिसकी जितनी भी तारीफ की जाये कम है। बाल तस्करी वास्तव में भारत जैसे देश में बाल तस्करी कोई नया मामला है। यह मामला देखने में भले ही छोटा लगे, सामाजिक रूप से बेहद गंभीर है। बाल तस्करी के शिकार बच्चे शोषण, अपहरण और दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं। तमाम कानून होने पर भी भारत में यह थम नहीं रहा है। ना सिर्फ बच्चों के जीवन पर, बल्कि समाज पर भी इसके बहुत गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं। बाल तस्करी झारखंड और इसके जैसे गरीब प्रदेशों में खूब फल-फूल रहा है, क्योंकि यहां न सामाजिक जागरूकता उतनी अच्छी है और न संवेदनशीलता। लेकिन इसके बावजूद इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि यह एक गंभीर समस्या है। इसलिए रांची पुलिस ने जो कामयाबी हासिल की है, उसका सम्मान करना चाहिए। रांची में बच्चा चोर गिरोह के खुलासे के बाद यह जानना जरूरी है कि देश में यह नेटवर्क कितना बड़ा है और समस्या कितना गंभीर है। देश में बाल तस्करी की समस्या के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
रांची पुलिस द्वारा अंश और अंशिका की बरामदगी के बाद बच्चा चोर गिरोह का पर्दाफाश होना एक गंभीर समस्या पर से पर्दा उठना है। इस गिरोह के पास से एक दर्जन से अधिक बच्चों की बरामदगी बताती है कि यह गिरोह कितना संगठित और खतरनाक है। लेकिन यह बात भी सच है कि भारत जैसे देश में बाल तस्करी का नेटवर्क नया नहीं है। कुछ साल पहले मर्दानी नामक एक हिंदी फिल्म भी बनी थी, जिसमें बाल तस्करी, खास कर बच्चियों की चोरी और उनकी तस्करी के संगठित कारोबार के बारे में बताया गया था।
देश में क्या है बच्चों की सामाजिक स्थिति
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 में भारत में करीब 1.20 लाख बच्चे ऐसे थे, जो सड़कों पर रहते थे। इनमें से सिर्फ 37 हजार बच्चे ही ऐसे थे, जो अपने परिवारों के साथ सड़कों पर रहते थे और बाकी बच्चे बेघर थे। ये बेघर बच्चे ना सिर्फ बाल श्रम और तस्करी का शिकार होते हैं, बल्कि उन्हें यौन शोषण, शारीरिक दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है।
क्या कहती है एनसीआरबी की रिपोर्ट
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के मुताबिक भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता होता है, जो बाल तस्करी की गंभीरता को दर्शाता है। साल 2023 में आयी रिपोर्ट के अनुसार, देश में 83 हजार से अधिक बच्चे गायब हुए और उनमें से 47 हजार की कोई खबर नहीं है। यह रिपोर्ट बताती है कि बच्चों से संबंधित अपराधों के आंकड़े भयावह हैं। चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। इसमें कहा गया है कि सभी राज्यों के उच्च न्यायालय बाल तस्करी से संबंधित लंबित मुकदमों की स्थिति की जानकारी दें और छह महीने के भीतर ऐसे मुकदमों का निस्तारण करें।
झारखंड टॉप 10 में नहीं, लेकिन ट्रेंड खतरनाक
केंद्र सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि साल 2020 से लगभग 36 हजार बच्चे गायब हैं, जिन्हें अभी तक खोजा नहीं जा सका है। चाइल्ड ट्रैफिकिंग और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश टॉप पर है। संतोषजनक बात यह है कि झारखंड टॉप 10 में नहीं है, लेकिन रांची पुलिस द्वारा गिरोह के पदार्फाश से पता चलता है कि यहां ट्रेंड खतरनाक है। कोविड के बाद देश भर में बाल तस्करी के मामलों में अचानक काफी बढ़ोत्तरी हुई। कोविड से पहले यानी साल 2019 में झारखंड में बाल तस्करी के जहां 267 मामले दर्ज थे, वहीं 2022 में ये संख्या बढ़कर 1,214 हो गयी। आंकड़े बताते हैं कि झारखंड एक ऐसा राज्य है, जिसकी सीमा कई राज्यों से मिलती है। इसलिए यहां बाल तस्करी के मामले ज्यादा हैं।
क्यों है झारखंड में खतरनाक ट्रेंड
बाल तस्करी का झारखंड में खतरनाक ट्रेंड होने के पीछे भौगोलिक समस्याएं और गरीब राज्य होना तो कारण हैं ही, प्रशासनिक अनदेखी भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। प्रशासनिक अनदेखी इस कदर है कि यहां अक्सर अस्पताल से बच्चा चोरी होने और गरीबी के कारण नवजात की बिक्री की खबरें आती रहती हैं। कुछ दिन पहले तो गुमला के रायडीह के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से बच्चा चोरी के रैकेट का पदार्फाश आजाद सिपाही ने किया था। बाल श्रम पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की संस्था कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन की ओर से तैयार की गयी एक रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 के बाद बाल तस्करी के मामलों में 68 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2016 से 2022 तक 13,549 बच्चों को तस्करी से बचाया गया, जिनमें से 80 फीसदी बच्चे 13 से 18 साल की उम्र के थे।
बाल तस्करी की वजह क्या है
बाल तस्करी की मुख्य वजहें अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी तो हैं ही, इसके अलावा सामाजिक भेदभाव की वजह से दलित और आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए इसका शिकार होने का जोखिम ज्यादा रहता है। आर्थिक तंगी के कारण कई परिवार अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर होते हैं और कई बार ये बच्चे तस्करों के हाथ लग जाते हैं।
पुलिस की भूमिका
राज्यों की पुलिस बाल तस्करी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन कई बार कानूनी दांव-पेंच और इस अपराध में लगे लोगों के राजनीतिक गठजोड़ उसे भी असहाय कर देते हैं। पुलिस अधिकारी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल से बच्चों की चोरी को लेकर भले ही गंभीर टिप्पणी की हो, लेकिन अस्पताल आजकल बच्चों की तस्करी के बड़े माध्यम बन चुके हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। अस्पतालों में इन अपराधों के लिए छोटे-मोटे गिरोह नहीं, बल्कि कई बार अस्पताल प्रशासन तक की भूमिका रहती है। उससे भी गंभीर बात यह है कि कई बार अभिभावक भी पैसों के लालच में बाल तस्करी में शामिल हो जाते हैं।
कानूनी प्रावधान
बाल तस्करी से निपटने के लिए भारत में कई कानून हैं, जिनमें भारतीय दंड संहिता (आइपीसी), अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956, बाल संरक्षण अधिनियम 2012 और किशोर न्याय अधिनियम 2000 शामिल हैं। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 23 में भी मानव तस्करी पर प्रतिबंध लगाया गया है। जानकारों का कहना है कि मानव तस्करी को लेकर कानून तो हैं, लेकिन सबसे बड़ी कमी उन्हें लागू करने और बच्चों की देखभाल में है। जानकार कहते हैं कि गरीबी और आर्थिक असमानता के चलते बच्चे अक्सर तस्करी के शिकार हो जाते हैं और आसान लक्ष्य बन जाते हैं। कानूनों का कमजोर प्रवर्तन भी इसे बढ़ावा देता है। कानूनों का सख्ती से पालन नहीं किया जाता है, तो तस्कर बच निकलते हैं। और हां, प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग भी बाल तस्करी को बढ़ावा देता है। आजकल तस्कर आॅनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करके बच्चों से मेल-जोल बढ़ाते हैं और फिर उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं।
इंटरनेट पर चाइल्ड पोर्न की बाढ़
इंटरनेट वॉच फाउंडेशन के मुताबिक बीते कुछ सालों में चाइल्ड पोर्न परोसने वाली वेबसाइटों की संख्या तेजी से बढ़ी है। फाउंडेशन का कहना है कि इंटरनेट पर ढाई लाख से ज्यादा चाइल्ड पोर्न वेबसाइट मौजूद हैं। 2019 में इनकी संख्या 1,32,676 थी, जो इस साल बढ़कर 2,55,588 हो गयी है।
महामारी है कारण
फाउंडेशन की रिपोर्ट कहती है कि यूआरएल में हुई बढ़ोतरी की एक वजह महामारी और लॉकडाउन भी है, जिसके कारण बच्चों समेत ज्यादा संख्या में लोग घरों में रह रहे थे और पहले से ज्यादा पोर्न देख रहे थे। फाउंडेशन की रिपोर्ट कहती है कि यूआरएल में हुई बढ़ोतरी की एक वजह महामारी और लॉकडाउन भी है, जिसके कारण बच्चों समेत ज्यादा संख्या में लोग घरों में रह रहे थे और पहले से ज्यादा पोर्न देख रहे थे। फाउंडेशन की रिपोर्ट कहती है कि यूआरएल में हुई बढ़ोतरी की एक वजह महामारी और लॉकडाउन भी है, जिसके कारण बच्चों समेत ज्यादा संख्या में लोग घरों में रह रहे थे और पहले से ज्यादा पोर्न देख रहे थे। रिपोर्ट कहती है कि खुद के बनाये पोर्न वीडियो इस वक्त सबसे ज्यादा देखे जा रहे हैं। 2019 में 38,424 ऐसी वेबसाइटें थीं, जिन पर खुद बनाये वीडियो शेयर किये गये। 2022 में इनकी संख्या 1,99,363 हो गयी।
केवल कानून ही पर्याप्त नहीं
भारत में बाल तस्करी के लिए अलग से कोई कानून ना होना भी इस समस्या को रोक पाने में बाधक है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम जैसे कानून हैं, लेकिन ये केवल वेश्यावृत्ति पर केंद्रित हैं। इसके अलावा किशोर न्याय अधिनियम और बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम उपलब्ध जरूर हैं, लेकिन अपर्याप्त हैं। गृह मंत्रालय बाल तस्करी से संबंधित दिशा-निर्देश तो जारी करता है, लेकिन उस पर अमल करने का काम राज्य सरकार का है। यूपी में इन दिशा-निर्देशों का कैसा पालन हो रहा है, ये आंकड़ों और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी से स्पष्ट है। जब तक एक अलग कानून और जिम्मेदारी नहीं तय की जायेगी, इस श्राप से मुक्ति नहीं मिलेगी।

