द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक गुजरात में अवस्थित श्री सोमनाथ मंदिर भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जीवंत प्रतीक है। पिछले एक हजार वर्षों का कालखंड इस बात का प्रमाण है कि विदेशी आक्रांताओं की घृणा, कट्टरता और विध्वंस की नीति के आगे हमारी आस्था, साहस और सृजनशीलता की अमर शक्ति हर क्षण अडिग रही। आज बाबा सोमनाथ का जो भव्य स्वरूप हम देख रहे हैं, वह सरदार वल्लभभाई पटेल की निष्ठा, डॉ राजेंद्र प्रसाद की आस्था, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी की जिजीविषा और लाखों सनातन धर्मावलंबियों के बलिदान का ही प्रतिफल है। सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के एक हजार साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नया भारत ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के रूप में सनातन आस्था के सांस्कृतिक गौरव का उत्सव मना रहा है और गजनी जैसे आतताइयों के धूलधूसरित विध्वंस पर उल्लास, सृजन और वैभव का नव-अंकुर प्रस्फुटित हो रहा है। यह पर्व प्रतीक है कि सत्य को कभी पराजित नहीं किया जा सकता। गौरवशाली सनातन संस्कृति के अभिवर्धन के इस पर्व के लिए जहां प्रधानमंत्री मोदी प्रशंसा के पात्र हैं, वहीं सोमनाथ मंदिर करोड़ों भारतीयों के गौरव का जीवंत प्रतीक है। क्या है सोमनाथ मंदिर का महत्व और क्या हैं इसके महत्वपूर्ण आयाम, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह।
हाल ही में सोमनाथ मंदिर पर पहले हमले के 1000 साल पूरा होने पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया गया। इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे। इस पर्व का प्रभाव इंटरनेट पर भी साफ देखा गया। बड़ी संख्या में लोगों ने सोमनाथ मंदिर को आॅनलाइन खोजा। इस मायने में सोमनाथ मंदिर पिछले 20 वर्षों में सबसे ज्यादा सर्च किया गया स्थल बना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर पावन श्री सोमनाथ मंदिर परिसर से देश को संबोधित किया। अपने संबोधन की शुरूआत पीएम मोदी ने जय सोमनाथ के जयघोष के साथ की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व करोड़ों-करोड़ भारतीयों की शाश्वत आस्था, साधना और अटूट संकल्प का जीवंत प्रतिबिंब है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भी गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध करने वाली ताकतें आज भी हमारे बीच सक्रिय हैं। भारत को उन्हें हराने के लिए सतर्क, एकजूट और शक्तिशाली बने रहने की जरूरत है।
सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है, लेकिन इसका इतिहास काफी उतार-चढ़ाव और विवादों से भरा रहा है।
इसके मुख्य विवादों को हम तीन प्रमुख बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. ऐतिहासिक आक्रमण और विध्वंस
सोमनाथ मंदिर का सबसे बड़ा विवाद इसके बार-बार तोड़े जाने और पुनर्निर्माण से जुड़ा है।
महमूद गजनवी: सबसे चर्चित विवाद 1024-25 ई. का है, जब गजनी के सुल्तान महमूद ने मंदिर पर हमला किया, इसकी अपार संपत्ति लूटी और ज्योतिर्लिंग को खंडित कर दिया।
मुगलकाल: इसके बाद भी अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब जैसे शासकों द्वारा मंदिर को नष्ट करने के प्रयास किये गये। इतिहासकारों के बीच इन आक्रमणों के पीछे के असली कारणों जैसे धार्मिक बनाम आर्थिक को लेकर अक्सर बहस होती रहती है।
2. आजादी के बाद पुनर्निर्माण का विवाद जो है नेहरू बनाम पटेल
आजादी के बाद जब मंदिर के पुनर्निर्माण की बात आयी, तो यह एक राजनीतिक और वैचारिक विवाद बन गया: सरदार पटेल और केएम मुंशी चाहते थे कि सरकार मंदिर का भव्य निर्माण कराये क्योंकि यह भारत के गौरव का प्रतीक था।
लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश की सरकार को किसी विशेष धार्मिक स्थल के निर्माण में सीधे शामिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने इसे हिंदू पुनरुत्थानवाद की संज्ञा दी थी।
जब मंदिर बनकर तैयार हुआ, तो नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन समारोह में न जाने की सलाह दी थी, लेकिन राजेंद्र प्रसाद वहां गये। यह घटना आज भी भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा पर बहस का विषय बनती है।
3. गैर-हिंदुओं का प्रवेश और वर्तमान विवाद
हाल के वर्षों में एक नया विवाद मंदिर के प्रवेश नियमों को लेकर सामने आया है: सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के नियम के अनुसार, गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश करने से पहले एक विशेष रजिस्टर में अपनी जानकारी दर्ज करनी होती है और अनुमति लेनी होती है। वहीं 2017 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दौरे के समय विवाद तब बढ़ा जब कथित तौर पर उनका नाम ‘गैर-हिंदू’ वाले रजिस्टर में दर्ज पाया गया। हालांकि, बाद में मंदिर प्रशासन और कांग्रेस की ओर से इस पर स्पष्टीकरण दिये गये, लेकिन इसने हिंदू बनाम गैर-हिंदू की एक नयी बहस छेड़ दी थी।
निष्कर्ष: सोमनाथ मंदिर का विवाद केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, इतिहास के घावों और आधुनिक भारत की धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या से जुड़ा है।
मंदिर के ऐतिहासिक निर्माण की कला और वास्तुकला
सोमनाथ मंदिर की वास्तुकला भारतीय मंदिर निर्माण कला का एक अद्भुत उदाहरण है। वर्तमान मंदिर का निर्माण ‘चालुक्य शैली’ में किया गया है, जिसे सोमपुरा शैली भी कहा जाता है।
मंदिर की बनावट और वास्तुकला की मुख्य विशेषताएं :
1. मंदिर की शैली
वर्तमान मंदिर का निर्माण गुजरात की प्रसिद्ध चालुक्य वास्तुकला शैली में हुआ है। इसे कैलाश महामेरु प्रसाद रूप में बनाया गया है, जो बहुत ही भव्य और विशाल माना जाता है। यह शैली अपनी बारीकी, नक्काशी और ऊंचे शिखरों के लिए जानी जाती है। इसके मुख्य शिल्पकार प्रभाशंकर सोमपुरा थे, जिनके परिवार ने ही अयोध्या के राम मंदिर का नक्शा भी तैयार किया है।
2. मंदिर के मुख्य भाग
मंदिर मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटा हुआ है:
गर्भगृह: जहां मुख्य ज्योतिर्लिंग स्थापित है।
सभामंडप: यह मुख्य कक्ष है जहां श्रद्धालु एकत्र होते हैं।
नृत्यमंडप: वह स्थान जहाँ प्राचीन समय में धार्मिक नृत्य और अनुष्ठान होते थे।
3. मुख्य शिखर और ध्वज
मंदिर का शिखर लगभग 155 फीट ऊंचा है और शिखर के ऊपर स्थित कलश का वजन लगभग 10 टन है। वहीं मंदिर के ऊपर लगा ध्वज 27 फीट लंबा है, जिसे दिन में तीन बार बदला जाता है।
4. बाण स्तंभ का रहस्य
सोमनाथ मंदिर के दक्षिण में समुद्र किनारे एक स्तंभ बना है, जिसे ‘बाण स्तंभ’ कहते हैं। यह वास्तुकला और प्राचीन भूगोल का एक चमत्कार है: इस पर लिखा है कि इस स्तंभ से लेकर दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में जमीन का एक भी टुकड़ा मतलब टापू या पहाड़ नहीं है। आश्चर्य की बात यह है कि प्राचीन काल के भारतीयों को यह जानकारी थी कि बिना किसी बाधा के समुद्र का यह सीधा रास्ता अंटार्कटिका तक जाता है।
5. समुद्र का तट और निर्माण सामग्री
मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर से किया गया है। मंदिर समुद्र के बिल्कुल किनारे स्थित है, इसलिए इसकी दीवारों को समुद्री हवाओं और नमक से बचाने के लिए विशेष लेप का उपयोग किया गया है। रात के समय मंदिर की ‘लाइट एंड साउंड शो’ इसकी वास्तुकला की भव्यता को और निखार देती है।
क्या आप जानते हैं? सोमनाथ मंदिर को ‘शाश्वत तीर्थ’ कहा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इसे सतयुग में सोम यानी चंद्रमा ने सोने से, त्रेतायुग में रावण ने चांदी से और द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने चंदन की लकड़ी से बनवाया था।
मंदिर के ‘बाण स्तंभ’ का वैज्ञानिक महत्व
सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित ‘बाण स्तंभ’ प्राचीन भारतीय विज्ञान और भूगोल के ज्ञान का एक ऐसा प्रमाण है, जिसे देखकर आधुनिक वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं।
आइये इसकी वैज्ञानिक और भौगोलिक विशेषताओं को विस्तार से जानते हैं।
1. आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत, अबाधित ज्योर्तिमार्ग
स्तंभ पर संस्कृत में यह श्लोक अंकित है। इसका अर्थ है: इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक एक सीधी रेखा में बिना किसी बाधा के प्रकाश का मार्ग है। यह केवल एक धार्मिक दावा नहीं है, बल्कि एक भौगोलिक सत्य है। यदि आप मानचित्र पर सोमनाथ मंदिर के उस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक एक सीधी रेखा खींचें, तो आप पायेंगे कि बीच में कोई भी पहाड़, बड़ा द्वीप या भूखंड नहीं आता है। वहां केवल विशाल समुद्र है।
2. प्राचीन नेविगेशन और अक्षांश का ज्ञान
बाण स्तंभ यह सिद्ध करता है कि उस समय के भारतीयों को पृथ्वी के गोल होने और अक्षांश व देशांतर का सटीक ज्ञान था। सोमनाथ से दक्षिण ध्रुव की दूरी लगभग 12,465 किलोमीटर है। बिना किसी सैटेलाइट या आधुनिक जीपीएस के यह जान लेना कि हजारों किलोमीटर तक बीच में कोई जमीन नहीं है, उस समय के उन्नत समुद्री विज्ञान को दर्शाता है।
3. इसे ‘बाण’ स्तंभ क्यों कहते हैं?
स्तंभ के शीर्ष पर एक बाण बना हुआ है। इस बाण की नोक ठीक दक्षिण दिशा की ओर इशारा करती है। यह एक तरह का ‘दिशा सूचक’ है जो यह बताता है कि सत्य की खोज में या यात्रा में दक्षिण की ओर बढ़ने पर अंटार्कटिका तक कोई रुकावट नहीं आयेगी।
4. सामरिक और व्यापारिक महत्व
इतिहासकारों का मानना है कि यह स्तंभ केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि: यह प्राचीन भारतीय नाविकों के लिए एक ‘लाइटहाउस’ या ‘गाइड पोस्ट’ की तरह काम करता होगा। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत का समुद्री व्यापार और नौसेना का विस्तार कितना व्यवस्थित था।
5. अनसुलझा रहस्य
आज भी सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस समय के विद्वानों को कैसे पता चला कि दक्षिण ध्रुव जैसी कोई जगह मौजूद है? जबकि आधुनिक इतिहास के अनुसार अंटार्कटिका की खोज बहुत बाद में हुई। उन्होंने बिना हवाई सर्वेक्षण के इस अबाधित मार्ग की मैपिंग कैसे की? सोमनाथ मंदिर की इसी भौगोलिक विशिष्टता के कारण इसे पृथ्वी का केंद्र या एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना गया है।
सोमनाथ मंदिर से जुड़ी चंद्रमा यानी सोम की पौराणिक कथा
सोमनाथ मंदिर का नाम ‘सोम’ यानी चंद्रदेव के नाम पर पड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि चंद्रदेव को मिले एक भीषण श्राप से मुक्ति का स्थान है।
आइये जानते इस प्रसिद्ध पौराणिक कथा के बारे में:
पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियां थीं जिन्हें 27 नक्षत्र माना जाता है। इन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से ‘रोहिणी’ को सबसे अधिक प्रेम करते थे और अपना सारा समय उन्हीं के साथ बिताते थे। बाकी 26 बहनें इस उपेक्षा से दुखी हुईं और उन्होंने अपने पिता राजा दक्ष से इसकी शिकायत की। राजा दक्ष ने चंद्रदेव को कई बार समझाया कि वे सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करें, लेकिन चंद्रदेव नहीं माने। क्रोधित होकर राजा दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि: तुम्हारी चमक धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी और तुम ‘क्षय रोग’ से नष्ट हो जाओगे। श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव की चमक फीकी पड़ने लगी और वे धीरे-धीरे लुप्त होने लगे। चंद्रमा के तेज के बिना पृथ्वी पर वनस्पतियां सूखने लगीं और देवताओं में खलबली मच गयी। ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ने लगा। तब ब्रह्मा जी ने चंद्रदेव को सलाह दी कि वे गुजरात के प्रभास क्षेत्र जो वर्तमान में सोमनाथ है वहां जाकर भगवान शिव की तपस्या करें। चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के संगम पर ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का कठिन जाप किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।
चूंकि राजा दक्ष का श्राप पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता था, इसलिए भगवान शिव ने उसे बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने कहा कि महीने के 15 दिन तुम्हारी चमक कम होगी जिसे हम कृष्ण पक्ष कहते हैं, लेकिन अगले 15 दिन तुम्हारी चमक धीरे-धीरे फिर से बढ़ेगी और तुम पूर्णता को प्राप्त करोगे जिसे हम शुक्ल पक्ष कहते हैं।
चंद्रदेव ने कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उस स्थान पर भगवान शिव का एक भव्य मंदिर बनवाया। चंद्रमा के ‘नाथ’ यानी सोम के नाथ होने के कारण ही भगवान शिव का नाम ‘सोमनाथ’ पड़ा। माना जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग प्रथम ज्योतिर्लिंग है।
एक और रोचक बात: कहते हैं कि चंद्रमा ने यहां जिस कुंड में स्नान किया था, उसे ‘पावन प्रभास’ कहा जाता है। आज भी श्रद्धालु मानते हैं कि यहां स्नान करने से रोगों से मुक्ति मिलती है।

