विशेष
युवा अध्यक्ष के कायल दिखे मोदी, कहा नितिन मेरे बॉस
अध्यक्ष बनते कई चुनौतियां भी मुंह बाये खड़ी हैं, सबकी नजर टिकी
पुराने और युवा नेताओं के बीच समन्वय बनाने का भी चैलेंज, धोनी वाली सिचुएशन में हैं नबीन
नितिन नबीन दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, यानी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये हैं। वह 45 साल पुरानी इस पार्टी के सबसे युवा अध्यक्ष हैं। इसके साथ ही भाजपा में ‘नबीन युग’ का आगाज हो गया है और उम्मीद की जा रही है कि पार्टी में नये और बड़े बदलाव की शुरूआत हो जायेगी। नितिन नबीन भाजपा के न केवल सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, बल्कि वह पार्टी के पहले ऐसे राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जिनका जन्म पार्टी की स्थापना के बाद हुआ है। नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अब यह चर्चा आम है कि जिस पार्टी को बिहार में अब तक अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका नहीं मिला है, वहां के एक युवा नेता को पार्टी की कमान सौंप कर भाजपा कौन सी मंजिल हासिल करना चाहती है। इससे पहले कि नितिन नबीन के सामने आनेवाली चुनौतियों की चर्चा की जाये, भाजपा आलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष की ताजपोशी सिर्फ प्रतीकात्मक बदलाव का पर्याय भर बन कर न रह जाये। पार्टी को यह साबित करना होगा कि वह अगली पीढ़ी के नेतृत्व में जाने के लिए न केवल तैयार है, बल्कि इच्छुक भी है। भाजपा आज लोकप्रियता के जिस शिखर पर है, वहां पर बने रहने के लिए उसे कड़ी मेहनत करनी होगी, लेकिन इसमें सबसे बड़ी भूमिका निस्संदेह नये अध्यक्ष की होगी। वहीं नयी बीजेपी में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी संतुलन बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका दिया जाना बहुत जरूरी है। भाजपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन की ताजपोशी के बाद यह जानना भी दिलचस्प होगा कि पार्टी को वह किस दिशा में ले जाना चाहेंगे। क्या है नितिन नबीन की ताजपोशी के मायने और क्या हैं उनकी चुनौतियां, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
लंबे इंतजार के बाद दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने अपने नये राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव कर लिया है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे नितिन नबीन ने राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया है। नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पक्ष में 37 नामांकन पत्र दाखिल किये गये थे। किसी दूसरे ने नामांकन दाखिल नहीं किया। इसलिए वह सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गये हैं। 45 साल के नबीन भाजपा के 12वें और सबसे युवा अध्यक्ष हैं। उनका कार्यकाल तीन साल के लिए होगा। भाजपा अध्यक्ष पद के साथ-साथ नबीन को चुनौतियां भी काफी बड़े आकार की मिलेंगी। इनमें शामिल हैं कई राज्यों में होने वाला विधानसभा चुनाव, 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी, महिला आरक्षण और जाति जनगणना से पैदा होने वाली चुनौतियां। ये वो चुनौतियां हैं, जो देश की राजनीति को नया आकार देंगी।
भाजपा का चौंकाने वाला फैसला
भाजपा ने नितिन नबीन को दिसंबर में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर सबको चौंका दिया था। पांच बार के विधायक नबीन के पास इससे पहले सबसे बड़ा पद भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव का मिला था। इस जिम्मेदारी को निभाते हुए नबीन ने अपनी कार्यकुशलता की छाप छोड़ी थी। इसके बाद नबीन को छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए सह-प्रभारी नियुक्त किया गया था। कहा जाता है कि प्रचार अभियान और चुनाव प्रबंधन की रणनीति बनाने में नबीन का अहम योगदान था। इसी की बदौलत भाजपा कांग्रेस को हरा पाने में कामयाब हो पायी थी। कहा जाता है कि इसी कामयाबी का फल पार्टी आलाकमान ने नबीन को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर दिया। भाजपा आलाकमान के इस फैसले ने सबको चौंकाया था। भाजपा का अध्यक्ष बनने वाले नबीन बिहार के पहले नेता हैं। वह भाजपा के पहले कायस्थ अध्यक्ष भी होंगे।
पहली चुनौती सीनियर और युवा नेताओं में समन्वय
राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बिहार से आने वाले इन युवा नेता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी टीम का गठन करना होगा। पार्टी संविधान के मुताबिक पार्टी में सर्वोच्च फैसला लेने वाली इकाई पार्टी का संसदीय बोर्ड है। इसके बाद केंद्रीय चुनाव समिति का नंबर आता है, जो चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन करता है। फिलहाल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष जेपी नड्डा हैं, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद नितिन नबीन ही पार्टी का फैसला लेने वाले इस सर्वोच्च इकाई के अध्यक्ष होंगे। वर्तमान में नड्डा के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह, बीएस येदियुरप्पा, सर्बानंद सोनोवाल, के लक्ष्मण, इकबाल सिंह लालपुरा, सुधा यादव और सत्यनारायण जटिया संसदीय बोर्ड के सदस्य हैं। वहीं पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष संसदीय बोर्ड के सचिव के तौर पर इसमें शामिल हैं। इनमें से बीएल संतोष को छोड़कर बाकी सभी नेता 60 से ज्यादा उम्र के हैं। संसदीय बोर्ड के ये सारे सदस्य पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के भी सदस्य हैं। संसदीय बोर्ड में शामिल इन 11 नेताओं के अलावा भूपेंद्र यादव, देवेंद्र फडणवीस, ओम माथुर और वनथी श्रीनिवासन केंद्रीय चुनाव समिति में शामिल हैं। सरकार के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नितिन नबीन की अध्यक्षता वाले पार्टी के संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति दोनों में ही शामिल रहेंगे। वहीं सरकार और पार्टी के अहम नेता के तौर पर अमित शाह भी इन दोनों समितियों का हिस्सा रहेंगे। लेकिन युवा नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी देने के लक्ष्य और नयी भाजपा के गठन के लिए कई दिग्गज नेताओं को इससे बाहर जाना ही पड़ेगा। इन दोनों समितियों का पुनर्गठन करने के बाद पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन को अपनी राष्ट्रीय टीम- यानी राष्ट्रीय उपाध्यक्षों, राष्ट्रीय महासचिवों, राष्ट्रीय सचिवों और राष्ट्रीय प्रवक्ताओं के साथ-साथ विभिन्न मोर्चों , समितियों और विभागों के मुखियाओं की भी नियुक्ति करनी पड़ेगी।
यह बात तो साफ है कि ये सारे फैसले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सहमति से ही लिये जायेंगे। हालांकि राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे सिंधिया जैसे नेताओं के बारे में अंतिम फैसला करने से पहले संघ से भी चर्चा की जायेगी। पार्टी की राष्ट्रीय टीम में ऐसे कई अन्य नेता भी शामिल हैं, जो अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते हैं और इसलिए उन्हें हटाने से पहले कई समीकरणों का ध्यान भी रखना पड़ेगा। ऐसे में यह देखना बहुत दिलचस्प रहेगा कि नितिन नबीन इन तमाम चुनौतियों से निपटते हुए अपनी नयी टीम कैसे तैयार कर पाते हैं और कैसे तमाम उम्र के नेताओं यानी सीनियर और युवा के बीच संतुलन बना पाने में कामयाब हो पाते हैं।
पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा
नबीन ऐसे समय अध्यक्ष बन रहे हैं, जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और असम में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां भाजपा आज तक सरकार नहीं बना पायी है। वहीं भाजपा के सामने असम में तीसरी बार और पुडुचेरी में दूसरी बार सरकार बनाने की चुनौती है। ये चुनावी राज्य भाजपा के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, इसे इस तरह समझ सकते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी पिछले साल जुलाई से अब तक पश्चिम बंगाल का चार बार, असम का तीन और तमिलनाडु का दो बार दौरा कर चुके हैं। असम में भाजपा को कांग्रेस से तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उसने भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए आठ दलों का गठबंधन बनाया है। भाजपा ने असम में 126 सीटों वाली विधानसभा में 100 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। वहीं अगर पश्चिम बंगाल की बात करें, तो राज्य में पिछले तीन बार से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। अगर इस बार तृणमूल कांग्रेस फिर जीत जाती है, तो ममता बनर्जी चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगी। लगातार चार बार सीएम बनने वाली वह देश की पहली नेता होंगी।
तमिलनाडु में भाजपा का प्रदर्शन सुधारने की चुनौती
वहीं तमिलनाडु और केरल में भाजपा आज तक सरकार नहीं बना पायी है। तमिलनाडु की राजनीति द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सिमटी हुई है। भाजपा ने द्रमुक की मौजूदा सरकार को हटाने के लिए अन्नाद्रमुक से हाथ मिलाया है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक को चुनौती देने के लिए अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्ती कषगम भी चुनाव मैदान में होगी। इस त्रिकोणीय लड़ाई में भाजपा को लाभ मिलने की उम्मीद है। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तमिलनाडु में 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन किसी सीट पर उसे जीत नहीं मिली थी। लेकिन उसके उम्मीदवार नौ सीटों पर दूसरे और 13 सीटों पर तीसरे नंबर पर आये थे। इस चुनाव में भाजपा ने अपना वोट फीसदी दहाई में कर लिया था। वहीं केरल देश का एकमात्र राज्य है, जहां अभी भी लेफ्ट की सरकार है। भाजपा इस राज्य में अब तक एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पायी है। वहीं पुडुचेरी में भाजपा आॅल इंडिया एनआर कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार चला रही है। इन तीनों राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन सुधारना नबीन की बड़ी चुनौती होगी।
जाति जनगणना से पैदा होने वाली चुनौतियां
देश में जनगणना का काम शुरू हो गया है। आजादी के बाद पहली बार देश में जाति जनगणना भी करायी जा रही है। माना जा रहा है कि इसके नतीजे देश की राजनीति पर काफी असर डालेंगे। इन बदलावों से तालमेल बिठाना भी नबीन के सामने आने वाली चुनौतियों में प्रमुख होगी। जनगणना के बाद ओबीसी जातियों और सवर्ण जातियों की सही-सही जनसंख्या का पता चलेगा। माना जा रहा है कि इससे पिछड़ी जातियों की राजनीति को नये पंख मिल जायेंगे। पिछले कुछ सालों में धर्म और मंदिर की राजनीति छोड़कर जाति की राजनीति की ओर कदम बढ़ा रही भाजपा के लिए नये राजनीतिक माहौल में सामंजस्य बिठाना भी बड़ी चुनौती होगी। जनगणना के नतीजे आने के बाद देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन का जटिल काम शुरू होगा। इसी के बाद विधानसभा और संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू होगा। महिला आरक्षण कानून बन चुका है। इन बदले हुए समीकरणों में भाजपा को आगे ले जाना और जीत की लय को बरकरार रखना भी नबीन के सामने चुनौती की तरह होगा।
इसके बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती 2029 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करना है, क्योंकि भाजपा 2024 के चुनाव में 400 सीटों का लक्ष्य होने के बाद भी काफी पीछे रह गयी थी। इसका परिणाम यह हुआ था कि उसे गठबंधंन की सरकार चलानी पड़ रही है। भाजपा को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश ने दिया था, जहां सपा के पीडीए ने भाजपा के विजय रथ को रोक दिया था। ऐसे में नबीन को यूपी में सपा के पीडीए की काट खोजनी होगी। साल 2029 का लोकसभा चुनाव नये परिसीमन और महिला आरक्षण के साथ कराया जायेगा। ऐसे में नयी और बदली हुई परिस्थितियों में नबीन को पार्टी की रणनीति तैयार करनी होगी।
नये अध्यक्ष के चुनाव में दिखी झारखंड भाजपा की एकजुटता
भाजपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया में झारखंड भाजपा ने जिस एकजुटता का परिचय दिया, उसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। नितिन नबीन के नामांकन के समय पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष आदित्य प्रसाद साहू, पार्टी विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी और राष्ट्रीय परिषद के अन्य सदस्यों ने हाथ में हाथ डाल कर नितिन नबीन के पक्ष में नामांकन दाखिल किया, उससे एक बात साफ हो गयी कि झारखंड भाजपा में गुटबाजी की तमाम चर्चाएं महज अफवाह हैं। झारखंड भाजपा की पूरी टीम पार्टी को एक बार फिर से राज्य फतह करने की दिशा में एकजुट होकर कोशिश कर रही है।
44 साल की उम्र में वाजपेयी बने थे जनसंघ के अध्यक्ष
अटल बिहारी वाजपेयी जब 1968 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने, तो उनकी उम्र महज 44 साल हो रही थी। लालकृष्ण आडवाणी भी 46 साल की उम्र में 1973 में जनसंघ के अध्यक्ष बने थे। 1977 में भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया, लेकिन यह विलय तीन साल से ज्यादा नहीं चला। छह अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी बनी और पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने। तब भाजपा कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश कर रही थी। 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को केवल दो सीटें मिलीं। इस चुनावी नतीजे को लेकर भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब माई कंट्री माई लाइफ में लिखा है, इस चुनावी नतीजे ने हमें वहां पहुंचा दिया था, जहां हम जनसंघ के जमाने में 1952 के पहले चुनाव में थे। इस चुनावी नतीजे के बाद अटल जी ने दो प्रश्न रखे थे- क्या 1977 में जनसंघ को जनता पार्टी में मिलाना और फिर 1980 में जनता पार्टी से अलग हो जाने का निर्णय ही पार्टी की हार कारण बना? दूसरा सवाल यह कि क्या भाजपा को फिर से जनसंघ हो जाना चाहिए? भाजपा अब इन दोनों सवालों से बहुत आगे निकल चुकी है और 45 वर्ष से ज्यादा का सफर तय कर चुकी है। नितिन नबीन का जन्म भाजपा के जन्म से करीब दो महीने बाद 23 मई 1980 को हुआ था। अब उन्हीं नितिन नबीन के पास भाजपा की जिम्मेदारी है।

