Close Menu
Azad SipahiAzad Sipahi
    Facebook X (Twitter) YouTube WhatsApp
    Thursday, February 5
    • Jharkhand Top News
    • Azad Sipahi Digital
    • रांची
    • हाई-टेक्नो
      • विज्ञान
      • गैजेट्स
      • मोबाइल
      • ऑटोमुविट
    • राज्य
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
    • रोचक पोस्ट
    • स्पेशल रिपोर्ट
    • e-Paper
    • Top Story
    • DMCA
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Azad SipahiAzad Sipahi
    • होम
    • झारखंड
      • कोडरमा
      • खलारी
      • खूंटी
      • गढ़वा
      • गिरिडीह
      • गुमला
      • गोड्डा
      • चतरा
      • चाईबासा
      • जमशेदपुर
      • जामताड़ा
      • दुमका
      • देवघर
      • धनबाद
      • पलामू
      • पाकुर
      • बोकारो
      • रांची
      • रामगढ़
      • लातेहार
      • लोहरदगा
      • सरायकेला-खरसावाँ
      • साहिबगंज
      • सिमडेगा
      • हजारीबाग
    • विशेष
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • देश
    • दुनिया
    • राजनीति
    • राज्य
      • मध्य प्रदेश
    • स्पोर्ट्स
      • हॉकी
      • क्रिकेट
      • टेनिस
      • फुटबॉल
      • अन्य खेल
    • YouTube
    • ई-पेपर
    Azad SipahiAzad Sipahi
    Home»विशेष»चुनाव से पहले निर्णायक चौराहे पर खड़ा है पश्चिम बंगाल
    विशेष

    चुनाव से पहले निर्णायक चौराहे पर खड़ा है पश्चिम बंगाल

    shivam kumarBy shivam kumarJanuary 22, 2026No Comments7 Mins Read
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Share
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram LinkedIn Pinterest Email

    विशेष
    सत्ता, संघर्ष, कानून और जनभावना की धाराएं एक-दूसरे से टकराने को तैयार
    ‘भद्र प्रदेश’ के लिए यह लोकतंत्र, विकास और अस्मिता की निर्णायक घड़ी है
    टीएमसी ही नहीं, भाजपा के लिए भी यह चुनाव दीवार पर अंतिम प्रहार होगा

    विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े पश्चिम बंगाल की राजनीति आज संकीर्णता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसने विकास की गति को गंभीर रूप से अवरुद्ध किया है। कभी देश की आर्थिक, औद्योगिक और बौद्धिक राजधानी कहलाने वाला बंगाल- विशेषकर कोलकाता आज निवेश, उद्योग और रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ता हुआ दिखाई देता है। ममता बनर्जी के लंबे शासनकाल में औद्योगिक विश्वास का क्षरण, पूंजी पलायन, बंद होती इकाइयां और युवाओं का अन्य राज्यों की ओर पलायन इस गिरावट के स्पष्ट संकेत हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर उठते प्रश्न, विपक्षी आवाजों का दमन और चुनावी हिंसा की घटनाएं राज्य के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पर गहरी चोट करती हैं। इसके साथ ही राज्य में सामाजिक ताने-बाने को लेकर बढ़ती आशंकाएं भी कम चिंताजनक नहीं हैं। अनेक क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक संबंधों को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं; विशेषकर बहुसंख्यक समाज के एक हिस्से में असुरक्षा की भावना ने जन-मन को आहत किया है। इन घटनाओं और धारणाओं ने जनता के भरोसे को कमजोर किया है और शासन के प्रति निराशा को बढ़ाया है। राजनीति जब पहचान और विभाजन के इर्द-गिर्द सिमटती है, तो विकास, समावेशन और सामाजिक सौहार्द पीछे छूट जाते हैं, यही आज के बंगाल की त्रासदी बनती दिख रही है। ऐसे समय में बंगाल की जनता के लिए अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग होना अनिवार्य है। यह राज्य केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि उसकी अस्मिता उसकी बौद्धिक परंपरा, भावनात्मक संवेदनशीलता, धार्मिक सह अस्तित्व, आध्यात्मिक खोज और समृद्ध साहित्यिक विरासत से निर्मित है- गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से स्वामी विवेकानंद तक की धरोहर इसे दिशा देती रही है। दंगों, हिंसा और भय के साये में इस अस्मिता पर जो दाग लगे हैं, उन्हें मिटाने का मार्ग शांतिपूर्ण, जागरूक और निर्भीक लोकतांत्रिक सहभागिता से ही निकलेगा। आगामी चुनाव जनता के लिए आत्ममंथन और आत्मनिर्णय का अवसर हैं- जहां मत केवल सत्ता नहीं, बल्कि बंगाल के भविष्य, उसकी संस्कृति और उसके लोकतांत्रिक आत्मसम्मान की रक्षा का माध्यम बनना चाहिए। बंगाल की बनती नयी तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यह तस्वीर संघर्ष और संभावनाओं, आशंकाओं और उम्मीदों से बनी है। एक ओर सत्ता का अनुभव और जनाधार है, तो दूसरी ओर आक्रामक विपक्ष और राष्ट्रीय राजनीति की ताकत। लोकतंत्र की यही खूबी है कि वह अंतिम शब्द जनता को देता है। बंगाल के मतदाता ही तय करेंगे कि शह-मात की इस राजनीति में अगली चाल किसकी होगी और कौन-सा पक्ष अंतत: बाजी मारेगा। ‘भद्र प्रदेश’ में चुनाव से पहले क्या है माहौल और किस तरह की दुविधा में हैं लोग, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां सत्ता, संघर्ष, कानून और जनभावना-चारों धाराएं एक-दूसरे से टकराती हुई दिखाई देती हैं। यह टकराव केवल भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई भर नहीं है, बल्कि यह उस शासन शैली, लोकतांत्रिक मर्यादा और विकास दृष्टि की भी परीक्षा है, जिसके आधार पर बंगाल अपनी आने वाली राजनीतिक दिशा तय करेगा। लंबे समय तक ‘खेला होबे’ के नारे के सहारे भाजपा को रोकने में सफल रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने इस बार परिस्थितियां अपेक्षाकृत अधिक जटिल, चुनौतीपूर्ण और बहुआयामी नजर आ रही हैं। आज समूचे देश की नजरें पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं। वहां आगामी विधानसभा चुनाव काफी रोमांचक और निर्णायक होगा, जिसमें पश्चिम बंगाल का नया भविष्य बुनने की दिशाएं उद्घाटित होंगी।

    राज्य की वर्तमान स्थिति
    जहां तक पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति का सवाल है, तो यहां एक ओर केंद्र और राज्य के बीच टकराव अपने चरम पर है, तो दूसरी ओर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, अदालती टिप्पणियां और कानूनी बहसें राजनीतिक विमर्श को नियंत्रित कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने केवल एक कानूनी प्रश्न ही नहीं उठाया, बल्कि यह संकेत भी दिया कि राज्य सरकारों द्वारा केंद्रीय जांच एजेंसियों के कामकाज में हस्तक्षेप की सीमाएं कहां तक हो सकती हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने ममता बनर्जी की उस राजनीतिक छवि को आंशिक रूप से प्रभावित किया है, जो अब तक स्वयं को केंद्र के कथित दमन के विरुद्ध संघीय ढांचे की रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं। अदालतों में लंबी चलने वाली कानूनी लड़ाइयों का राजनीतिक प्रभाव तुरंत और गहरा होता है, विशेष कर तब, जब चुनाव नजदीक हों और जनता का ध्यान प्रशासनिक उपलब्धियों से हटकर आरोप-प्रत्यारोप पर केंद्रित होने लगे।

    बंगाल की राजनीति की खास विशेषता
    बंगाल की राजनीति की एक विशिष्ट विशेषता यह रही है कि यहां विचारधारा और भावनाएं अत्यंत तीव्र रूप से अभिव्यक्त होती हैं। वाम मोर्चे के लंबे शासन के बाद ममता बनर्जी का उदय एक जनांदोलन के रूप में हुआ था। उन्होंने न केवल वामपंथी वर्चस्व को तोड़ा, बल्कि खुद को गरीब, हाशिये पर खड़े वर्ग और क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज के रूप में स्थापित किया। शुरूआती वर्षों में उनकी सरकार ने कुछ कल्याणकारी योजनाओं और सशक्त राजनीतिक संप्रेषण के माध्यम से जनता का विश्वास भी अर्जित किया, लेकिन समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण, संगठन पर अत्यधिक नियंत्रण और विरोध के प्रति असहिष्णुता जैसे आरोप भी समानांतर रूप से उभरते गये।

    भाजपा का बढ़ता जनाधार
    भाजपा ने इन्हीं कमजोरियों को अपना राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश की है। 2019 के लोकसभा चुनावों से लेकर अब तक भाजपा ने बंगाल में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया है और हिंदुत्व, राष्ट्रवाद तथा भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया है। हालांकि विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भारी बहुमत से वापसी की, लेकिन यह भी सच है कि भाजपा बंगाल की राजनीति में एक स्थायी और निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी है। मत प्रतिशत में अंतर और सीटों का आंकड़ा भाजपा के लिए भले ही निराशाजनक रहा हो, पर संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक आधार का विस्तार उसके लिए भविष्य की संभावनाओं के द्वार खोलता है।

    आम लोगों की चिंता
    यह सच है कि हाल के वर्षों में बंगाल में विकास का प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे छूटता दिखाई दिया है। उद्योग, निवेश और रोजगार के मुद्दे राजनीतिक शोर में दब गये हैं। आम जनता की एक बड़ी चिंता यह भी है कि राज्य की राजनीति निरंतर टकराव और हिंसा के आरोपों से क्यों घिरी रहती है। चुनावी हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हमले और प्रशासन की निष्पक्षता पर उठते सवाल राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। पड़ोसी देशों से अवैध घुसपैठ, सीमावर्ती इलाकों में जनसांख्यिकीय बदलाव और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। इन मुद्दों पर ममता सरकार का रुख अक्सर रक्षात्मक दिखाई देता है, जबकि भाजपा इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर व्यापक समर्थन जुटाने का प्रयास करती है।

    बढ़ा है भाजपा का आत्मविश्वास, पर रास्ता आसान नहीं
    महाराष्ट्र के शहरी निकाय चुनावों और बिहार में भाजपा को मिली हालिया सफलता ने पार्टी के आत्मविश्वास को निश्चित रूप से बढ़ाया है। भाजपा का यह विश्वास कि बंगाल अब भी राजनीतिक परिवर्तन के लिए तैयार है, केवल चुनावी आंकड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि वह इसे एक लंबी रणनीति का हिस्सा मानती है। लेकिन बंगाल कोई साधारण राजनीतिक मैदान नहीं है। यहां की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक स्मृति किसी भी दल के लिए आसान नहीं रही है। ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनकी जमीनी पकड़ और भावनात्मक अपील है, जो उन्हें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से अलग, एक क्षेत्रीय और स्थानीय नेता के रूप में स्थापित करती है।
    आने वाले विधानसभा चुनाव वास्तव में इस बात की कसौटी होंगे कि जनता विकास, स्थिरता और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देती है या फिर भावनात्मक और पहचान आधारित राजनीति को। क्या ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता में लौटकर यह सिद्ध कर पायेंगी कि केंद्र से टकराव ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है, या भाजपा जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल होगी कि परिवर्तन ही स्थायित्व और विकास का रास्ता है, यह प्रश्न अभी खुला हुआ है। अदालती प्रक्रियाएं, राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी रणनीतियां अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम निर्णय बंगाल की जनता के हाथ में है।

    Share. Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Previous Articleसारंडा में सुरक्षाबलों व नक्सलियों में भीषण मुठभेड़, एक करोड़ के इनामी अनल दा समेत 11 से ज्यादा नक्सली ढेर
    Next Article निफ्टी भी हरे निशान से दूर, रुपया डॉलर के मुकाबले 17 पैसे मजबूत
    shivam kumar

      Related Posts

      मोदी की कूटनीति की जीत है टैरिफ घटाने का ट्रंप का फैसला

      February 4, 2026

      भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव को सशक्त करेगा यह रिफार्म बजट 26-27

      February 2, 2026

      यूजीसी: कह रहे लोग कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना

      January 25, 2026
      Add A Comment
      Leave A Reply Cancel Reply

      Recent Posts
      • मीडिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट का आगाज, भैरवी-अमानत ने दर्ज की जीत
      • बिहार बजट: सरकार की प्राथमिकताएं जनता के हितों से दूर: जन सुराज
      • मिथिला की कला-संस्कृति को मिलेगी वैश्विक पहचान, अयोध्या में बनेगी ‘वैदेही आर्ट गैलरी’
      • संसद परिसर में राहुल गांधी–रवनीत सिंह बिट्टू के बीच तीखी नोकझोंक
      • मणिपुर से हटा राष्ट्रपति शासन, खेमचंद सिंह के नेतृत्व में बनने जा रही सरकार
      Read ePaper

      City Edition

      Follow up on twitter
      Tweets by azad_sipahi
      Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

      Palamu Division

      • Garhwa
      • Palamu
      • Latehar

      Kolhan Division

      • West Singhbhum
      • East Singhbhum
      • Seraikela Kharsawan

      North Chotanagpur Division

      • Chatra
      • Hazaribag
      • Giridih
      • Koderma
      • Dhanbad
      • Bokaro
      • Ramgarh

      South Chotanagpur Division

      • Ranchi
      • Lohardaga
      • Gumla
      • Simdega
      • Khunti

      Santhal Pargana Division

      • Deoghar
      • Jamtara
      • Dumka
      • Godda
      • Pakur
      • Sahebganj

      Subscribe to Updates

      Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

      © 2026 AzadSipahi. Designed by Launching Press.
      • Privacy Policy
      • Terms
      • Accessibility

      Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

      Go to mobile version