Ranchi: खबर विशेष में आज हम बात कर रहे हैं लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की तैयारी की। लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा पूरे दम खम के साथ मैदान में कूद चुकी है। लोकसभा की 14 सीटों को पांच कलस्टर में बांट कर केंद्रीय नेताओं का कार्यक्रम कराया जा रहा है। इसी कड़ी में 16 फरवरी को गोड्डा, दुमका और साहेबगंज कलस्टर का सम्मेलन गोड्डा में होगा, जिसे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह संबोधित करेंगे। पहले यह कयास जोरों पर था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा झारखंड के आधे से ज्यादा सांसदों का टिकट काटेगी। लेकिन जो बातें अब सामने आ रही हैं, उस हिसाब से एक दो अपवाद छोड़ वर्तमान किसी भी सांसद पर खतरा नहीं दिख रहा। भाजपा के जो नेता पहले उम्मीदवार बदलने की तरफदारी कर रहे थे, वही अब कह रहे हैं कि युद्ध के समय सेनापति नहीं बदला जाता। लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की झारखंड को लेकर क्या है रणनीति इस पर प्रकाश डाल रहे हैं आजाद सिपाही के राजनीतिक संपादक ज्ञान रंजन।
भाजपा ने लोकसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है। फरवरी महीने के पहले सप्ताह से ही भाजपा के केंद्रीय नेताओं का झारखंड में दौरा शुरू हो गया है। दो महीने पहले तक ये बातें चल रही थीं कि झारखंड के कई भाजपा सांसदों का इस बार पत्ता कट सकता है। इस लिस्ट में उम्रदराज सांसद तो थे ही उनके साथ युवा सांसदों का भी नाम आ रहा था। मसलन यह कहा जा रहा था कि खूंटी, रांची और धनबाद के साथ-साथ गोड्डा से निशिकांत दुबे, हजारीबाग से जयंत सिन्हा, कोडरमा से रवींद्र राय, गिरिडीह से रवींद्र पांडेय और चतरा से सुनील सिंह का टिकट कट सकता है। लेकिन देश के बदले राजनीतिक परिदृश्य में यह संभव नहीं दिख रहा है। चाहकर भी भाजपा कुछ अपवाद को छोड़ अपने वर्तमान सांसदों का टिकट नहीं काट सकती है। वजह यह है कि भाजपा ने सेकेंड लाइन का नेता ही नहीं खड़ा किया है। झारखंड में एक-दो सीटों को छोड़ दिया जाये, तो भाजपा के पास चुनाव लड़ने लायक दूसरा चेहरा नहीं है। झारखंड भाजपा के सबसे उम्रदराज सांसद कड़िया मुंडा हैं। लंबे अर्से से खूंटी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कहा यह जा रहा था कि उनकी उम्र को देखकर पार्टी उन्हें इस बार टिकट नहीं देगी और उन्हें कोई नयी जिम्मेदारी देगी। लेकिन भाजपा के पास खूंटी में कड़िया मुंडा का कोई विकल्प नहीं है। कड़िया मुंडा की जो पहचान है, वह सिर्फ भाजपा से नहीं है। झारखंड के कद्दावर नेताओं में उनका नाम शुमार है। उनकी इमानदार छवि रही है। लोगों के बीच उनकी अपनी अलग पहचान है। सबसे बड़ी बात यह है कि खूंटी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाले सभी विधानसभा क्षेत्रों में वह लोकप्रिय हैं। कभी किसी विवाद से इनका नाता नहीं रहा है। कहा यह जा रहा था कि खूंटी से कड़िया मुंडा की जगह पर झारखंड के ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा या पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को जगह दी जायेगी। नीलकंठ सिंह मुंडा सरकार में मंत्री रहते हुए भी खूंटी विधानसभा से बाहर नहीं निकल सके हैं। अर्जुन मुंडा लोकसभा चुनाव लड़ना ही नहीं चाहते हैं। तोरपा विधानसभा से कोचे मुंडा हैं, लेकिन लगातार दो बार से भाजपा उन्हें तोरपा से टिकट दे रही है और वह विधानसभा चुनाव भी नहीं जीत पा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के पास कड़िया मुंडा का कोई विकल्प नहीं है। दूसरा नाम धनबाद के पीएन सिंह का आ रहा था। धनबाद से वह लगातार दो बार से सांसद हैं। पहले विधायक भी रह चुके हैं। इनका भी कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। गोड्डा से निशिकांत दुबे सांसद हैं। पहले यह कहा जा रहा था कि इस बार वह भी टिकट की दावेदारी में पीछे हैं। लेकिन इनका विकल्प भी पार्टी को नहीं सूझ रहा है। इनकी जगह पर झारखंड सरकार के श्रम मंत्री राज पलिवार का नाम आ रहा था। मगर बदले राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी आलाकमान यहां प्रत्याशी बदलने को लेकर संजीदा नहीं है। हजारीबाग और चतरा के सांसद भी रेड जोन में थे। जिस तरह से चतरा के सांसद सुनील सिंह ने अपने बूते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम अपने क्षेत्र में कराया और 17 फरवरी को जयंत सिन्हा हजारीबाग में प्रधानमंत्री का कार्यक्रम करा रहे हैं, अब इस संभावना पर भी विराम लग गया है। वैसे भी हजारीबाग में भाजपा के पास जयंत सिन्हा का विकल्प नहीं है। चतरा में भी सुनील सिंह का विकल्प नजर नहीं आ रहा। भाजपा के कुछ नेता चतरा में अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश की पहचान भाजपा पार्टी मुख्यालय तक ही सीमित है। फील्ड में उनको लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है। उनमें कुछ नेता तो ऐसे हैं, जो कभी चुनाव रण में उतरे ही नहीं हैं और एक-दो ऐसे हैं, जिन्होंने विधानसभा में अपना भाग्य तो आजमाया, लेकिन उन्हें जो वोट मिले, वे भाजपा के हिसाब से शर्मनाक है। जानकारी के अनुसार गिरिडीह के सांसद रवींद्र पांडेय पर अब भी खतरा मंडरा रहा है। हाल के दिनों में उन्होंने विवाद की चादर ओढ़ ली है। और यही विवाद उनके लिए खतरे की घंटी है। एक वजह उनके द्वारा किया जा रहा पार्टी विरोधी काम भी है। पिछले कई महीने से सांसद रवींद्र्र पांडेय और बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो के बीच चल रही टशन ने पार्टी को गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र में हाशिये पर खड़ा किया है। प्रदेश नेतृत्व के साथ केंद्रीय नेतृत्व भी इस बात को लेकर गंभीर है। झारखंड भाजपा की स्थिति यह है कि कहने को तो वह कहती है कि पार्टी में नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन ऐसा है नहीं। एक भी जगह पर दूसरे नंबर पर मजबूत उम्मीदवार नहीं है। प्रदेश संगठन में ही देखा जाये तो पार्टी के उपाध्यक्ष हों, महासचिव हों, मंत्री हों या प्रवक्ता ऐसे लोगों की जमात ज्यादा हैं, जिनका वास्ता भाजपा से हाल के दिनों में हुआ है। ऐसे लोगों को संगठन में वरिष्ठ पदों पर रखा गया है, जिन्हें भाजपा की नीतियों से वास्ता नहीं रहा है। संगठन की बात तो अलग है सरकार में शामिल मंत्रियों में चार मंत्री ऐसे हैं, जो भाजपा में या तो चुनाव से पहले आये हैं या चुनाव जीतने के बाद। कह सकते हैं कि जो सीन लोकसभा चुनाव को लेकर बन रहा है भाजपा अब प्रत्याशी को बदलने की स्थिति में नहीं है। बदलने की अगर मंशा भी हो, तो योग्य उम्मीदवार का न होना उसकी मजबूरी है।
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