नयी दिल्ली। भाजपा करीब तीन दशक के बाद अपने संस्थापक और भारतीय राजनीति के सबसे पुराने चेहरे लालकृष्ण आडवाणी के बिना ही चुनाव मैदान में उतरेगी। लगातार दूसरी बार सत्ता पाने के लिए प्रयासरत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को इस बार पार्टी के मजबूत स्तंभ कहे जानेवाले आडवाणी का साथ नहीं मिलेगा।
आडवाणी के चुनाव नहीं लड़ने के फैसले के पीछे भी बेहद रोचक कहानी है। जानकारी के अनुसार पार्टी का शीर्ष नेतृत्व काफी समय से गांधीनगर सीट पर उम्मीदवार बदलना चाहता था, लेकिन भाजपा के संस्थापक, भारतीय राजनीति के सबसे उम्रदराज लालकृष्ण आडवाणी का टिकट काटना इतना आसान नहीं था। दिल्ली में राष्ट्रीय अधिवेशन तक शीर्ष नेतृत्व यह साहस नहीं जुटा पा रहा था।
बताते हैं 75 साल से अधिक उम्र के लोगों को टिकट देने या न देने के निर्णय में भी सबसे बड़ी बाधा आडवाणी ही थे। इसके बाद आडवाणी के सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वह गांधीनगर सीट से अपनी बेटी को प्रत्याशी बनाने की सहमति दे दें। लेकिन आडवाणी ने कहा कि, उन्होंने जीवन भर राजनीति में परिवारवाद का विरोध किया है। इसके बाद आडवाणी ने मंतव्य समझ कर गांधीनगर से चुनाव न लड़ने की इच्छा जाहिर की और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने प्रधानमंत्री से मशविरा करके उम्मीदवार बदल लिया। अब अमित शाह गांधीागर से भाजपा का चेहरा होंगे।
आडवाणी की सफलता के पीछे अमित शाह थे: जावड़ेकर
इस बीच केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि सभी चुनावों में आडवाणी की सफलता के पीछे अमित शाह थे। वह इस सीट के प्रभारी थे। शाह को रणनीतिकार बताते हुए जावड़ेकर ने कहा, ‘आडवाणी पूरे चुनावी अभियान में यात्रा करते थे, लेकिन वह शाह थे, जो हर बार उनकी जबरदस्त जीत सुनिश्चित करते थे।’ आडवाणी 1998 से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। गौरतलब है कि भाजपा के पितामह कहे जाने वाले आडवाणी की छत्रछाया से मुक्त होकर चुनाव लड़ना एक तरह से भाजपा में पीढ़ीगत बदलाव पर आखिरी मुहर है।