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    Home»Top Story»30 लाख विस्थापितों के घाव पर मरहम लगायेंगे हेमंत
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    30 लाख विस्थापितों के घाव पर मरहम लगायेंगे हेमंत

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskMarch 20, 2020No Comments5 Mins Read
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    आज से करीब 20 साल पहले 15 नवंबर 2000 को भारत के राजनीतिक नक्शे पर 28वें राज्य के रूप में झारखंड का उदय हुआ था, तब प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर यहां की तीन करोड़ आबादी को लगा था कि अब उसके बुरे दिन खत्म हो गये हैं। झारखंड अलग राज्य की मांग और इसके गठन के पीछे की राजनीतिक वजहें भले ही कुछ और हों, लेकिन इसकी एक बड़ी सामाजिक वजह विस्थापन की समस्या थी। खनिज संपदा से भरपूर इस राज्य में स्वाभाविक रूप से उद्योग-धंधों का विकास हुआ और इसका सीधा असर यहां के निवासियों पर पड़ा। खान, उद्योग और शहरीकरण के कारण बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ा। एक प्रभावी पुनर्वास नीति के अस्तित्व में रहने के बावजूद इन विस्थापितों के बड़े हिस्से को न समुचित मुआवजा मिला और न ही उन्हें पुनर्वासित किया गया। इसके पीछे के भी कई कारण रहे, जिसमें भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और अशिक्षा प्रमुख है। 1947 में आजादी के बाद से ही इस इलाके में विस्थापन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है, लेकिन इन परियोजनाओं से विस्थापित होनेवालों के दर्द को समझने की कभी किसी ने इमानदार कोशिश नहीं की। झारखंड बनने के 20 साल बाद अब हेमंत सोरेन सरकार ने इस दर्द को महसूस किया है और पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने विस्थापितों की समस्या को विमर्श के केंद्र में ला दिया है। मुख्यमंत्री की विस्थापन आयोग के गठन की घोषणा का इसलिए स्वागत किया जाना चाहिए। इस घोषणा की पृष्ठभूमि और राजनीतिक कारणों के साथ संभावित परिणामों पर रोशनी डालती आजाद सिपाही पॉलिटिकल ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।

    बात 2003 की गर्मियों की है। नर्मदा आंदोलन की अगुआ मेधा पाटकर रांची आयी हुई थीं। बातचीत के दौरान उन्होंने झारखंड के विस्थापितों की समस्या पर कहा कि चाहे किसी की भी सरकार हो और विस्थापित कोई भी हों, पूरी दुनिया में उनकी समस्या एक जैसी है। यह समस्या है उनके समुचित पुनर्वास और पहचान की। उस बातचीत के दौरान यह मुद्दा भी उठा था कि यदि विकास चाहिए, तो उसकी कीमत विस्थापन से चुकानी ही पड़ती है।

    लेकिन मेधा पाटकर ने विकास के उस मॉडल के प्रति संदेह जताते हुए कहा था कि विस्थापन के दर्द को यदि सत्ता समझ जाये, तो फिर उसके लिए वैकल्पिक मॉडल तैयार करना आसान हो जायेगा। आज 17 साल बाद 2020 में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विस्थापन आयोग बनाने की घोषणा कर इस बात का साफ संकेत दे दिया है कि उन्हें विस्थापन के दर्द की जानकारी है। तो क्या हेमंत विकास के किसी वैकल्पिक मॉडल को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या फिर पिछले 73 साल से विस्थापितों के नाम पर हो रही राजनीतिक के भंवरजाल में फंसे रह जायेंगे। हेमंत सोरेन की पृष्ठभूमि और राजनीति की उनकी शैली को देख कर उनकी घोषणा पर शक करने की कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन उनकी घोषणा के अनुरूप विस्थापन आयोग बन भी गया, तो यह कितना कारगर होगा, इस पर विमर्श तो हो ही सकता है। निश्चित तौर पर विस्थापन आयोग के गठन की घोषणा एक बड़ा कदम है। झारखंड में आजादी के बाद से अब तक विस्थापितों की संख्या 87 लाख बतायी जाती है। पिछले दो दशक में, यानी झारखंड बनने के बाद से ही करीब 15 लाख लोग विभिन्न परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए बताये जाते हैं। कहा जाता है कि करीब एक तिहाई, यानी करीब 30 लाख विस्थापितों को आज तक न तो समुचित मुआवजा मिला है और न ही उनका पुनर्वास किया गया है। इन आंकड़ों पर सवाल इसलिए नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि झारखंड में विस्थापन के मुद्दे पर कभी इतनी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। आबादी के इतने बड़े हिस्से को उपेक्षित छोड़ देने का ही परिणाम हुआ कि तमाम संसाधन होते हुए भी झारखंड पिछड़े राज्यों की श्रेणी में बना रहा।

    झारखंड के 20 साल के राजनीतिक जीवन में पहली बार विस्थापितों के बारे में गंभीरता से बात होने लगी है और मुख्यमंत्री के स्तर से इस पर गंभीरता से विमर्श करने और कुछ ठोस कदम उठाये जाने की बात कही गयी है। इससे ऐसा लगता है कि अब इन 30 लाख लोगों के घाव भरेंगे नहीं, तो कम से कम उन पर मरहम जरूर लगेगा।

    लेकिन यहां एक सवाल भी सिर उठाने लगा है कि आखिर यह विस्थापन आयोग कितना कारगर होगा। हेमंत सोरेन ने विस्थापितों के दर्द को महसूस करने का जो संकेत दिया है, उससे तो लगता है कि आयोग के जरिये खानाबदोश की जिंदगी जी रहे इन 30 लाख लोगों को इंसाफ मिल सकेगा, लेकिन अतीत के अनुभवों से डर भी लगना स्वाभाविक है। भारत की आजादी के बाद से अब तक ऐसे अनगिनत आयोग बने, जिनकी रिपोर्ट आज तक फाइलों से बाहर नहीं आ सकी हैं। कुछ अपवाद जरूर हैं, लेकिन जहां तक विस्थापितों को लेकर बनाये गये आयोगों का सवाल है, तो इनके कारगर होने के उदाहरण मौजूद हैं।

    इसके साथ ही यह तथ्य भी सार्वजनिक है कि झारखंड में केवल आदिवासी ही विस्थापित नहीं हुए हैं, बल्कि दूसरे समाज और वर्ग के लोगों को भी यह दर्द झेलना पड़ा है। इंसाफ उन्हें भी तो चाहिए ही। विस्थापन आयोग उनकी पीड़ा को कितना समझेगा और उसका क्या हल निकालेगा, यह देखनेवाली बात होगी। तमाम सवालों और शंकाओं के बावजूद विस्थापन आयोग बनाने की घोषणा का स्वागत ही किया जाना चाहिए, क्योंकि यह पहली बार हुआ है कि किसी सरकार ने इस समस्या को समझा है। इसके साथ ही हेमंत सोरेन की पृष्ठभूमि और उनकी राजनीति करने की शैली से भी ऐसा ही लगता है कि वह इसके प्रति बेहद गंभीर हैं। यदि उन्होंने झारखंड की इस सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या के समाधान का रास्ता दिखा दिया, तो यह उनकी बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन उन्हें इस बात के लिए भी सचेष्ट रहना होगा कि उनकी यह गंभीर पहल विस्थापितों के घाव पर मरहम लगाने की बजाय उसे कुरेद न दे। हेमंत सोरेन की घोषणा से विस्थापितों में उम्मीद की एक किरण जगी है और दिन बीतने के साथ यह किरण और चमकीली होती जायेगी, इसकी दुआ की जानी चाहिए।

    Hemant to apply wounds of 30 lakh displaced
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