नई दिल्ली। नीतू घनघस की बॉक्सिंग फिलॉसफी पहली घंटी से हमला करना और आखिरी घंटी तक हमला करते रहना है, और उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण हासिल करने तक यही किया। नीतू ने केवल 22 वर्ष की उम्र में अपने पहले विश्व फाइनल में मंगोलिया की लुत्साइखान अल्टान को सर्वसम्मत निर्णय से हराकर अपने करियर का सबसे बड़ा पदक जीता।
मुख्य राष्ट्रीय कोच भास्कर भट्ट बताते हैं, “कोई भी मुक्केबाज़ जो मुक्केबाज़ी की शुरुआत में ही मुक्कों का सामना करता है, दबाव महसूस करता है। यही हमारा लक्ष्य रहा है, प्रत्येक मुक़ाबले में शुरुआत से ही दबदबा बनाना, जिससे विरोधी दबाव महसूस करता है।”
विश्व चैंपियनशिप में नीतू ने अपने पूरे पांच मुकाबलों में इसी दृष्टिकोण का पालन किया है। उसने अपने पहले तीन मुकाबलों में बमुश्किल पसीना बहाया और अगले दो मुकाबलों में परिपक्व प्रदर्शन करते हुए जीत दर्ज की।
नीतू की फिलॉसफी आक्रमण करना है, लेकिन संयम के साथ। जैसा कि उसने अपने सेमीफ़ाइनल बाउट में किया था, जहाँ उसने पंच लगाने से पहले अपने प्रतिद्वंद्वी के बचाव में सबसे छोटी दरार का इंतज़ार किया। जैसा कि उसने शनिवार के फाइनल में किया था, जहां उसने कई बार मुक्कों का उत्पादन किया, लेकिन जब उसे एहसास हुआ कि यह हमेशा सफल नहीं होगा, तो वह पीछे हट जाती थीं, लेकिन नतीजा वही रहा: इस हफ्ते पांचवीं बार रेफरी ने बाउट के अंत में नीतू का हाथ उठा लिया।