सहरसा/सुपौल। संत महात्माओं,महापुरुषों एवं संत सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के अनमोल विचारों को जन जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से सुपौल नगर परिषद वार्ड नंबर 27 चकला निर्मली में आयोजित दो दिवसीय विश्व स्तरीय संतमत सत्संग सह विराट ज्ञान यज्ञ का विधिविधान पूर्वक शुभारंभ हुआ।
आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. राजाराम गुप्ता के अध्यक्षता तथा अखिल भारतीय संतमत सत्संग महासभा के सदस्य सह आयोजन समिति महामंत्री डॉ. अमन कुमार के संचालन में मंचासीन संत महात्माओं के सम्मान में स्वागत समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें अभिनन्दन पत्र डॉ. राजाराम गुप्ता के द्वारा समर्पित किया गया। वहीं स्वागताध्यक्ष डॉ. विजय शंकर चौधरी ने सुपौल जिला वासियों की ओर से उदगार व्यक्त किया।
जिला कृषि पदाधिकारी अजित कुमार यादव के द्वारा भी संतों के सम्मान में चंद शब्द उद्बोधन किया गया। संतमत सत्संग सह विराट ज्ञान यज्ञ में प्रवचन करते हुए महर्षि मेँहीँ ब्रह्म विद्यापीठ, हरिद्वार उत्तराखंड के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संत परम पूज्य स्वामी व्यासानंद जी महाराज ने कहा कि जीवन को धन्य और सुधारने के लिए सत्संग आवश्यक है। जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में सत्संग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सत्संग क्या है? इस संसार में तीन पदार्थ ईश्वर, जीव और प्रकृति सत्य है। इन तीनों के बारे में जहां अच्छी तरह से बताया जाय, उसे सत्संग कहते हैं।
सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए व्यासानंद जी महाराज ने कहा कि सत्संग हमारे जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना की शरीर के लिए भोजन। आत्मा का भोजन सत्संग, स्वाध्याय और संध्या है। सत्संग निर्मल और पवित्र बनता है। यह मन के बुरे विचारों व पापों को दूर करता है। जिस प्रकार प्रातःकाल का भोजन सायंकाल तक और सायंकाल का भोजन रात्रि भर ऊर्जा प्रदान करता है। उसी प्रकार सुबह का किया हुआ सत्संग पुरे दिन हमे अधर्म और पाप से बचाए रखता है।
सायंकाल का सत्संग हमे कुत्सित विचारों से बचाता है। मानव सत्संग से सुधरता है और कुसंग से बिगड़ता है। कहा गया है कि जैसा होगा संग वैसा चढ़ेगा रंग। सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पूज्य स्वामी ने कहा कि सत्संग मानसिक समस्याओं की चिकित्सा है। जब मन में काम, क्रोध रूपी वासनाओं की आंधी उठे और ज्ञानरूपी दीपक बुझने लगे तो ऐसे में सत्संग औषधि का कार्य करते हैं।