विशेष
असम में सत्ता बरकरार रखना है भगवा पार्टी के लिए सबसे बड़ा चैलेंज
पश्चिम बंगाल में मतदाताओं का दिल जीत कर सरकार बनाने का है लक्ष्य
तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में पार्टी के विस्तार को गति देने की चुनौती
अप्रैल में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गयी है, वहां भाजपा के लिए चुनौती बड़ी तो है ही, अलग-अलग किस्म की है। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के लिए असम में जहां सत्ता बचाने की चुनौती है, तो वहीं पश्चिम बंगाल में उसे अब भी सत्ता का इंतजार है। पार्टी के लिए असली कसौटी पश्चिम बंगाल में है, जहां पार्टी ममता बनर्जी की मजबूत तृणमूल मशीनरी से भिड़ने के लिए तैयार है। जानकारों की मानें तो चुनावी रणनीति में नये बदलाव के साथ भाजपा इस बार ममता सरकार के खिलाफ फैली जनविरोधी लहर का लाभ उठाकर तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में आश्वस्त है। पार्टी राज्य में भ्रष्टाचार और घुसपैठ के मुद्दों को उठाकर जनता की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की भी कोशिश कर रही है। टीएमसी पश्चिम बंगाल में लगातार 15 वर्षों से सत्ता में है। हालांकि भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल में किसी स्थानीय करिश्माई नेता की कमी है। जहां भाजपा लड़ाई जीतने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा कर रही है, वहीं ममता बनर्जी राज्य में एक मजबूत और चुनौतीपूर्ण राजनीतिक चेहरा बनी हुई हैं। असम में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में अपनी शासन व्यवस्था और संगठनात्मक शक्ति के भरोसे लगातार तीसरी जीत हासिल करने को आश्वस्त है। लेकिन कांग्रेस नीत विपक्ष सत्ता विरोधी लहर और स्थानीय शिकायतों का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण में भाजपा केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। केरल में पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी को कोई सीट नहीं मिली थी, लेकिन हाल के नगर निकाय चुनावों में मिली सफलता से इस बार कुछ बढ़त की उम्मीद है। राज्य में मुख्य मुकाबला कांग्रेस नीत यूडीएफ और माकपा नीत एलडीएफ के बीच रहेगा। क्या है इन पांच राज्यों का सियासी माहौल और क्या हैं भाजपा की संभावनाएं, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही भाजपा का प्लान भी साफ हो गया है। पार्टी असम में अपनी सत्ता बनाये रखना चाहती है, जबकि बंगाल जीतना या कम से कम वहां अपनी स्थिति बेहतर करना चाहती है। वहीं केरल और तमिलनाडु में पार्टी अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है। इन पांच राज्यों में से सिर्फ असम ही भाजपा के ह्यकंफर्ट जोनह्ण (आरामदायक स्थिति) में है। बाकी राज्यों में खासकर केरल और तमिलनाडु में पार्टी कुछ खास नहीं कर पायी है।
असम में सरकार बरकरार रखना चुनौती
भाजपा के लामने सबसे पहली चुनौती असम में अपनी सत्ता बनाये रखने की है, जहां वह 2016 से सत्ता में है। पार्टी का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक मुद्दा (बांग्लादेश से होने वाले अवैध घुसपैठ का विरोध) असम के उन हिंदू तबकों को काफी रास आया है, जो प्रवासन से जुड़े आर्थिक और सांस्कृतिक दबावों को लेकर चिंतित हैं। चुनाव का एक अहम पहलू बंगाली बोलने वाले मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न होगा। अगर उनके वोट कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ के बीच बंट जाते हैं, तो इससे भाजपा को फायदा हो सकता है, क्योंकि इससे भाजपा विरोधी वोट बंट जायेंगे। हालांकि लोकसभा चुनावों में मुसलमानों के वोट ज्यादातर कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हुए थे, जिसकी बदौलत रकीबुल हुसैन 10 लाख से भी ज्यादा वोटों से चुनाव जीत गये थे। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने कार्यकाल के दौरान हिंदुत्व का काफी आक्रामक रुख अपनाया है। हाल ही में असम भाजपा ने एक एआइ-जनरेटेड वीडियो हटा दिया था, जिसमें हिमंता बिस्वा सरमा को बंदूक के साथ मुसलमानों को निशाना बनाते हुए दिखाया गया था। इस वीडियो की काफी आलोचना हुई थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक असम की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 34% है। अगर मुस्लिम वोटर कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हो जाते हैं, तो मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है।
बंगाल में भाजपा की राह मुश्किल, लेकिन हौसला बुलंद
अब आते हैं पश्चिम बंगाल पर, जहां भाजपा अब तक सत्ता में नहीं आ सकी है। बंगाल में भाजपा को उम्मीद है कि वह पिछले एक दशक में हासिल की गयी बढ़त को इस बार और आगे बढ़ायेगी। हालांकि पार्टी अपनी बढ़ती लोकप्रियता को विधानसभा चुनाव की जीत में बदलने में कामयाब नहीं हो पायी है और 2019 के लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन करने के बाद से उसकी स्थिति में धीरे-धीरे गिरावट ही देखने को मिली है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) लगातार चौथी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है। उसे कोलकाता के आरजी कर अस्पताल रेप केस और शेख शाहजहां मामले जैसे विवादों का सामना करना पड़ा है। फिर भी दो बातें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पक्ष में काम कर रही हैं। यह धारणा कि भाजपा अभी भी कोई ह्यबंगालीह्ण पार्टी नहीं है, और ह्यलक्ष्मी भंडारह्ण जैसी कल्याणकारी योजनाओं की लोकप्रियता भी अधिक है, जिसके तहत ग्रामीण महिलाओं को नकद राशि दी जाती है। बंगाल की डेमोग्राफी भी भाजपा के लिए एक चुनौती है, क्योंकि पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 27% है। इसके बावजूद राज्य में भाजपा का प्रदर्शन काफी शानदार रहा है। 2011 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को सिर्फ 4% वोट मिले थे और उसे एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी। अब यह टीएमसी के लिए मुख्य विपक्षी के तौर पर उभरी है। हालांकि पार्टी किसी भी चुनावी गिरावट को लेकर सतर्क रहेगी।
केरल में संगठन का विस्तार अहम
केरल भाजपा के लिए एक मुश्किल राज्य बना हुआ है। यहां सरकार बनाना तो दूर, भाजपा अपने पैर भी मजबूती से नहीं जमा सकी है। हालांकि पार्टी ने हाल ही में कुछ प्रगति की है। 2024 के लोकसभा चुनावों में अभिनेता सुरेश गोपी ने भाजपा के टिकट पर त्रिशूर सीट जीती, जिसे राज्य की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। इसके बाद पार्टी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनावों में भी मजबूत प्रदर्शन किया और मेयर का पद भी हासिल करने में सफल रही। इसके बावजूद भाजपा को केरल में संगठन की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य में मुस्लिम और इसाई आबादी मिलाकर लगभग 45% है, जिससे पार्टी के लिए अपने चुनावी आधार का काफी विस्तार करने हेतु केवल हिंदू वोटों का एकजुट होना ही काफी नहीं है। सत्ताधारी माकपा के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) ने भी हिंदू मतदाताओं को लुभाने के प्रयास किये हैं। पिछले साल ग्लोबल अयप्पा संगमम में एक मंत्री ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संदेश भी पढ़कर सुनाया। यह एक असामान्य कदम था, जिसकी राज्य भाजपा और संघ परिवार ने आलोचना की। उन्होंने इस कार्यक्रम को लेकर सरकार के राजनीतिक इरादों पर सवाल उठाये।
तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का दौर
तमिलनाडु में भाजपा को एक स्वतंत्र राजनीतिक आधार स्थापित करने में संघर्ष करना पड़ रा है। द्रविड़ आंदोलन की विरासत अभी भी राज्य की राजनीति को आकार दे रही है और भाजपा को अक्सर उसके प्रतिद्वंद्वियों द्वारा एक उत्तर भारतीय पार्टी के रूप में बताया जाता है। पार्टी का समर्थन आधार सीमित बना हुआ है, जो मुख्य रूप से तमिल ब्राह्मणों के बीच केंद्रित है, जिनकी आबादी लगभग 1-3% है। भाजपा अपने सहयोगी अन्नाद्रमुक पर काफी हद तक निर्भर है, जो पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के बाद से खुद ही कमजोर हो गयी है। सत्ताधारी डीएमके ने भी भाजपा को हिंदी थोपने को बढ़ावा देने वाली पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश की है, जिससे तमिलनाडु में लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक दरार और गहरी हो गयी है।
पुडुचेरी में सीमित दांव
पुडुचेरी में भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनावों में छह सीटें जीती थीं। हालांकि ये एक केंद्र शासित प्रदेश है, जिसके चुनाव परिणाम के राजनीतिक अर्थ काफी सीमित हैं।
इस बार भाजपा को क्या उम्मीदें हैं
चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में से भाजपा नेतृत्व असम को लेकर सबसे अधिक आश्वस्त प्रतीत होता है। पार्टी के नेता मुख्यमंत्री सरमा के शासन के रिकॉर्ड, कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे के विकास और मजबूत कानून-व्यवस्था के नैरेटिव की ओर इशारा करते हैं। इसके साथ ही राज्य में भाजपा की राजनीतिक रणनीति का एक मुख्य हिस्सा ध्रुवीकरण रहा है। सरमा अक्सर धार्मिक, जातीय और उप-क्षेत्रीय पहचानों का जिक्र करते हैं, खासकर बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर मूल असमिया समुदायों में मौजूद चिंताओं को उठाते हैं।
पांच राज्यों में से पश्चिम बंगाल भाजपा जीतना चाहेगी। वैचारिक और रणनीतिक तौर पर पार्टी बंगाल को एक अहम मोर्चा मानती है। पिछले महीने राज्य में एक रैली को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि भले ही भाजपा और उसके एनडीए सहयोगी 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में हैं, लेकिन यह काफी नहीं है। उन्होंने कहा था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी कार्यकतार्ओं के चेहरों पर तब मुस्कान आयेगी, जब बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी। फिर भी भाजपा नेता निजी तौर पर यह मानते हैं कि बंगाल की लड़ाई सबसे मुश्किल बनी हुई है। राज्य में वामपंथी और कांग्रेस के काफी कमजोर पड़ने के साथ इस चुनाव में मुख्य रूप से भाजपा और टीएमसी के बीच मुकाबला होने की उम्मीद है। ममता बनर्जी मजबूत कल्याणकारी योजनाओं और अल्पसंख्यक समुदाय के समर्थन के फायदे के साथ इस चुनावी दौड़ में उतर रही हैं। हालांकि आर्थिक चिंताएं, एलपीजी की बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के असर और अटकी हुई अंतरराष्ट्रीय व्यापार वातार्एं भी मतदाताओं के मूड को प्रभावित कर सकती हैं।
ये विधानसभा चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए भी एक चुनौतीपूर्ण दौर है। मई में मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के दो साल पूरे कर लेगी और पार्टी नेता यह मानते हैं कि सत्ता-विरोधी लहर का दबाव एक अहम मुद्दा बन सकता है। भाजपा इस चुनाव को टीएमसी सरकार में कथित भ्रष्टाचार, सत्ता-विरोधी लहर और पूरे बंगाल में हिंदुओं के एकजुट होने की संभावना जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक मुकाबला पहले ही काफी तेज हो चुका है और दोनों ही पक्ष पहचान और सांस्कृतिक मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं। जहां एक तरफ टीएमसी खुद को बाहरी लोगों के खिलाफ बंगाली गौरव के रक्षक के तौर पर पेश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा हिंदुत्व को बंगाली सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
झामुमो के राष्ट्रीय विस्तार में जुटे हेमंत सोरेन, असम-बंगाल में लड़ेंगे
असम और बंगाल में चुनाव की घोषणा ने झारखंड पर भी असर डाला है। मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के अध्यक्ष हेमंत सोरेन इन दो राज्यों में चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस तरह हेमंत की राजनीतिक सक्रियता अब राज्य की सीमाओं से आगे बढ़ती दिख रही है। दोनों राज्यों के चुनावों को लेकर झामुमो ने रणनीतिक तैयारी शुरू कर दी है। आदिवासी राजनीति के राष्ट्रीय विस्तार की संभावनाओं को परखते हुए पार्टी ने दोनों राज्यों में जमीनी आकलन के निर्देश दिये हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तो खैर इसी महीने असम की यात्रा भी कर चुके हैं और असम के आदिवासी नेता झारखंड आकर उनसे मिल भी चुके हैं। झामुमो नेतृत्व का मानना है कि पूर्वोत्तर और बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में पार्टी के लिए राजनीतिक अवसर मौजूद हैं। इसी सोच के तहत हेमंत सोरेन ने संगठन को निर्देश दिया है कि सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाये। पार्टी यह जानना चाहती है कि किन क्षेत्रों में आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं और वहां स्थानीय संगठनों का प्रभाव कितना है। झामुमो के भीतर इसे केवल चुनावी विस्तार नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की राजनीति को राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी का फोकस दीर्घकालिक सांगठनिक मजबूती पर भी है।
असम में झामुमो की बढ़ती दिलचस्पी का मुख्य कारण वहां बड़ी संख्या में बसे झारखंडी मूल के आदिवासी हैं। करीब एक सदी पहले झारखंड क्षेत्र से हजारों आदिवासी मजदूर असम के चाय बागानों में काम के लिए गये थे। आज उनकी कई पीढ़ियां वहीं रह रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा नहीं मिल सका है। हाल ही में असम में रह रहे झारखंडी मूल के आदिवासियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं। इस मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने के संकेत दिये। अपने असम दौरे में भी उन्होंने यह मुद्दा उठाया। झारखंड सरकार की ओर से असम में आदिवासियों की सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक उच्चस्तरीय शिष्टमंडल भेजा गया है।
असम में झामुमो की सक्रियता को केवल सामाजिक सरोकार तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा के सह-प्रभारी थे और उन्होंने महीनों तक झारखंड में सक्रिय रहकर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की थी। अब हेमंत सोरेन की असम में संभावित राजनीतिक भूमिका को उसी का जवाब माना जा रहा है। झामुमो के रणनीतिकार इसे आदिवासी अधिकारों के सवाल पर भाजपा को घेरने का अवसर मानते हैं।
इधर पश्चिम बंगाल में भी झामुमो की नजर झारखंड से सटे आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर है। पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मिदनापुर और जंगलमहल जैसे इलाकों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या प्रभावशाली है। यहां झामुमो करीब एक दर्जन विधानसभा सीटों पर गंभीर तैयारी कर रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में भाजपा ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया था। ऐसे में झामुमो खुद को एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। पार्टी का मानना है कि झारखंड से सटे इलाकों में उसकी सामाजिक पहचान और सांगठनिक अनुभव उसे बढ़त दिला सकते हैं। बंगाल में झामुमो की रणनीति टीएमसी के साथ संभावित तालमेल पर भी टिकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच औपचारिक गठबंधन नहीं हो पाया था, हालांकि हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आग्रह पर तृणमूल उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था। इस वर्ष की शुरूआत में हेमंत सोरेन और ममता बनर्जी की मुलाकात भी हुई थी। दोनों नेताओं के बीच बेहतर संबंध माने जाते हैं। झामुमो रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासी इलाकों में पार्टी की पकड़ का हवाला देकर तृणमूल पर सीटों के तालमेल का दबाव बनाया जा सकता है।
असम और बंगाल में झामुमो की बढ़ती सक्रियता से आदिवासी समुदाय के बीच नयी उम्मीदें भी जगी हैं। खासकर एसटी दर्जे जैसे लंबे समय से लंबित मुद्दों को लेकर लोगों को लग रहा है कि उनकी आवाज अब राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचेगी। यदि झामुमो सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करता है, तो यह आदिवासी राजनीति में नये संतुलन की शुरूआत हो सकती है। इससे राष्ट्रीय दलों की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है। असम और बंगाल की ओर झामुमो का बढ़ता कदम केवल चुनावी विस्तार नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय पहचान देने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो हेमंत सोरेन का यह कदम उन्हें झारखंड से बाहर भी एक प्रभावशाली आदिवासी नेता के रूप में स्थापित कर सकता है।



