विशेष
जनता ने कहा, धनबाद में संजीव का मतलब संजीव सिंह होता है
-छह महीने पहले व्हील चेयर पर बैठे दिखे, बढ़े हुए बाल, मुंह पर मास्क और सामने अंधेरा
-समर्थकों का साथ, लौटा आत्मविश्वास, निर्दलीय लड़े और जनता ने बिठा दिया मेयर की कुर्सी पर
-भाजपा ने पूरी ताकत झोंक डाली, लेकिन औंधे मुंह पटकायी, अब आगे मंथन और चिंतन
झारखंड में संपन्न नगर निकाय चुनाव में सबसे धमाकेदार परिणाम धनबाद के मेयर का रहा। धनबाद की राजनीति के केंद्र माने जानेवाले सिंह मेंशन के कर्ता-धर्ता संजीव सिंह धनबाद के नये मेयर चुने गये हैं। उनकी यह जीत मामूली राजनीतिक परिघटना नहीं है, क्योंकि आठ साल तक अपने चचेरे भाई की हत्या के आरोप में जेल में बंद रहे। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नी विधानसभा का एक चुनाव हार गयीं, तो दूसरे में जोरदार वापसी की। जेल से निकलने के बाद जब संजीव सिंह ने मेयर का चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो बहुत से लोगों को उनके फैसले पर आश्चर्य हुआ। भाजपा भी उन्हें मैदान में उतारने के पक्ष में नहीं थी। इसलिए उसने दूसरे संजीव को समर्थन दे दिया। और यह सुनिक्षित भी किया कि हर तरीके से संजीव सिंह को नुकसान पहुंचाया जाये। भाजपा की बड़ी फौज उन्हें रोकने के लिए लगी रही, लेकिन संजीव सिंह ठहरे सिंह मेंशन के वारिस। वह मैदान में उतरे और तमाम राजनीतिक अटकलों को विराम देते हुए भारी मतों से विजयी हुए। संजीव सिंह की यह वापसी इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच खुद को स्थापित और साबित किया है। उन्होंने इस वापसी से कोयलांचल ही नहीं, झारखंड की राजनीति में नया अध्याय जोड़ दिया है। सारे कयासों, समीकरणों और रणनीतियों को धता बताते हुए संजीव सिंह ने ऐसी सियासी चक्रव्यूह की रचना की जिसे भाजपा, झामुमो और कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी भेद नहीं पाये और मेयर पद का ताज संजीव सिंह के सिरमौर हुआ। संजीव सिंह हिले नहीं, डिगे नहीं, शांत रहे और फोकस्ड रहे। उन्हें खुद पर और अपनी जनता पर पूरा भरोसा था कि जनता के दिल में संजीव सिंह ही बसते हैं। और जनता ने बता दिया कि धनबाद में संजीव का मतलब संजीव सिंह ही होता है। क्या है संजीव सिंह की वापसी का मतलब, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
कोयलांचल की सियासत में झरिया के ‘सिंह मेंशन’ की धमक एक बार पूरे धनबाद में गूंज रही है। धनबाद नगर निगम के चुनाव परिणामों ने न केवल राज्य की सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों को चौंका दिया है, बल्कि झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह की जबरदस्त वापसी पर मुहर लगा दी है। भाजपा, कांग्रेस और झामुमो की त्रिकोणीय घेराबंदी को ध्वस्त करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी संजीव सिंह ने मेयर की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया है। वह अब धनबाद के नये मेयर हैं। झारखंड नगर निकाय 2026 के चुनाव में भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ है। लंबे समय से भाजपा का गढ़ रहे धनबाद नगर निगम और चिरकुंडा नगर पंचायत की सीट पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों की हार हुई है। धनबाद में मेयर पद का चुनाव भाजपा के बागी उम्मीदवार और पूर्व विधायक संजीव सिंह जीत चुके हैं, वहीं भाजपा के उम्मीदवार संजीव कुमार चौथे नंबर पर रहे। धनबाद नगर निगम चुनाव के लिए मतगणना का सिलसिला दूसरे दिन, यानी 28 फरवरी को रात 11.45 बजे तक जारी रहा। जब परिणाम आया, तो संजीव सिंह भारी मतों से चुनाव जीतने में सफल रहे। वह लगातार बढ़त बनाये हुए थे। संजीव सिंह ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चंद्रशेखर अग्रवाल को 31902 वोट से पराजित किया। संजीव सिंह को कुल 114362 वोट मिले, जबकि जेएमएम समर्थित चंद्रशेखर अग्रवाल को 82460 मतों से संतोष करना पड़ा। तीसरे स्थान पर कांग्रेस समर्थित शमशेर आलम अंसारी को 59079 और चौथे स्थान पर भाजपा समर्थित संजीव कुमार को 57895 मत हासिल हुए। इस परिणाम के बाद जनता ने कहा, कोयलांचल का शेर, धनबाद का किंग और सिंह मेंशन का बादशाह संजीव सिंह की वापसी हो चुकी है।
थोड़ा पीछे चलते हैं। वह तारीख थी 11 अगस्त 2025। सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद झरिया के पूर्व भाजपा विधायक संजीव सिंह को रांची रिनपास से छुट्टी मिलती है। संजीव सिंह समर्थकों के हुजूम के बीच व्हील चेयर पर बैठ कर रिनपास से बाहर आये। उनकी अवस्था देख हर कोई चौंक गया था। लंबे बाल, मुंह पर मास्क, कमजोर शरीर पर सफेद टी शर्ट और बेज कलर का पैंट पहने हुए थे। जमानत मिलने के बाद संजीव सिंह के धनबाद जाने पर पाबंदी लगी। वह रांची में ही रहे। उनकी पत्नी भाजपा विधायक रागिनी सिंह साये की तरह उनके साथ रहीं। संजीव सिंह कई दिनों तक व्हील चेयर पर ही रहे। चलने-फिरने में दिक्कत होती। लेकिन धीरे-धीरे उनके स्वास्थ और चेहरे पर रौनक लौटनी शुरू हुई। जब वह बोलते, तो आवाज में एक खामोशी रहती। उनकी स्थिति ऐसी थी, मानों सामने कुछ नजर नहीं आ रहा हो कि आगे करना क्या है। लेकिन परिवार वालों और उनके समर्थकों के प्रयासों के कारण दुबारा उनमें आत्मविश्वास लौटा। वह मीडिया में बयान देते नजर आये। बोलना शुरू किया। जब चासनाला त्रासदी के 50 वर्ष हुए, संजीव सिंह अपनी पत्नी संग पीड़ित परिवारों के साथ शहीद स्थल पर मौजूद रहे। उन्होंने लोगों के बीच जाना शुरू किया। उनके सुख-दुख का हिस्सा बने।
संजीव में लौटा खोया हुआ आत्मविश्वास
संजीव सिंह को अब आगे का भविष्य नजर आ रहा था। उन्हें जनता के बीच रह कर उनकी सेवा करनी है, ऐसा उनका आत्मविश्वास जगा। उन्होंने तय किया कि आगामी मेयर चुनाव में वह धनबाद से प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरेंगे। जब यह घोषित हो गया कि वह निर्दलीय मैदान में उतरेंगे, तो कइयों के हाथ-पांव फूलने लगे। भाजपा ने भी समर्थन संजीव को समर्थन दिया, लेकिन संजीव सिंह नहीं, संजीव कुमार को। लेकिन भाजपा को क्या पता था कि धनबाद में संजीव का मतलब संजीव सिंह होता है। पूरी झारखंड भाजपा संजीव कुमार के समर्थन में खड़ी थी। भाजपा ने संजीव सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया। लेकिन इससे वह कहां रुकने वाले थे। सूत्र बताते हैं कि भाजपा के कई बड़े नेताओं ने बहुत प्रयास किया कि संजीव सिंह बैठ जायें। लेकिन संजीव तो ठहरे सिंह मेंशन के चिराग। वह कहां झुकने वाले थे। उन्होंने मन बना लिया था कि उन्हें निर्दलीय ही चुनाव लड़ना है। संजीव खुद के और अपने समर्थकों के भरोसे कूद पड़े मैदान में। जो होगा देखा जायेगा। आज परिणाम सबके सामने है। संजीव सिंह धनबाद के नये मेयर चुन लिये गये हैं और भाजपा समर्थित संजीव कुमार को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया।
संजीव सिंह का राजनीतिक वनवास पूरा
कहते हैं बढ़े पूत पिता के करम से, खेती उपजे अपने धरम से। यह कहावत धनबाद के नव निर्वाचित मेयर संजीव सिंह पर एकदम फिट बैठती है। आठ साल जेल में रहने के बाद बाहर निकलने के महज छह महीने के भीतर ही वह धनबाद कोयलांचल की राजनीति में उदीयमान नक्षत्र की तरह छा गये हैं। चुनाव के दौरान यह देखा गया कि युवाओं का एक बड़ा वर्ग संजीव सिंह के पक्ष में गोलबंद हुआ। सोशल मीडिया पर युवा ही संजीव सिंह का प्रचार-प्रसार करने लगे। युवाओं की भागीदारी से उनके मतों में बढ़ोतरी हुई। सांसद ढुल्लू महतो का संजीव सिंह के प्रति आक्रामक रवैया और बड़बोलेपन ने इस चुनाव में लोगों पर खासा असर डाल गया। भाजपा के कोर वोटर का एक बड़ा हिस्सा संजीव सिंह के पक्ष में गया। नीरज सिंह हत्याकांड में बरी होने के बाद एक वर्ग का लगातार दावा रहा कि उन्हें फंसाया गया था। लिहाजा उस वर्ग में संजीव सिंह के प्रति सहानुभूति थी। संजीव सिंह इस चुनाव में चौतरफा घिरे हुए थे। लेकिन संजीव के विश्वास ने उन्हें यह मुकाम दिलाया और वह धनबाद के नये मेयर बन गये। अब मेयर बनने के साथ ही संजीव सिंह का राजनीतिक वनवास भी पूरी तरह खत्म हो गया है। उनके मेयर बनने से सिंह मेंशन की राजनीतिक ताकत और बढ़ी है। संजीव सिंह का अगला लक्ष्य 2029 का लोकसभा चुनाव है। चुनाव जीतने के बाद संजीव ने लिखा कि मैं, संजीव सिंह, आप सभी सम्मानित जनता जनार्दन, समर्पित कार्यकर्ताओं और हमारी मातृ शक्ति को हृदय की गहराइयों से प्रणाम करता हूं। आप सभी के आशीर्वाद, विश्वास और अपार स्नेह ने ही मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया है। यह जीत केवल मेरी नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति की जीत है, जिसने दिन-रात मेहनत की, विश्वास बनाये रखा और परिवर्तन के इस संकल्प को अपना सपना बनाया। आपका यह प्यार और भरोसा ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है। आपका अपना संजीव सिंह।
भाजपा के टिकट से विधायक बने
भाजपा के टिकट पर संजीव सिंह 2014 में झरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गये थे। 21 मार्च 2017 को धनबाद के स्टील गेट के पास उनके चचेरे भाई और पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह तथा उनके तीन सहयोगियों की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्याकांड में संजीव सिंह पर आरोप लगा। खुद को निर्दोष बताते हुए उन्होंने धनबाद थाने में आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें जेल भेज दिया। 27 अगस्त 2025 को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया। इस दौरान वह करीब आठ साल तक धनबाद, दुमका और रांची जेल में रहे तथा कुछ समय कांके अस्पताल में भी इलाजरत रहे। जेल में रहने के कारण संजीव सिंह 2019 का झरिया विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सके। उनकी पत्नी रागिनी सिंह ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें अपनी चचेरी गोतनी पूर्णिमा नीरज सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा। हालांकि पांच साल बाद रागिनी सिंह ने वापसी की। 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह को पराजित कर जीत दर्ज की। जनता पूर्णिमा के काम से असंतुष्ट थी। उन्हें बदलाव करना था, सो उन्होंने रागिनी सिंह पर भरोसा जताया। इसके साथ ही सिंह मेंशन का पांच साल का राजनीतिक वनवास समाप्त हुआ। अब साल 2026 में संजीव सिंह धनबाद के नये मेयर बन गये हैं। 2029 में लोकसभा चुनाव होना है। धनबाद की आगे की राजनीति भी अब नया मोड़ ले सकती है।
भाजपा चारों खाने चित, खिसकती जमीन से पार पाना मुश्किल
नगर निकाय चुनाव के परिणाम आने के बाद भाजपा को अब आत्ममंथन की जरूरत है। जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अब हवाबाजी से काम नहीं चलने वाला। पैर जमीन पर रहने चाहिए। जुबानी जंग से सिर्फ खुद को संतुष्ट किया जा सकता है। मैदान में उतरना है, तो सही सिपाहियों का चुनाव ही काम आता है। भाजपा के बागियों ने बता डाला कि अपने शहर के राजा वही हैं। भाजपा को टक्कर उसके बागियों ने ही दी। कोई बागी ऐसे थोड़े बनता है। जिसने पार्टी को खून-पसीना दिया और बदले में उसे सिर्फ झंडा ढोने का काम दिया जाये, तो आज की राजनीति में कोई लंबे समय तक सिर्फ झंडा ढोने नहीं आता। उसे भी खुद को स्थापित करना है। भाजपा के बागियों ने बता डाला कि उन्हें पार्टी की कोई जरूरत नहीं है। वे खुद में काफी हैं। अपना गुमान अपने पास रखिये। सिर्फ पार्टी द्वारा उम्मीदवार थोप देने से काम नहीं चलेगा। धरातल पर जो काम कर रहा है, उसे परखने की मंशा होनी चाहिए। भाजपा ने बागियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह से लेकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा वर्मा, राष्ट्रीय मंत्री ऋतुराज सिन्हा जैसे बड़े नेताओं ने कैंप किया। फिर भी बात नहीं बनी। भाजपा ने अपनी साख बचाने के लिए कई हथकंडे अपनाये। पूर्व विधायक संजीव सिंह समेत डेढ़ दर्जन बड़े नेताओं को शोकॉज तक जारी किया गया। उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की चेतावनी तक दी गयी। कई जिलों में सैकड़ों कार्यकर्ताओं को नोटिस तक थमा दिया। लेकिन फिर भी भाजपा कहीं नहीं टिकी और औंधे मुंह जमीन पर गिर गयी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अब समझ लेना चाहिए कि समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं का चुनाव ही उसे आगे आने वाली कठिनाइयों से बचा सकता है, नहीं तो भाजपा का झारखंड में वही हाल होगा, जो देश में कांग्रेस का है। जमीन कब खिसक जायेगी, पता भी नहीं चलेगा।

