अजय शर्मा
रांची। कोरोना की दूसरी लहर की मार झेल रहे झारखंड की राजधानी रांची में सोमवार को सिस्टम का शर्मनाक चेहरा सामने आया। यह चेहरा किसी अस्पताल या दवाखाने में नहीं, बल्कि श्मशान घाट पर दिखा, जहां आकर लोग जीवन के आखिरी सत्य को महसूस करते हैं। रांची के घाघरा श्मशान घाट पर 40 लाशें नौ घंटे तक केवल उस मजिस्ट्रेट के इंतजार में पड़ी रहीं, जिसकी ड्यूटी यहां लगायी गयी थी।
सुबह सात बजे से यहां कोरोना संक्रमितों के शवों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन लकड़ी नहीं थी। अगले दो घंटे में वहां 40 एंबुलेंस पहुंच गयीं। सभी में शव थे। लेकिन लकड़ी के अभाव में कोई भी शव उतारा नहीं गया। एंबुलेंस के पीछे परिवार के कुछ सदस्य भी पहुंचे थे। श्मशान घाट के आसपास की सड़क इस कारण जाम हो गयी। परिजन परेशान थे।
उन्होंने स्थानीय लोगों से मदद मांगी, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। परिजनों ने जिला प्रशासन के अधिकारियों को फोन किया। किसी ने फोन तक नहीं उठाया। तब किसी स्थानीय व्यक्ति ने श्मशान घाट के लिए प्रतिनियुक्त अधिकारी का नंबर दिया। एक मृतक के परिजन ने उन्हें फोन मिलाया।
उधर से जवाब मिला, सुबह-सुबह हमारा यही काम रह गया है। इंतजार कीजिए, आते हैं। समय गुजरता गया और दिन के तीन बजे तक वहां के मजिस्ट्रेट साहब को चेहरा दिखाने की फुर्सत नहीं मिली थी।
सीनियर अधिकारियों की पहल के बाद मजिस्ट्रेट और अन्य अधिकारी वहां पहुंचे। तब चार बजे के करीब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई।
इधर इतनी बड़ी संख्या में एंबुलेंस के श्मशान घाट पर फंसे होने के कारण अस्पतालों में अफरा-तफरी की स्थिति बनी रही। न तो मरीजों को अस्पताल लाने के लिए कोई एंबुलेंस उपलब्ध थी और न ही शवों को श्मशान घाट तक पहुंचाने की। इस घटना को आप क्या कहेंगे! अफसर की संवेदनहीनता या सिस्टम का फेल होना।
शर्मनाक : मजिस्ट्रेट के लिए नौ घंटे एंबुलेंस में इंतजार करते रहे 40 शव
Previous Articleरेमडेसिविर से भी 3 गुना असरदार है ये दवा, 21 पौधों से तैयार की गई है ये, साइडइफेक्ट भी नहीं है
Next Article स्वत: लॉकडाउन की ओर झारखंड