रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने पुलिस विभाग की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए धनबाद जिला पुलिस बल से अन्य जिलों में भेजे गए 20 पुलिसकर्मियों के स्थानांतरण आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि विभाग प्रशासनिक जरूरत का हवाला देकर किसी कर्मचारी को स्थानांतरित करके दंडित नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी पुलिसकर्मी पर लापरवाही या अनुशासनहीनता के आरोप हैं, तो विभाग को विधिवत जांच और विभागीय कार्रवाई करनी चाहिए, न कि शॉर्टकट अपनाकर उनका तबादला करना चाहिए।

अदालती हस्तक्षेप और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह पाया कि 24 फरवरी 2025 को जारी स्थानांतरण आदेश और उसके बाद की गई रिलीविंग प्रक्रिया कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरती। याचिकाकतार्ओं की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता अर्पण मिश्रा ने आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के जरिए यह साबित किया कि इन तबादलों की सिफारिश धनबाद एसएसपी ने कथित लापरवाही के आधार पर की थी। अदालत ने उच्चतम न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी आदेश की प्रकृति दंडात्मक है, तो उसे केवल ‘प्रशासनिक आधार’ कहकर वैध नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने स्थानांतरण और कार्यमुक्ति दोनों आदेशों को अवैध करार देते हुए सभी याचिकाकतार्ओं को वापस धनबाद में योगदान देने का निर्देश दिया है।

पुलिस प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश
इस फैसले को पुलिस महकमे के लिए एक बड़े सबक के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि स्थानांतरण शक्ति का उपयोग अनुशासनात्मक कार्रवाई के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई पुलिसकर्मी नए स्थान पर ज्वाइन कर लेता है, तो भी उसका चुनौती देने का अधिकार खत्म नहीं होता; आदेश रद्द होने पर उसे मूल तिथि से ही अमान्य माना जाएगा। इस मामले में सूरज कुमार दास, अनुज कुमार सिंह और बलजीत कुमार सहित 20 पुलिसकर्मी शामिल थे, जिन्हें अब अदालत के आदेश के बाद अपने मूल जिले धनबाद में वापस लौटने का रास्ता साफ हो गया है। संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे इन पुलिसकर्मियों की जॉइनिंग तत्काल स्वीकार करें।

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