सात दशक पहले ही लिख दी गयी थी इस युद्ध की पटकथा
यह कहानी है अथाह तेल भंडार पर कब्जे की, डॉलर की वैश्विक बादशाहत की और विश्वासघात की
यह युद्ध यूरेनियम संवर्धन की आड़ में ‘सोना बनाम डॉलर’ और ‘पेट्रो-डॉलर बनाम संप्रभुता’ का खतरनाक खेल बन चुका है
आज की वैश्विक राजनीति के रंगमंच पर डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच जो भीषण तनाव दिखाई दे रहा है, वह कोई अचानक उपजी घटना या तात्कालिक कूटनीतिक विफलता नहीं है। असल में यह उस बारूद की ढेर पर लगी चिंगारी है, जिसकी पटकथा आज से सात दशक पहले, यानी 1950 के दशक में ही लिख दी गयी थी। यह कहानी है अथाह तेल भंडार पर कब्जे की, डॉलर की वैश्विक बादशाहत को बचाये रखने की और एक ऐसे विश्वासघात की, जिसने एक समय के घनिष्ठ सहयोगियों को कट्टर दुश्मनों में बदल दिया। विडंबना देखिये, जिस परमाणु तकनीक को आज अमेरिका दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बताकर ईरान से छीनना चाहता है, वह परमाणु बीज कभी अमेरिका ने ही ‘एटम्स फॉर पीस’ जैसे कार्यक्रमों के जरिये ईरान की धरती पर बोया था। पिछले कई दशकों में क्लिंटन, ओबामा और बाइडन जैसे राष्ट्रपतियों ने जिस आग को कूटनीति और अरबों डॉलर के समझौतों से ठंडा रखने की कोशिश की, ट्रंप के दोबारा सत्ता में आते ही उस ‘ब्लंडर’ (बड़ी भूल) करार दी गयी न्यूक्लियर डील के टूटने ने उसे एक महायुद्ध की ज्वाला में बदल दिया है। यह संघर्ष अब केवल दो देशों की सीमा तक सीमित नहीं रह गया है। यह ‘सोना बनाम डॉलर’ और ‘पेट्रो-डॉलर बनाम संप्रभुता’ का वह खतरनाक खेल बन चुका है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन की आड़ में छिपी परमाणु महात्वाकांक्षाओं ने पूरी दुनिया को एक ऐसे ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जिसका फटना वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानवता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। कैसे 1950 के ‘तेल के खेल’ से शुरू हुआ यह सफर आज ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ की घेराबंदी तक जा पहुंचा है, इतिहास के पन्नों को पलटते हुए बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
आज की वैश्विक राजनीति में ट्रंप और ईरान के बीच जो तनाव दिख रहा है, वह कोई रातों-रात पैदा हुई घटना नहीं है। यह दशकों की भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, तेल की राजनीति और विश्वासघात की एक लंबी कहानी है। पिछले कई दशकों में बाइडन, ओबामा और क्लिंटन जैसे अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अरबों डॉलर खर्च करके ईरान को रोकने की कोशिश की। लेकिन विडंबना यह है कि जिस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को आज अमेरिका ईरान से छीनना चाहता है, वह कभी अमेरिका ने ही उसे तोहफे में दी थी।
1950 का दशक और तेल का खेल
1950 के दशक में ईरान मध्य पूर्व का एक सामान्य देश नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति का केंद्र था। उस समय पश्चिमी देशों की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा (16% क्रूड आॅयल और 67% बंकर फ्यूल) अकेले ईरान पूरा करता था।
शोषण और विद्रोह
ब्रिटेन ने कूटनीतिक दबाव बनाकर ईरान के साथ ऐसे समझौते किये थे, जहां जमीन और तेल ईरान का था, मजदूर भी ईरान के थे, लेकिन मुनाफा ब्रिटेन ले जा रहा था। 1951 में पीएम मोहम्मद मोसादिक ने इस व्यवस्था को चुनौती दी और ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उन्होंने नारा दिया ‘हमारी जमीन, हमारा तेल, हमारा मुनाफा।’
ऑपरेशन अजैक्स
ईरान का यह कदम अमेरिका और ब्रिटेन को रास नहीं आया। ब्रिटेन को आर्थिक नुकसान का डर था और अमेरिका को डर था कि मोहम्मद मोसादिक कहीं सोवियत संघ से हाथ न मिला लें। परिणामस्वरूप, सीआइए और एमआइ-6 ने मिलकर ‘ऑपरेशन अजैक्स’ चलाया। लोकतांत्रिक रूप से चुने गये मोसादिक को जेल में डाल दिया गया और शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता सौंपी गयी, जो अमेरिका के इशारों पर चलते थे। यहीं से ईरान में ‘डेथ टू अमेरिका’ के नारों की नींव पड़ी।
‘एटम्स फॉर पीस’ और न्यूक्लियर शुरूआत
1957 में अमेरिका ने ईरान को सोवियत संघ के खिलाफ एक ‘बफर स्टेट’ बनाने के लिए ‘एटम्स फॉर पीस’ प्रोग्राम के तहत न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी दी। तेहरान यूनिवर्सिटी में न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर बनवाये गये और ईरानी वैज्ञानिकों को एमआइटी भेजा गया। उस समय अमेरिका का मानना था कि एक शक्तिशाली और आधुनिक ईरान ही मध्य पूर्व में उसके हितों की रक्षा कर सकता है।
1971 का ‘निक्सन शॉक’ और पेट्रोडॉलर का जन्म
15 अगस्त 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी। इसे इतिहास में ‘निक्सन शॉक’ कहा जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौता हुआ था। इसके तहत अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ दिया गया। अमेरिका ने गारंटी दी कि वह 35 डॉलर के बदले एक आउंस सोना देगा। दुनिया की बाकी करेंसियां डॉलर से जुड़ी थीं। यानी डॉलर ‘उतना ही अच्छा था जितना कि सोना’।
‘निक्सन शॉक’ क्यों हुआ? (संकट की शुरूआत)
लेकिन 1960 के दशक के अंत तक अमेरिका की स्थिति बिगड़ने लगी। वियतनाम युद्ध के भारी खर्च के कारण अमेरिका ने अंधाधुंध डॉलर छापे। दुनिया में इतने डॉलर घूम रहे थे कि अमेरिका के पास उनके बदले देने के लिए पर्याप्त सोना नहीं बचा था। फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों को शक हुआ और उन्होंने अपने डॉलर के बदले अमेरिका से सोना मांगना शुरू कर दिया। इससे अमेरिका का गोल्ड रिजर्व तेजी से गिरने लगा। हारकर 15 अगस्त 1971 को निक्सन ने घोषणा की कि अब डॉलर के बदले सोना नहीं दिया जायेगा। इसने ब्रेटन वुड्स सिस्टम को खत्म कर दिया और डॉलर एक ‘फिएट करेंसी’ (बिना किसी फिजिकल एसेट वाली करेंसी) बन गया। डॉलर की वैल्यू बनाये रखने के लिए अमेरिका ने सोने का विकल्प ‘तेल’ में ढूंढा।
सऊदी अरब के साथ समझौता (1974)
अमेरिका ने सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी दी और बदले में शर्त रखी कि तेल केवल डॉलर में बेचा जायेगा। इसे ‘पेट्रोडॉलर’ व्यवस्था कहा गया। इस व्यवस्था ने डॉलर की वैश्विक मांग को स्थायी बना दिया। जिसने भी इस व्यवस्था को चुनौती दी (जैसे सद्दाम हुसैन या गद्दाफी), अमेरिका ने उसे अपना दुश्मन बना लिया।
1979 की इस्लामी क्रांति
पासा पलट गया 1979 में। आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई क्रांति ने शाह को बेदखल कर दिया। ईरान रातों-रात अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी से सबसे बड़ा दुश्मन बन गया। अमेरिकी दूतावास पर हमला हुआ और राजनयिकों को बंधक बना लिया गया। खुमैनी ने एलान किया कि वह मध्य पूर्व की अन्य ‘कठपुतली’ सरकारों (सऊदी, यूएइ) को भी उखाड़ फेंकेंगे।
ईरान-इराक युद्ध और ‘सर्वाइवल’ की रणनीति
1980 के दशक में अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन को ईरान के खिलाफ उकसाया और रासायनिक हथियारों के उपयोग के बावजूद उसकी मदद की। इस युद्ध ने ईरान को सिखाया कि दुनिया में उसका कोई सगा नहीं है। अपनी सुरक्षा के लिए ईरान ने दो रास्ते अपनाये। पहला प्रॉक्सी वॉर, जहां हमास, हिजबुल्ला और हूतियों जैसे समूहों को खड़ा करना। दूसरा न्यूक्लियर वेपन, आत्मरक्षा के लिए परमाणु बम की आवश्यकता महसूस करना।
यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) का गणित
न्यूक्लियर तकनीक को समझने के लिए यूरेनियम संवर्धन को समझना जरूरी है। प्राकृतिक यूरेनियम में यू 235 की मात्रा 1% से भी कम होती है। 3-5% संवर्धन, बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल में आता है। वहीं 90% संवर्धन, परमाणु बम बनाने के लिए इस्तेमाल होता है। जब 2002 में ईरान की गुप्त न्यूक्लियर साइट्स का पता चला, तो दुनिया सतर्क हो गयी। ईरान ने कहा कि वह सिर्फ बिजली के लिए काम कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को वहां उच्च संवर्धन के सबूत मिले।
ओबामा की डील बनाम ट्रंप का प्रहार
2015 में ओबामा ने जेसीपीओए (ईरान परमाणु समझौता) साइन की, ताकि ईरान को परमाणु बम बनाने से रोका जा सके। राष्ट्रपति बराक ओबामा का मानना था कि युद्ध के बजाय कूटनीति से ईरान को परमाणु बम बनाने से रोका जा सकता है। 2015 में ईरान और दुनिया की छह महाशक्तियों (पी5+1: अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी) के बीच यह समझौता हुआ। ईरान को केवल 3.67% तक यूरेनियम संवर्धित करने की अनुमति दी गयी (जो केवल बिजली बनाने के काम आता है)। लेकिन 2016 के चुनाव प्रचार के दौरान ही डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘अब तक की सबसे खराब डील’ बताया था। मई 2018 में उन्होंने आधिकारिक तौर पर अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया। ट्रंप ने इसे ‘ब्लंडर’ बताकर तोड़ दिया। ट्रंप के हटने के बाद ईरान ने संवर्धन की सीमाएं तोड़ दीं और 60% तक पहुंच गया, जो बम बनाने के बहुत करीब है। ट्रंप की रणनीति का असर उल्टा पड़ा। ईरान ने झुकने की बजाय अपनी परमाणु गतिविधियों को और तेज कर दिया। ईरान ने पहले 20% और फिर 60% तक यूरेनियम संवर्धित करना शुरू कर दिया। परमाणु बम के लिए 90% शुद्धता चाहिए होती है और 60% से 90% तक पहुंचना तकनीकी रूप से बहुत आसान और कम समय लेने वाला काम है।
वर्तमान संघर्ष: ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ और लीडरशिप पर हमला
2025 में दोबारा सत्ता में आते ही ट्रंप ने ईरान को 60 दिन का अल्टीमेटम दिया। जून 2025 में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर भारी बमबारी की। हालांकि, ईरान ने अपना काफी सारा संवर्धित यूरेनियम पहले ही पहाड़ों के नीचे सुरक्षित ठिकानों पर शिफ्ट कर दिया था। फरवरी 2026 में ट्रंप ने और बड़ा कदम उठाते हुए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ लांच किया और ईरान की टॉप लीडरशिप (अली खामेनेई और अन्य कमांडरों) को एक मीटिंग के दौरान मार गिराया।
ईरान का पलटवार
मोजेक डॉक्ट्रिन: अमेरिका की गणना थी कि नेतृत्व खत्म होते ही ईरान ढह जायेगा, लेकिन ईरान ने ‘मोजेक डॉक्ट्रिन’ के तहत अपनी कमान को 31 स्वतंत्र प्रांतों में बांट रखा था। नेतृत्व जाने के बाद भी ईरान ने सरप्राइज रिटेलिएशन शुरू किया।
ईरान के पास क्या ताकत है?
भूगोल: ईरान के चारों तरफ जाग्रोस और एल्बोर्स जैसे ऊंचे पहाड़ हैं, जो एक प्राकृतिक ढाल हैं। सस्ते ड्रोन और मिसाइलें हैं, जिससे अमेरिका के 4 मिलियन डॉलर के मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भेद देने की क्षमता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज : यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जलसंधि है। दुनिया का 20% तेल यहीं से गुजरता है। ईरान ने इसे ब्लॉक करने की धमकी दी और उसका असर भी दुनिया देख रही है, जिससे ग्लोबल इकोनॉमी तबाह हो सकती है। गल्फ देशों का संकट ईरान ने सीधे अमेरिका से लड़ने के बजाय सऊदी अरब और यूएइ के आॅयल इंफ्रास्ट्रक्चर और डिसेलिनेशन प्लांट्स को निशाना बनाना शुरू कर दिया। गल्फ देशों के पास पीने के पानी का एकमात्र जरिया यही प्लांट हैं। यदि ये नष्ट हुए, तो वहां मानवीय संकट पैदा हो जायेगा। ईरान का संदेश साफ है ‘अगर अमेरिका हमें मारेगा, तो हम तुम्हारे पड़ोसियों को मारेंगे, जिन्होंने अमेरिका को बेस दिये हैं’।
भविष्य की अनिश्चितता: युद्ध की स्थिति एक ‘स्टेलमेट’ जैसी है। ट्रंप हवाई हमलों से जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ईरान अभी भी झुकने को तैयार नहीं है। वह अब सीधे 90% संवर्धन और परमाणु हथियारों की बात कर रहा है। यदि यह युद्ध नहीं रुका, तो केवल ईरान या अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी तेल की कीमतों और सप्लाई चेन टूटने की वजह से भारी संकट में फंस जायेंगी। दुनिया इस समय एक ऐसे ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ी है, जिसका फटना पूरी मानवता के लिए विनाशकारी हो सकता है।



