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    तीन संसदीय सीटों का परिणाम तय करेगा विधानसभा की 28 सीटों का मिजाज

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskMay 1, 2019Updated:May 1, 2019No Comments6 Mins Read
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    झारखंड में पहले चरण के लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। पहले चरण में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीट लोहरदगा में भी चुनाव हुए। चुनाव के पहले से ही इस सीट पर मुकाबला कड़ा होने की उम्मीद की जा रही थी। यहां से भाजपा के निवर्तमान सांसद सह केंद्रीय राज्यमंत्री सुदर्शन भगत के सामने कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक सुखदेव भगत के बीच मुख्य मुकाबला है। भाजपा भी इस सीट के महत्व को अच्छेी तरह समझ रही है। इसे देखते हुए पार्टी ने यहां पूरी ताकत लगा दी है। मुख्यमंत्री रघुवर दास स्वयं बार-बार वहां गये। चुनाव के दौरान वह पांच बार लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम भी लोहरदगा में कराया गया। हालांकि इसमें उमड़ी भीड़ ने भाजपा को उत्साहित जरूर किया, पर यहां बन रहे समीकरण ने विपक्षी दलों और खासकर कांग्रेस का उत्साह बढ़ाया है।
    कहा जाता है कि इन सीटों पर जहां एक ओर मिशनरी संस्थाएं अरसे से ही प्रभाव डालती रही हैं, वहीं संघ की गतिविधियां भी यहां प्रभावी रही हैं। देखा जाये, तो लोहरदगा और खूंटी सीट में कमोबेश यह समानता देखने को मिलती है। हालांकि लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में मांडर और लोहरदगा विधानसभा क्षेत्र के बड़े इलाके में मुस्लिम मतदाताओं का भी प्रभाव है। बाकी लोहरदगा और गुमला शहरी क्षेत्र को छोड़ दें तो अन्य क्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं की पूरी पकड़ है। हां विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र में सरना आदिवासियों की संख्या भी ठीक-ठाक है। खास बात इस चुनाव में यह है कि विपक्षी दलों ने गठबंधन कर भाजपा विरोधी मतों को बिखरने से रोका है, जो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है। हालांकि पिछले दो टर्म से सुदर्शन भगत लोहरदगा से जीत दर्ज करते रहे हैं। पर पिछली जीत का अंतर मात्र छह हजार ही था। ऐसे में विपक्ष यह सोच कर खुश हो सकता है कि उसने मतों के बिखराव को रोका है। साथ ही देखा जाये, तो पिछले चुनाव में विधायक चमरा लिंडा भी मैदान में थे, जिन्होंने लगभग सवा लाख वोट हासिल किया था। इस बार तो वह भी नहीं हैं और मुकाबला आमने-सामने का है। इसलिए लोहरदगा सीट का मुकाबला रोचक होने के साथ-साथ भविष्य की एक कहानी भी लिखने जा रहा है।
    अब बात करते हैं खूंटी संसदीय सीट की। यहां से भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को मैदान में उतारा है। वहीं कांग्रेस ने टी मुचिराय मुंडा के बड़े पुत्र और राज्य के मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा के भाई कालीचरण मुंडा को अपना प्रत्याशी बनाया है। शुरुआत में जब अर्जुन मुंडा ने निवर्तमान सांसद कड़िया मुंडा से आशीर्वाद लिया, फिर क्षेत्र के राजनीतिक भीष्म पितामह के साथ दौरा शुरू किया, तो हर तरफ यही चर्चा शुरू हो गयी कि अर्जुन मुंडा की राह आसान हो गयी है। लोगों को लगा कि अर्जुन मुंडा यह बाजी आसानी से जीत लेंगे। पर अब चर्चा हो रही है कि खूंटी में मुकाबला टफ है।
    खूंटी में भी इसाई मतदाता बहुत हैं और यहां संघ का ढांचा भी मजबूत स्थिति में है, जो उसके पिछले एक दशक की मेहनत का परिणाम है। संघ के ढांचे ने ही खूंटी में भाजपा को मजबूती से स्थापित करने में खास भूमिका निभायी। मिशनरियों को कमजोर करने में ताकत लगायी, जिसके बल पर राज्य सरकार ने पत्थलगड़ी जैसी समानांतर व्यवस्था को तोड़ने में सफलता पायी। उधर, अंतिम समय में कांग्रेस ने काली चरण मुंडा को टिकट दिया। शुरुआत में उनका सफर कुछ खास नहीं रहा। पर धीरे-धीरे हवा बदली। युवाओं का एक खास तबका कालीचरण मुंडा के साथ नजर आने लगा। इतना ही नहीं, कांग्रेस को पहले से हासिल मिशनरियों का समर्थन भी सतह पर नजर आने लगा। उधर सिमडेगा क्षेत्र में कांग्रेस की पुरानी धार भी साफ होने लगी, जो वक्त के थपेड़ों के साथ कुंद पड़ चुकी थी। बता दें कि पिछले तीन-चार वर्षों से खूंटी चर्चा का केंद्र रहा है। इसकी चर्चा का कारण विशेष रूप से पत्थलगड़ी और मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव रहा। इसके साथ ही अफीम की खेती, जो यहां बड़े पैमाने पर जगह बना चुकी है, उसे भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। पत्थलगड़ी की तथाकथित समानांतर व्यवस्था का ढांचा गिरने के बाद अफीम की पैदावार भी पकड़ में आने लगी। उधर केंद्र और राज्य सरकार ने सभी प्रकार के एनजीओ के विदेशी फंडिंग पर रोक लगायी, तो मिशनरियों की पकड़ भी ढीली पड़ने लगी। पर चुनाव आते ही ये सारी शक्तियां एकजुट होकर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने सभी प्रभावितों को एक मंच पर लाने की कोशिश शुरू कर दी है, जिसका असर अब चुनावी सभाओं में दिखने लगा है। ये सारी शक्तियां भाजपा को हराने के लिए आदिवासियों के बीच जा रही हैं। ऐसे में खूंटी का चुनाव यह तय करेगा कि आखिर आदिवासियों के बीच कौन कितनी गहराई तक पहुंच सका है।
    इधर, चाईबासा में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। वह यहां के निवर्तमान सांसद भी हैं। वहीं कांग्रेस ने गीता कोड़ा को यहां उम्मीदवार बनाया है। गीता कोड़ा पिछला लोकसभा चुनाव बतौर निर्दलीय उम्मीदवार लड़ी थीं और उन्होंने गिलुआ को कड़ी टक्कर दी थी। हालांकि पिछले चुनाव में मोदी लहर थी और विपक्ष का स्वरूप भी बिखरा हुआ था। पर इस बार ऐसा नहीं है। विपक्ष एक है। लक्ष्मण गिलुआ भी इस स्थिति को भली-भांति समझ रहे हैं। शायद यही कारण है कि वह क्षेत्र से बाहर नहीं निकल रहे। दिन-रात एक किये हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झारखंड आगमन पर भी वह कहीं नहीं गये। क्षेत्र में ही जमे रहे। इतना ही नहीं, भागदौड़ कर उन्होंने प्रधानमंत्री का कार्यक्रम भी अपने क्षेत्र में तय करा लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच मई को उनके क्षेत्र में आयेंगे। लक्ष्मण गिलुआ की चिंता स्पष्ट है। उधर, गीता कोड़ा टिकट पाने के बाद से ही पूरे उत्साह के साथ सक्रिय हैं। लगातार क्षेत्र में जा रही हैं। कांग्रेस के प्रमुख आदिवासी नेता प्रदीप बलमुचू, रमा खलखो आदि उनके साथ बने हुए हैं। अब तो उन्होंने क्षेत्र के झामुमो विधायकों की नाराजगी दूर करने में भी सफलता पा ली है।
    उनके पति पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की तो क्षेत्र में पुरानी पकड़ है ही, जो उनके लिए प्लस प्वाइंट कही जा रही है। दरअसल चाईबासा संसदीय क्षेत्र ऐसा आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां सरना और इसाई दोनों प्रभावी हैं। यहां अब भी गैर-आदिवासियों को लोग बाहरी मानते हैं। यहां मूलवासियों की तादाद अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कम है। यहां वही आदिवासियों का दिल जीत सकता है, जिसे वे अपना और स्थानीय मानते समझते हों।
    आदिवासियों की इसी भावना को झामुमो ने भली-भांति समझा और अपनी पकड़ यहां मजबूत की है। इस संसदीय क्षेत्र में झामुमो के पांच विधायक हैं, जो उसकी पकड़ की गहराई बताते हैं। ऐसे में जब कांग्रेस और झामुमो एक साथ हैं, तब गीता कोड़ा की चुनौती गिलुआ के लिए टेढ़ी खीर साबित हो, तो ज्यादा अचरज की बात नहीं होगी। इन तीनों संसदीय सीटों की गाथा ही आनेवाले दिनों में झारखंड की राजनीतिक पटकथा लिखेगी, यह तय माना जा रहा है। लोग इन तीन सीटों पर चर्चा कर रहे हैं, तो इसकी यह ठोस वजह भी है।

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