कोरोना की दूसरी लहर से पैदा हुई आपदा ने बहुत से सरकारी-अर्द्धसरकारी निकायों की पोल खोल कर रख दी है। नगर निगम इनमें से एक है। बड़े शहरों की प्लानिंग और साफ-सफाई समेत अन्य नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने के लिए बनाये गये नगर निगमों ने झारखंड में अपनी समानांतर सत्ता व्यवस्था कायम कर ली है और इस आपदा के समय भी उनकी कोई भूमिका नजर नहीं आ रही है। झारखंड में अभी नौ नगर निगम हैं, जिनमें से पांच के क्षेत्रों में कोरोना का संक्रमण बहुत अधिक है। वहां के लोगों के सामने जान बचाने के साथ जीवन से जुड़ी दूसरी चुनौतियां भी हैं, लेकिन नगर निगम पूरी तरह निष्क्रिय है। ऐसा लगता है कि उसे न तो संक्रमण से कोई मतलब है और न ही इसे रोकने में उसकी कोई दिलचस्पी है। नगर निगमों के अधिकारी-कर्मचारी, पार्षद और मेयर-डिप्टी मेयर का काम शायद राजनीति करना और रौब गांठना ही रह गया है और नगर निगम का काम शहरवासियों से टैक्स वसूलना। कोरोना की पहली लहर के दौरान कई पार्षदों ने अपने इलाके में अच्छा काम किया था, मेयर-डिप्टी मेयर भी सक्रिय नजर आ रहे थे, नगर निगम कम से कम संक्रमित इलाकों में सैनिटाइजेशन का काम भी करता था, लेकिन इस बार यह सब कुछ नहीं हो रहा है, जबकि महामारी के समय सबसे सक्रिय भूमिका नगर निगमों की ही होती है। मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की चर्चा पूरे देश में हो रही है। न्यायालय तक उसकी तारीफ कर रहे हैं कि कैसे कोरोना महामारी में उसने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है और कैसे कोरोना की जंग में वह विजय की ओर आगे बढ़ रहा है। आखिर झारखंड के नगर निगम इतने सुस्त क्यों हैं और इसके पीछे की मंशा क्या है, इन सवालों के जवाब तलाशती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।
भारत सरकार ने 1993 में जब 73वें संविधान संशोधन के जरिये देश भर में स्थानीय निकायों को मजबूत करने और उन्हें अधिक अधिकार देने का फैसला किया था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि सबसे निचले स्तर पर लोकतंत्र बहाली का यह अभिनव प्रयोग बड़े शहरों तक आते-आते हंसी का पात्र बन जायेगा। पंचायती राज व्यवस्था में नगर निगम की परिकल्पना पहले से थी, लेकिन इसमें संशोधन कर नगरीय प्रशासन को भी चुस्त-दुरुस्त किया गया। साथ ही बड़े शहरों के नगरीय विकास का खाका खींचने की जिम्मेदारी भी नगर निगमों को दी गयी। शासन का यह मॉडल पश्चिमी देशों की व्यवस्था पर आधारित था, जहां शेरिफ और मेयर को उसके शहर के पहले नागरिक का दर्जा हासिल है।
जब झारखंड अलग राज्य बना, तब यहां भी यह व्यवस्था लागू की गयी, लेकिन यहां के नगर निगम राजनीति का अखाड़ा बनते गये। बिहार से अलग होकर बनाये गये इस राज्य में हर चीज राजनीतिक चश्मे से देखी जाने लगी और नगर निगम भी इसका अपवाद नहीं रहा। राज्य में एक-एक कर नौ नगर निगम बन गये, लेकिन यहां राजनीति कुछ अधिक ही पैठ बना गयी। सरकार ने नगर निगमों को राजनीति से दूर रखने के लिए इन्हें दलीय आधार पर चुनाव से दूर रखा, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं पड़ा। राजनीतिक दलों ने नेपथ्य में रह कर भी इन चुनावों में खूब पसीना और संसाधन बहाया। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि नगर निगम अपने मूल काम से भटक गया। नगर की प्लानिंग, साफ-सफाई और दूसरी नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए बनाये गये नगर निगम राजनीतिक दांव-पेंच में उलझ गये।
यह बेहद दुखद है कि कोरोना आपदा के इस दौर में भी नगर निगम की कोई भूमिका नजर नहीं आ रही है। संक्रमितों के इलाज की व्यवस्था तो दूर की बात है, संक्रमित इलाकों में सैनिटाइजेशन का काम भी नहीं हो रहा है, जबकि कोरोना संकट के पहले दौर में नगर निगमों ने कुछ सक्रियता दिखायी थी। इस बार न वार्ड पार्षद नजर आ रहे हैं और न मेयर-डिप्टी मेयर। मीडिया में बयान देने से लेकर मांगयुक्त चिट्ठी लिखने के अलावा इनके पास कोई काम नहीं रह गया है। इसमें कुछ अपवाद भी हैं, लेकिन उनकी संख्या इतनी कम है कि उनका काम नजर नहीं आता।
उदाहरण के लिए रांची नगर निगम को ही लें, जहां संक्रमितों की संख्या राज्य में सबसे अधिक है। यहां का नगर निगम और उसके चुने हुए पार्षदों ने संक्रमितों की सुविधा के लिए क्या कदम उठाया, यह याद नहीं आता। एकाध पार्षद अपने क्षेत्र में राहत पहुंचाने के लिए जरूर सक्रिय हैं, लेकिन उसका कोई खास प्रभाव नहीं दिख रहा है। राज्य का सबसे बड़ा नगर निगम होने के नाते रांची नगर निगम के पास तमाम संसाधन उपलब्ध हैं। इसके बावजूद यहां का अधिकांश काम बाहरी एजेंसियों को दिया जा चुका है। चाहे साफ-सफाई हो या कर संग्रह, पार्किंग शुल्क वसूलना हो या जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने का जिम्मा, हर काम निजी एजेंसियों को दे दिया गया है। नगर निगम का काम केवल लोगों से भारी-भरकम टैक्स वसूलना और ट्रेड लाइसेंस जारी करना रह गया है। पूरे कोरोना काल में नगर निगम की ओर से न एक टेस्टिंग शिविर का आयोजन किया गया और न ही राहत शिविर ही शुरू किये गये हैं। टीकाकरण अभियान में भी इसकी कोई भूमिका नजर नहीं आती है। संक्रमितों के शव की अंत्येष्टि के लिए नगर निगम की व्यवस्था क्या थी, यह जगजाहिर हो चुका है। दलालों द्वारा परिजनों से मनमानी वसूली और जैसे-तैसे शवों को जलाने की घटनाएं आम हो गयी हैं। अब लोग कहने लगे हैं कि नगर निगम में यदि कोई काम होता है, तो वह है राजनीति और हमेशा टकराव की जमीन तैयार करना।
अब नगर निगमों को और इसके पार्षदों, मेयरों और डिप्टी मेयरों को समझ लेना होगा कि लोग उनकी भूमिका से बेहद नाराज हैं। वे मुंबई नगर निगम की मिसाल देने लगे हैं, जिसने कोरोना संक्रमण को अपनी एकजुटता और कार्यप्रणाली से काफी हद तक नियंत्रित कर लिया। उसकी कार्यशैली की तारीफ चारों तरफ हो रही है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकारों से कहा है कि उन्हें बीएमसी से सीख लेनी चाहिए।
नगर निगमों के तमाम अंगों को इस आपदा के दौर में अपनी भूमिका निभाने के लिए आगे आना ही होगा। राजनीति अपनी जगह है और काम अपनी जगह। ऐसा कतई नहीं होना चाहिए कि राजनीतिक दांव-पेंच में आम लोगों की मुश्किलों की आवाज कहीं दब जाये और बाद में यह असंतोष बन कर उभरे। काम का मतलब अधिकारियों का दोष गिनाना और पत्र लिखना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के आंसू पोछना होता है। इसका सबसे सीधा और सरल रास्ता यही होगा कि नगर निगम को अपने मूल काम की ओर ध्यान लगाना चाहिए। अन्यथा यह कहना गलत नहीं होगा कि नगर निगम तो नगरों की सेहत के लिए हानिकारक होता जा रहा है।