पटना। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से सत्ता की सबसे बड़ी कुंजी रहे हैं। यही वजह है कि नए मंत्रिमंडल विस्तार में भी हर दल ने जातीय संतुलन साधने की पूरी कोशिश की। मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा द्वारा सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाने के बाद अब मंत्रिमंडल गठन में भी जाति आधारित गणित साफ दिखाई दिया। 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में नियम के अनुसार अधिकतम 36 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं, इसलिए हर जाति और क्षेत्र को साधने की चुनौती सबसे बड़ी रही।
नए शपथ ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री सहित भाजपा के 16 मंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्रियों समेत जदयू के 15 मंत्री शामिल हैं। इसके अलावा लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के दो, हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के एक और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के एक मंत्री को जगह मिली है। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सबसे अधिक चर्चा जातीय प्रतिनिधित्व और कुछ बड़े नेताओं के बाहर होने को लेकर हो रही है।
सबसे चर्चित घटनाओं में पहली है निशांत कुमार की राजनीति में औपचारिक एंट्री। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से परिवारवाद के विरोधी माने जाते रहे हैं, लेकिन अब उनके बेटे निशांत कुमार ने पार्टी सदस्यता लेने के बाद मंत्री पद की शपथ भी ली। बिहार की राजनीति में यह बदलाव बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इसे आने वाले समय की बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
दूसरी बड़ी चर्चा भाजपा के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने को लेकर है। भाजपा के अंदर यह माना जा रहा था कि पश्चिम बंगाल में पार्टी प्रभारी के रूप में सक्रिय भूमिका निभाने और हालिया राजनीतिक सफलता के कारण उनका मंत्री बनना लगभग तय है। लेकिन अंतिम समय में जातीय समीकरण बदल गए। ब्राह्मण चेहरे के तौर पर नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी को प्राथमिकता मिलने के बाद मंगल पांडेय का नाम सूची से बाहर हो गया।
मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान एक और बड़ा मुद्दा नितिन नवीन और कायस्थ समाज से जुड़ा रहा। नितिन नवीन के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद यह उम्मीद थी कि उनकी जगह किसी दूसरे कायस्थ नेता को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। पटना साहिब क्षेत्र से विधायक संजीव चौरसिया का नाम भी चर्चा में था, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। इसके साथ ही बिहार सरकार में अब कायस्थ समाज का कोई मंत्री नहीं बचा है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर भाजपा समर्थकों और कायस्थ समाज के लोगों में नाराजगी भी देखने को मिल रही है।
राजधानी पटना के शहरी क्षेत्र से भी इस बार कोई मंत्री नहीं बनाया गया। दानापुर से जीतकर आए रामकृपाल यादव को मंत्रिमंडल में जगह मिली, लेकिन शहरी पटना का प्रतिनिधित्व पूरी तरह गायब हो गया। इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि भाजपा ने ग्रामीण और जातीय वोट बैंक को प्राथमिकता दी है।
अगर जातीय समीकरण पर नजर डालें तो भाजपा ने यादव, ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, दलित, वैश्य और अति पिछड़ा वर्ग को साधने की कोशिश की है। रामकृपाल यादव को यादव चेहरे के रूप में आगे किया गया, जबकि नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी को ब्राह्मण प्रतिनिधित्व मिला। विजय कुमार सिन्हा और इंजीनियर कुमार शैलेन्द्र भूमिहार समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं राजपूत समाज से संजय टाइगर और श्रेयसी सिंह को मौका मिला है।
जदयू ने भी कुर्मी, दलित, अति पिछड़ा और अल्पसंख्यक समीकरण को संतुलित रखने की रणनीति अपनाई। निशांत कुमार और श्रवण कुमार कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि अशोक चौधरी और रत्नेश सदा दलित चेहरे हैं। जमा खान को अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के तौर पर शामिल किया गया है।
लोजपा (रामविलास) ने दलित और राजपूत समीकरण पर भरोसा जताते हुए संजय पासवान और संजय सिंह को मंत्री बनाया है। वहीं हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा से संतोष मांझी को और राष्ट्रीय लोक मोर्चा से दीपक प्रकाश को जगह मिली है।
कुल मिलाकर बिहार मंत्रिमंडल विस्तार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राज्य की राजनीति में जातीय संतुलन सबसे बड़ा फैक्टर बना हुआ है। कौन शामिल हुआ और कौन बाहर रह गया, इसके पीछे राजनीतिक अनुभव से ज्यादा जातीय गणित की भूमिका दिखाई दी। आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सभी दलों ने अपने-अपने वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।

