रांची: कुंदन पाहन के बारे में आजाद सिपाही को कुछ चौंकानेवाली जानकारियां मिली हैं। अपना साम्राज्य स्थापित करने के बाद कुंदन पाहन का संबंध धीरे-धीरे भाकपा माओवादियों से कटता गया था। संगठन और कुंदन पाहन के बीच लुका-छिपी का खेल चल रहा था। इस दौरान कुंदन कुछ दूसरे संगठनों के नजदीक आ गया था। कुंदन ने चालाकी दिखाते हुए माओवादियों से बचने के लिए टीपीसी के साथ नजदीकियां बढ़ायी थीं। इसी क्रम में कुंदन पाहन की टीपीसी के भीखन गंझू से नजदीकी हुई।
इसके बाद बदलते हालात के मद्देनजर कुंदन ने सरेंडर का फैसला किया। यह उसके लिए जरूरी भी था। उसका निर्णय पुलिस के लिए भी अहम था, क्योंकि पुलिस के हाथ कुंदन की गर्दन तक नहीं पहुंच पा रहे थे। इसी बीच कुंदन को एक लिंक मिला और उसने पुलिस के वरीय अधिकारियों से संपर्क साधा। जब बात बनने लगी, तब उसने टीपीसी के लोगों से हथियारों का सौदा किया। उसने टीपीसी को 2 मोर्टार, हैंड ग्रेनेड, 12 एके 47 और 3 एके 56 समेत कई छोटे-बड़े हथियार बेच दिये।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले साल ही कुंदन आत्मसमर्पण करना चाहता था, लेकिन अचानक हुई नोटबंदी के बाद उसने पैसों को खपाना जरूरी समझा। नोटबंदी के कारण उसे हथियारों के पैसे भी समय पर नहीं मिले। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सरेंडर से पहले टीपीसी के भीखन गंझू ने कुंदन पाहन से हथियार खरीदे थे और उसके एवज में साठ लाख रुपये उसे मिले थे। ऐसे भी कुंदन पाहन जैसे दुर्दांत नक्सली के पास से एक भी हथियार का नहीं मिलना इस बात का स्पष्ट इशारा है कि उसने हथियार बेचे या कहीं खपा
दिये हैं।
उधर हथियार बेचे जाने की सूचना से एमसीसी का सुधाकरण काफी नाराज था। इसके बाद से ही कुंदन उसके निशाने पर था। कुंदन भी इससे वाकिफ था। इसी बीच पुलिस के वरीय अधिकारियों के साथ उसकी बातचीत पक्की हो गयी और उसने सरेंडर कर दिया। कुंदन पाहन का सरेंडर पुलिस के लिए निश्चित रूप से सफलता की बात है और झारखंड के लिए चैन की बात। सबसे ज्यादा राहत की सांस वे ग्रामीण ले रहे हैं, जिनके बच्चों को कुंदन जबरदस्ती संगठन में शामिल करा कर बंदूक थमा देता था। वे अभिभावक भी चैन की सांस ले रहे हैं, जिनकी बच्चियों को कुंदन संगठन में शामिल करा कर गलत काम करता था।
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