योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद रामगढ़ झील का सौंदर्य दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। पर्यटक भी इधर आकर्षित हुए हैं। इस वजह से लोगों में झील से रोजी-रोटी और रोजगार के अवसर दिखाने लगे हैं।
 रामगढ़ झील की दलदली जमीन (वेटलैंड) पक्षियों के लिए न सिर्फ आहार का जरिया है बल्कि मानसून सीजन में सुरक्षा की दृष्टि से उनका प्रजनन स्थल भी है। लेकिन अब जलकुम्भी की साफ-सफाई में जाने-अनजाने इन पक्षियों का प्रवास उजड़ रहा है। प्रजनन स्थल निरंतर बिखर रहा है। पक्षियों के प्रवास और प्रजनन स्थलों के लिए संकट गहराया गया है।
 गौरतलब है कि सर्दियों के दिनों में झील में प्रवासी एवं स्थानीय पक्षियों की प्रजातियां डेरा डालती हैं। उथली एवं आद्रभूमि पर भोजन और प्रजनन के लिए पक्षियों को स्थल मिलता है। जाड़ा एवं मानसून सीजन में पक्षी ब्रीडिंग करते हैं। कुछ आसपास के पेड़ों तो कुछ पानी के बीच उथली एवं आद्रभूमि पर अड्डें देती हैं। लेकिन जलनिगम द्वारा जल कुम्भियों की सफाई करा दिए जाने से ऐसे पक्षियों के समक्ष संकट खड़ा हो गया है। हालांकि इस संकट की घड़ी में इन पक्षियों के लिए शहीद अशफाक उल्लाह खा प्राणि उद्यान का हरा-भरा वेटलैंड एक बड़ा सहारा है। तमाम पक्षियों ने वहां डेरा डाल लिया है।
 पर्यावरणविद् डॉ. आरके सिंह कहते हैं कि ब्र‍िटिश दौर में जार्ज पंचम को जलकुम्भी के फूल बहुत पसंद थे। यूरोप से उनके साथ आई यह प्रजाति भारत की जैव विविधता का अंग नहीं है। इसके हटाने से जैव विविधता प्रभावित भी नहीं होती है, लेकिन रामगढ़ झील में कुछ वर्ष पहले हुई ड्रेजिंग के बाद उथली जमीन नहीं है। यही वजह है कि जलकुम्भियों के ऊपर ही पक्षियों ने अपना आश्रय और प्रजनन स्थल बना रखा है। इन पक्षियों का यह है ब्रीडिंग सीजन पर्पल स्वैम्फ-हेन, ग्रे-हेरॉन, नाइट हेरॉन, पाण्ड हेरॉन, जकांना उर्फ जलकपोत, वॉटर हेन (पनमुर्गी), इग्रेट (बड़ा बगुला), स्वैलो, ब्लैक विंग स्टिल्ट, लेसर विसलिंग डक आद्रभूमि में मानसून सीजन में प्रजनन करते हैं। इसके पूर्व नवंबर से मार्च तक रेड शैंक, ग्रेटर स्नाइप समेत कई पक्षी यहां अण्डे देते हैं। तापमान बढ़ने पर ठण्डे स्थानों पर लौट जाते हैं। इस बार ठण्ड के दिनों में काफी पक्षियों ने यहां प्रजनन किया था।
 राममगढ़ झील के इस भूमि को बचाएंं वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर धीरज कुमार सिंह और चंदन प्रतीक हर साल रामगढ़ झील और पक्षियों के सौदर्य को अपने कैमरे में कैद करते हैं। दोनों ही स्वीकार करते हैं कि पिछले कुछ वर्षो में पक्षियों की आमद में कमी आई है। जलकुम्भियों के साथ कई तरह के कीड़े और जलीय वनस्पतियां इन पक्षियों का आहार होती हैं।
 इधर, हेरिटेज फाउंडेशन के नरेंद्र मिश्र कहते हैं कि पहले लगता था कि पक्षी बढ़ती चहल पहल से दूर हो रहे हैं, लेकिन अब महसूस होता है कि उनका प्रवास एवं प्रजनन स्थल दोनों ही प्रभावित हो रहा है। हर हाल में इनका संरक्षण किया जाना चाहिए। फिलहाल इस समस्या को चंदन एवं धीरज ने डीएफओ अविनाश सिंह के संज्ञान में लाया है।
 इस सम्बंध में गोरखपुर के डीएफओ अविनाश कुमार का कहना है कि कुछ पक्षी व पर्यावरण पक्षी एवं पर्यावरण प्रेमियों ने इस ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। मैंने स्वयं भी झील का निरीक्षण किया है। इस बारे में जल्द ही संबंधित संस्थाओं से बात कर कुछ बीच का रास्ता निकाला जाएगा।
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