आजाद सिपाही संवाददाता
26 जनवरी की हिंसा के बाद घटता गया काफिला, मौसम अनुसार बदल रहा आंदोलनस्थल का स्वरूप गांव और खाप के हिसाब से बनाए ठिकाने, साप्ताहिक रोटेशन पर आते-जाते हैं
हरियाणा के कुंडली, टिकरी, खेड़ा बॉर्डर और पंजाब और उत्तर प्रदेश से आजाद सिपाही की रिर्पोट।
कड़ाके की ठंड, आंधी-बरसात, गर्मी और कोरोना दौर झेलकर किसान आंदोलन 7 माह के पड़ाव में पहुंच गया है। समय के साथ आंदोलन का स्वरूप भी बदला है। कुंडली से लेकर केजीपी तक 10 किलोमीटर का दायरा आंदोलन स्थल है। संयुक्त किसान मोर्चा यहीं बैठक कर प्रोग्राम तय करता है। अब आंदोलन में फिर जोश भरने के लिए किसान नेता हरियाणा-पंजाब से गाड़ियों, बाइक व अन्य वाहनों में काफिले लेकर आ रहे हैं। किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी करनाल व अम्बाला से दो काफिले ला चुके हैं। वहीं, दहिया खाप के गांवों के किसान नेता अभिमन्यु कुहाड़ के नेतृत्व में काफिला सिंघु बॉर्डर पहुंचा। अब आंदोलन में भीड़ जुटाने की जद्दोजहद हो रही है।
कुंडली में अब पहले जैसी लंगर सेवा नहीं है। सबकी अपनी रसोई है। हर गांव और खाप अनुसार झोपड़ी, पंडाल व रसोई बनी है। टेंट, झोपड़ी व विशेष ट्रालियों में एसी, कूलर, पंखों की सुविधा है। सबने अपना राशन रखा हुआ है। सुबह-शाम अपनी-अपनी रसोई में खाना बनता है। साप्ताहिक रोटेशन पर गांव व खाप अनुसार किसान पहुंच रहे हैं। आटा पिसाई के लिए चक्की लगा दी है। खापों ने गांवों के अनुसार जिम्मेदारियां बांटी हैं। कहीं युवा व किसान घर-घर से दूध व लस्सी जुटाकर लेकर जाते हैं तो कहीं खेतों से सब्जियां या फिर ईंधन पहुंचाया जा रहा है। इसी तालमेल से आंदोलन लगातार जारी है।
इन मुरझाए चेहरों को समाधान की खुशखबरी का इंतजार।
मंच हर दिन चलता है, नेता कभी-कभी आते हैं।
कुंडली में आंदोलन का मुख्य मंच है। यहां 26 नवंबर को जब किसान पहुंचे तो ट्रैक्टर-ट्रॉली खड़ी कर माइक से संबंधोन के साथ शुरू हुआ था। आगे दिल्ली पुलिस की तरफ से कंटीली फैंसिंग, पक्की सीमेंट बैरिगेड्स की कई लेयर से हाईवे बंद है। पिछले दिनों आंधी ने पूरा मंच उखाड़ दिया था। अब पक्की टीन शेड से बनाया है। मोर्चा के नेता मीटिंग के बाद मंच से घोषणा करते हैं। मंच पर किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढ़ूनी, दर्शनपाल आदि नेता संबोधन करते हैं। हर दिन मंच तक महिलाएं पहुंच रही हैं।
सरकार पर गुस्सा, स्वभाव में चिड़चिड़ापन।
मास्क नहीं लगाते, बोले-अलग ठिकाने हैं, कोरोना नहीं होता।
कोरोना के दौर में आंदोलन स्थल पर शायद ही कोई किसान मास्क लगाए मिले। अमृतसर के किसान गुरचरण, मोहाली के हरभजन का कहना है कि कोरोना यहां नहीं है। सब अपने हिसाब से अपने-अपने ठिकानों में रह रहे हैं। आंदोलन में भीड़ कम न हो, इसके लिए साप्ताहिक रोटेशन बनाया है। एक सप्ताह जो किसान रहते हैं, अगले सप्ताह दूसरे आ जाते हैं। बहुत से बुजुर्ग और अन्य ऐसे किसान भी हैं, जो लगातार यही हैं।
जमीन कम, पशुपालन से आय थी, 2 लाख का नुकसान हुआ।
दहिया खाप के गांवों में शामिल गढ़ी सिसाना के सतनारायण स्वभाव से चिड़चिड़े हो चुक हैं, क्योंकि 4 महीने से आंदोलन में हैं। सरकार को कोसते हुए बोले- इनसे भरोसा उठ गया है, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे। एक से डेढ़ एकड़ जमीन है। पशुपालन करता था। आंदोलन में रहने से घर पर भैंस और गाय बीमार हो गई है। दो लाख का नुकसान हो चुका। घर वाले बुलाते हैं, लेकिन अब आंदोलन खत्म होने पर ही जाएंगे।
कामकाज ठप
6 महीने से दिल्ली बॉर्डर बंद, गांवों के रास्तों से खर्च भी बढ़ा।
एनएच-44 जो 24 घंटे वाहनों के आवागमन का गवाह था, वह छह महीने से केएमपी चौक से आगे कुंडली तक बंद है। आंदोलन के अंदर से लोकल गाड़ियों के लिए रास्ता है। गांवों के रास्तों से वाहन निकल रहे हैं। 10 किलोमीटर के दायरे में कार शोरूम, पेट्रोल पंप, 3 बड़े मॉल व शोरूम का धंधा न के बराबर है। वहीं, कंडली की करीब 3200 इंडस्ट्री पर आंदोलन का असर जारी है। किराया दोगुना हो चुका है।
4 हजार टेंट में 15 हजार किसान हैं।
किसान एकजुटता से आंदोलन को बढ़ा रहे थे कि 26 जनवरी की हिंसा के बाद हौसला टूट गया। लक्खा सिधाना व दीप सिद्धू पर मुकदमा दर्ज होने के बाद यहां से युवाओं ने पलायन शुरू कर दिया था। राकेश टिकैत के आंसुओं ने फिर से आंदोलन में जान फूंकी और हरियाणा की तमाम खाप पंचायतों ने स्थाई डेरा डाल लिया। आंदोलन पंजाब से आगे बढ़कर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गया। सिंघु बॉर्डर पर करीब 4 हजार टेंटों में करीब 15 हजार किसान हैं।
खेड़ा बॉर्डर पर 45 टेंट-तंबू और 100-150 लोग यहां किसान आंदोलन को जीवित रखे हुए हैं।
अजय भाटिया/रेवाड़ी कुंडली-सिंघु बॉर्डर के बाद 13 दिसंबर 2020 को दिल्ली-जयपुर हाईवे के खेड़ा-शाहजहांपुर बॉर्डर पर किसानों ने पड़ाव डाला। 4 दिन बाद यहां के धरने को 6 माह पूरे होने जा रहे हैं। हालांकि गर्मी में आंदोलन ठंडा पड़ चुका है। हाईवे के बीच लगे करीब 45 टेंट-तंबू और यहां नजर आने वाले 100 तो कभी 150 प्रदर्शनकारी ही आंदोलन को जीवित रखे हुए हैं। 4 माह पहले की तरह यहां बड़ी सभाएं या प्रदर्शन नहीं होते। उस समय 1000-1200 लोग होते थे। रेवाड़ी जिले की सीमा में मसानी बैराज के पास किसानों के पड़ाव को स्थानीय ग्रामीणों ने खदेड़ दिया था। रेवाड़ी-रोहतक हाईवे पर भी कुछ किसानों ने धरना शुरू किया, वह पुलिस ने खत्म करा दिया। तब से राज्य के इस छोर पर सिर्फ खेड़ा-शाहजहांपुर बॉर्डर पर धरना चल रहा है। आंदोलन की शुरूआत से ही यहां डटे सीकर जिला के 4 बार विधायक रह चुके कामरेड अमराराम व श्रीगंगानगर के पूर्व विधायक पवन दुग्गल इस बात से सहमत नहीं कि आंदोलन बेकार जा रहा है। कहा कि देश की 65% आबादी खेती पर आधारित है। पहली बार किसानों ने सरकारों को अपनी ताकत का अहसास कराया है। आगे 10 सालों में भी कोई सरकार इन कानूनों को हाथ नहीं लगाएगी। 2024 तक भी बैठना पड़ा तो बैठेंगे।
टिकरी बॉर्डर अब 25 हजार में से तीन हजार किसान बचे।
पहले 25 हजार के करीब किसान थे। अब कई माह से करीब 3 हजार किसान ही रह गए हैं। महिलाओं की संख्या में काफी कमी आई है। आंदोलन में किसान अभी भी उत्साह से भरे हैं। वे आंदोलन स्थल छोड़ने को तैयार नहीं हैं। किसान आंदोलन टिकरी बॉर्डर औद्योगिक क्षेत्र के बीच में होने के कारण औद्योगिक एरिया में 90 फीसदी फैक्ट्री बंद पड़ी है। 30 फीसदी फैक्ट्रियों पर ताले लग गए हैं, जो किराए पर स्थान लेकर फैक्ट्री चला रहे थे, सबसे अधिक असर उन उद्योगपतियों पर पड़ा है।
पंजाब के किसान नेता बोले- उत्तराखंड, यूपी में भाजपा के खिलाफ प्रचार करेंगे।
संगरूर (पंजाब) भाकियू उगराहां के राज्य प्रधान जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि जब तक तीन कृषि कानून रद्द नहीं होते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। किसान मोर्चे की बैठक में फैसला हुआ कि आगामी समय में उत्तराखंड व यूपी में भाजपा के खिलाफ प्रचार करेंगे। किसान संगठनों की मुजफ्फरनगर में महारैली कर यूपी मिशन का आगाज किया जाएगा। इसमें पंजाब, हरियाणा व यूपी के किसान शिरकत करेंगे। जोगिंदर ने कहा कि हर रविवार 5-7 हजार किसान आंदोलन में शिरकत करने के लिए आ रहे हैं। उन्हीं वाहनों में दूसरे किसान घर लौट जाते हैं। रोटेशन चलता है।
उत्तर प्रदेश में तेज हो सकता है आंदोलन।
लखनऊ में कोरोना संक्रमण के थमने के साथ एक बार फिर आंदोलन के तेज होने की संभावना है। राज्य के चुनाव भी करीब हैं, विपक्षी दल भी किसान आंदोलन को गमार्ने की तैयारी कर रहे हैं। विपक्षी दलों ने पहले ही किसान आंदोलन का समर्थन किया है। यूपी के गाजीपुर बॉर्डर 6 महीने बाद भी आंदोलन चल रहा है। राकेश टिकैत व राष्ट्रीय लोकदल के असर वाले इलाकों में कभी कभार किसानों की एकजुटता हो जाती है। गाजीपुर बॉर्डर पर 28 नवंबर से धरना जारी है। उप्र में आंदोलन का असर कम होने के पीछे सरकार की सख्ती भी है।