मास्क पहनिये : बस कुछ दिन संयम रखिए, दो गज दूरी बना कर रखिये, आपकी जिंदगी की गाड़ी जल्द पटरी पर लौट आयेगी
कोरोना की दूसरी लहर अब ढलान पर है, लेकिन तीसरी लहर से सभी आशंकित हैं। वैज्ञानिक अनुमानों के कारण एक अनजाना भय लोगों में फैला है। ऐसे माहौल में यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर 1918 की स्पेनिश फ्लू महामारी के दौरान भारत में क्या हुआ था और कैसे इस पर विजय मिली थी। संयम, धैर्य और अनुशासन ही इस जीत का मूल मंत्र तब भी था और अब भी है। भारत में स्पेनिश फ्लू के इतिहास पर नजर दौड़ाने के साथ कोरोना के भविष्य को लेकर आजाद सिपाही के टीकाकार राकेश सिंह की विशेष रिपोर्ट।
पहले विश्व युद्ध की मार झेल रहा 1918 का भारत आर्थिक रूप से बहुत ही कमजोर पड़ गया था। हर तरफ सूखा-भुखमरी फैली हुई थी। इस दरम्यान जैसे-जैसे विश्व युद्ध समाप्ति की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे भारत से युद्ध में गये सैनिक वतन को लौटने लगे। एक आंकड़े के मुताबिक लगभग दस लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था। इनमें 53 हजार 486 सैनिक शहीद हो गये और 64 हजार 350 सैनिक बुरी तरह घायल। और यह सब उस लड़ाई के लिए हुआ, जो भारत की थी ही नहीं। ज्यादातर सैनिकों का आगमन बांबे के समुद्री रास्ते से ही हो रहा था। कहा जाता है कि सेना की एक टुकड़ी जब बांबे के एक बंदरगाह पर रुकी, तो करीब 48 घंटे तक वह जहाज वहीं खड़ा था। इस बीच 10 जून 1918 को पुलिस के सात जवान, जो उस बंदरगाह पर तैनात थे, अचानक नजले, जुकाम से ग्रस्त हो गये। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। यह भारत में स्पेनिश फ्लू और इन्फ्लूएंजा का पहला मामला था। लेकिन तब तक तो यह बीमारी पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। आज 2021 में हम जिस खतरनाक कोरोना महामारी की बात कर रहे हैं, उसकी शुरूआत 2019 के नवंबर महीने में चीन से हुई। यह जिस स्वरूप में सामने आया, उसकी बनिस्बत 1918 का स्पेनिश फ्लू इससे कहीं ज्यादा खतरनाक था। कोरोना वायरस के बारे में अभी तक यही सामने आया है कि यह इंसान के शरीर में पांच-छह दिन के अंदर अपने रूप को दिखा देता है। जितना नुकसान पहुंचाना होता है, वह कर देता है। वहीं प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जो स्पेनिश फ्लू का वायरस फैला, वह मात्र तीन से चार दिनों में इंसान को बुरी तरह अपनी चपेट में ले लेता था। एक अनुमान के मुताबिक इस स्पेनिश फ्लू ने दुनिया भर में लगभग 50 करोड़ लोगों को संक्रमित किया था। इस महामारी ने विश्व भर में पांच करोड़ लोगों की जान ले ली थी। मरनेवालों की संख्या के बारे में कहा तो यहां तक जाता है कि यह संख्या पांच नहीं, 10 करोड़ थी। इसमें भारत में ही सवा करोड़ से अधिक लोग मरे थे। कुछ का कहना है कि यह आंकड़ा एक करोड़ 80 लाख के आसपास था। उस समय कुल 10 करोड़ आबादी वाले अमेरिका में छह लाख 75 हजार लोग मारे गये थे। इस महामारी से सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही हुआ था। एक तो इतने सारे लोगों की मृत्यु और ऊपर से अर्थव्यवस्था का सबसे निचले पायदान पर चला जाना। इंसान महामारी से मरे नहीं मरे, भुखमरी से तो मर ही रहा था।
जब महामारी आयी, तो पहला विश्व युद्ध चल रहा था। मार्च 1918 में अमेरिका में एक अजीब सी बीमारी सैनिकों के शरीर में पनपने लगी। पहले तो करीब एक सौ लोग इसकी चपेट में आये और यह सिलसिला अमेरिकी सैनिकों के बंकरों में उभरना शुरू हुआ था। पहला केस अमेरिकन आर्मी के कैंप फुनस्टोन (कंसास) में अल्बर्ट गिटशैल नामक एक बावर्ची में पाया गया। उसे 104 डिग्री के बुखार में अस्पताल में भर्ती किया गया था। यह वाकया 11 मार्च 1918 को हुआ था। यह बीमारी, मतलब वायरस बहुत ही तेजी से 54 हजार सैनिकों और उनके परिवार के लोगों में फैल गया था और करीब 11 सौ सैनिकों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसमें 38 सैनिकों की मौत हो गयी थी। पता चला कि उनके शरीर में निमोनिया पनप रहा था। जांच में पाया गया था कि यह निमोनिया वायरस के चलते ही पनप रहा था और घातक रूप ले रहा था, जिससे लोगों की बुखार, नाक और कान से खून का बहना, सूखी खांसी और साथ ही सांस फूलने से मौत हो रही थी। अगस्त आते-आते तो यह स्पेनिश फ्लू पूरे विश्व में फैल चुका था, क्योंकि विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों की गतिविधि इतनी ज्यादा थी कि उसी रफ्तार से वायरस उनमें प्रवेश कर दूसरे देशों तक पहुंच रहा था।
महात्मा गांधी और मुंशी प्रेमचंद भी स्पेनिश फ्लू से संक्रमित हो गये थे
बात भारत की करते हैं। अपने पहले लेख (28 मई 2021) में मैंने स्पेनिश फ्लू का पूरा विवरण लिखा है। उसमें विश्व स्तर पर स्पेनिश फ्लू की तबाही के बारे में जिक्र किया गया है। भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्पेनिश फ्लू से संक्रमित हो गये थे। उनकी पुत्र वधू और पोते की भी मौत इसी स्पेनिश फ्लू के कारण हुई। महात्मा गांधी को डर था कि भारत इस महामारी से कैसे उबरेगा। इस महामारी ने भारतियों में ब्रिटिश शासन के प्रति इतना क्रोध भर दिया कि 1947 का सफर उनकी आंखों में अब साफ दिखाई पड़ने लगा था। जरा सोचिये, अगर गांधी जी इस बीमारी से ठीक नहीं होते, तो भारत की आजादी की लड़ाई किस दिशा में जाती। कहा तो यह भी जाता है कि मशहूर उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद भी स्पेनिश फ्लू से संक्रमित हो गये थे। जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद सैनिक अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे, तो उनमें जो बीमार थे, उन्हें तो पहले ही क्वारेंटाइन कर दिया जा रहा था। लेकिन जो बिना लक्षण वाली बीमारी से ग्रसित सैनिक थे, मतलब एंसिप्टोमैटिक थे, वे ट्रेन के माध्यम से अपने साथ वायरस को अपने गावों की ओर लेकर निकल पड़े। भारत में स्पेनिश फ्लू की पहली लहर की शुरूआत जून 1918 में हुई। यह बीमारी बांबे फीवर और बांबे इन्फ्लुएंजा के नाम से भारत में प्रचलित हो रही थी, क्योंकि भारत में संक्रमण का सिलसिला बांबे के बंदरगाह से ही शुरू हुआ था। बांबे फ्लू या यूं कहें स्पेनिश फ्लू भारत के कोने-कोने तक पहुंच चुका था। उत्तरप्रदेश से लेकर बंगाल, पंजाब से लेकर कश्मीर तक महामारी अब आतंक मचाने को तैयार बैठी थी। भारत में यह वायरस 20 से 40 साल की उम्र वालों को ज्यादा संख्या में अपना शिकार बना रहा था।
यह आयु वर्ग ज्यादातर साइकोटाइन स्टॉर्म का शिकार हो रहा था। जब भी हमारे शरीर में कोई वायरस प्रवेश करता है, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता उससे लड़ती है और उसे खत्म कर देती है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हमारा इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाता है और बीमारी से लड़ने के साथ-साथ हमारे शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाने लगता है।’ इसे ही ‘साइटोकाइन स्टॉर्म’ कहा जाता है। उस दौरान ऐसा पाया गया कि महिलाएं, जिनकी उम्र 15 से 44 साल के बीच थी, उनमें मृत्यु दर अधिक थी। माना जाता है कि उस दौरान 1919 में बच्चों की जन्म दर भारत में 30 प्रतिशत तक घट गयी थी। वायरस ने अपना रूप बदला और सितंबर में दूसरी लहर की शुरूआत हो गयी। महज चार महीने में ही वायरस ने करोड़ों को मौत की नींद सुला दी। बहुत से चिकित्सा इतिहासकारों का मानना है कि उस वक्त जो तीन अटलांटिक बंदरगाह थे, जो एक-दूसरे से हजारों मील की दूरी पर थे, जैसे फ्रीटाउन दक्षिण अफ्रीका का प्रमुख शहर, फ्रांस का ब्रेस्ट और अमेरिका का बोस्टन शहर, यही स्पेनिश फ्लू के विस्फोट का कारण बने। यही तीन बंदरगाह सैन्य जहाजों की आवाजाही का प्रमुख केंद्र थे और यहीं से जो सैन्य जहाज बांबे के बंदरगाह पर पहुंचे, बस वहीं से भारत में संक्रमण का दौर शुरू हो गया। भारत में स्पेनिश फ्लू की दूसरी लहर की शुरूआत सितंबर में हुई। उस दौरान डॉक्टरों और मेडिकल कर्मियों की भारी किल्लत थी, क्योंकि अधिकतर मेडिकल स्टाफ विश्व युद्ध की ड्यूटी पर गये हुए थे। जो बचे हुए थे, उनको इस बीमारी के बारे में उतना ज्ञान नहीं था, क्योंकि यह बीमारी साधारण नहीं थी। यह बीमारी एक वायरस से संक्रमित होने के बाद लोगों में फैल रही थी, जो मरीज को जीने के लिए बहुत कम समय दे रही थी। अगर उस दौरान मरीज खुद ठीक हो जाये, तो अच्छा था, वरना डॉक्टर तो लक्षण के हिसाब से ही बीमारी का इलाज कर पा रहे थे। उस दौरान जब लगातार मौत का आंकड़ा बढ़ रहा था, अमेरिका के सर्जन जनरल, नेवी और अमेरिकी मेडिकल एसोसिएशन की पत्रिका ने एस्पिरिन के इस्तेमाल की सिफारिश कर दी। उसके बाद चिकित्सकों ने आम जनता को रोज 30 ग्राम तक का डोज लेने के लिए सार्वजनिक कर दिया, जबकि आज का आधुनिक मेडिकल साइंस कहता है कि चार ग्राम से ज्यादा मात्रा में डोज लेना प्राण घातक है। इस दवा के इस्तेमाल के बाद पाया गया कि अक्टूबर 1918 में लोगों की मरने की संख्या ज्यादा बढ़ गयी और ये मौतें इस दवा के जहर से हुईं, मतलब हाइ डोज से हुई। कहा जाता है कि दिल्ली के एक अस्पताल में एक दिन में स्पेनिश फ्लू के 13 हजार 190 मरीज भर्ती हुए थे, जिनमें सात हजार 44 मरीजों की मौत हो गयी थी। वहीं बंबई में मात्र एक दिन में 768 लोगों की मृत्यु हुई थी। उस वक्त भारत के बड़े शहरों में बड़ी मुश्किल से अस्पताल में मरीज भर्ती तो हो जाते थे और उन्हें डॉक्टरों की सुविधा भी प्राप्त हो जाती थी, लेकिन गांवों में यह सुविधा लोगों के पास ना के बराबर थी और जो गंगा का दृश्य कुछ जिलों में इस वक्त दिखाई दिया, उस समय इससे ज्यादा था-यानी चारों तरफ लाशें ही लाशें। कहते हैं कि लाशों के लिए लकड़ियां कम पड़ गयी थीं।
भारत में कुल एक करोड़ 80 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी। मृत्यु दर का बढ़ना सिर्फ संक्रमण के फैलने से नहीं हुआ था। भारत उस वक्त सूखे की मार झेल रहा था। ब्रिटिश सरकार ने अनाज का विश्व युद्ध के दौरान निर्यात कर दिया था और आयात के सभी माध्यम बंद थे। भारत भुखमरी की ओर बढ़ चुका था। कहते हैं कि अगर इंसान को खाना ही नहीं मिलेगा, तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता तो ऐसे ही खत्म हो जायेगी और जहां स्पेनिश फ्लू जैसी महामारी ही फैल गयी हो, तो वायरस तो इंसानी फेफड़ों को आसानी से खोखला करेगा ही। स्पेनिश फ्लू एच1एन1 वायरस इतना खतरनाक था कि अगर कोई इंसान इसकी चपेट में आ जाता, तो मात्र तीन दिन में उसका खेल खत्म। सर्दी-खांसी से शुरू होती बीमारी बुखार की शक्ल में बदल जाती और फिर नाक और कान से खून निकलने लगता। फिर वायरस जब फेफड़ों की ओर रुख करता, तो लोग सांस फूलने से, ह्रदयाघात से दम तोड़ देते। जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक थी, वे बच गये, अन्यथा मारे गये। बस सरवाइवल आॅफ दि फिटेस्ट वाली ही कहानी थी। गावों में औरतों के मरने का कारण यह माना जा रहा था कि अगर कोई भी घर में बीमार पड़ता, तो उसकी देखरेख औरतें ही ज्यादा करती थीं। और फिर गावों में जब आज के जमाने में सोशल डिस्टेंसिंग को समझना मुश्किल है, तो वह तो 1918 का भारत था। कहते हैं कि लोग तो अच्छे-खासे ट्रेन पर सवार हुआ करते थे, लेकिन जब तक वे अपने गंतव्य तक पहुंचते, वे या तो मर चुके होते थे या मरने की कगार पर होते। भारत की महामारी के इतिहास में इतनी ज्यादा संख्या में मृत्यु कभी नहीं हुई । यह 1896 के प्लेग से भी 18 गुना ज्यादा थी। प्लेग ने तो 20 सालों में 10 लाख लोगों की जान ली थी, जबकि यह वायरस, स्पेनिश फ्लू, इन्फ्लुएंजा, बांबे इन्फ्लुएंजा या यूं कहें कि बांबे फीवर मात्र दो साल में एक करोड़ 80 लाख भारतियों को लील गया था। जिस वैश्विक महामारी स्पेनिश फ्लू की शुरूआत 1918 में हुई और अंत 1920 में हुआ, उसी प्रकार का वायरस कोरोना या कोविड 19 या सार्स कोव 2, जिसका जन्म नवंबर 2019 में चीन में हुआ, क्या दिसंबर में उसका अंत होगा। हो सकता है कि अगर इतनी बड़ी महामारी की उम्र दो साल की थी, तो कोरोना वायरस का इलाज ठीक से किया जाये, मतलब तीसरी लहर तक अगर लॉकडाउन जैसे ब्रम्हास्त्र का संभाल कर इस्तेमाल किया जाये, तो वायरस फैलेगा ही नहीं। अगर फैलेगा नहीं, तो वह अपना रूप नहीं बदल पायेगा। जब वह अपना रूप नहीं बदल पायेगा, तो उसका प्रभाव भी कम होने लगेगा और फिर हमारी, मतलब इंसानों की जीत तय है। एक बार फिर इंसान बिना मास्क के खुली हवा में सांस ले सकेगा। अपनी मां के पैर छू सकेगा, अपने पिता के पावों को दबा सकेगा। माता अपने कलेजे के टुकड़े को गले से लगा पायेगी और बहन अपने भाई की कलाई पर फिर से राखी बांध पायेगी। बस थोड़ा और धैर्य बना कर रखिये, वैक्सीन लगा कर तो देखिये। आपकी जिंदगी पटरी पर लौट आयेगी।