बंधु तिर्की, आज यह नाम झारखंड की राजनीति में ही नहीं, सामाजिक कार्यों में भी प्रमुख स्थान पर है। मांडर से विधायक बंधु तिर्की ऐसे राजनेता हैं, जो पावर से बाहर रह कर भी हमेशा लोगों के बीच में रहते हैं। आदिवासी हितों के लिए हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहनेवाला यह शख्स केवल अपने क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि दूसरे इलाकों में भी इसीलिए लोकप्रिय है, क्योंकि यह हमेशा कथनी और करनी को एक मान कर चलता है। बंधु के बारे में कहा जाता है कि उनके भीतर और बाहर में कोई भेद नहीं है। किसी भी मुद्दे पर अपनी राय बनाना और फिर हर कीमत पर उस राह पर चलते जाना उनकी फितरत है। 21 साल के नौजवान झारखंड में आज जब ऐसे नेताओं की लंबी कतार है, जो कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं, लेकिन बंधु तिर्की का नाम उन गिने-चुने नेताओं में शुमार किया जा सकता है, जो केवल झारखंड और यहां के आदिवासियों का हित देखते हैं, उसके लिए लड़ते हैं। यही कारण है कि वह जिस दल में भी रहे, हर जगह अपनी छाप छोड़ते हैं। आम तौर पर विधायक या सांसद पावर रहने तक ही सार्वजनिक जीवन में दिखता है, लेकिन बंधु तिर्की इससे अलग हैं और इसका उन्हें कई बार खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। झारखंड के इस लोकप्रिय राजनीतिक शख्सियत पर आजाद सिपाही ब्यूरो की खास प्रस्तुति।
वर्ष 2001 में नये बने झारखंड के डोमिसाइल आंदोलन में किसी धूमकेतु की तरह सियासत के आकाश में एक नाम चर्चित हुआ और वह था बंधु तिर्की का। झारखंड के मूलवासियों के हितों के लिए रांची के बाहरी इलाके बनहौरा का यह नौजवान सूट-बूट छोड़ कर सादा कुरता-पायजामा में नजर आने लगा और देखते-देखते ही डोमिसाइल आंदोलन का मुख्य किरदार बन गया। इससे पहले हालांकि एकीकृत बिहार में राजद से जुड़ कर बंधु तिर्की राजनीति में आ गये थे, लेकिन उन्हें पहचान इसी आंदोलन से मिली। इसके बाद से तो वह झारखंड की सियासत में एक प्रमुख किरदार बन गये। नरकोपी नरसंहार में लगातार दिन-रात गांव-गांव का दौरा कर वह ग्रामीणों का विश्वास जीतने में सफल रहे। फिर सदभावना टूर्नामेंट करा कर मुसलिम और आदिवासियों के बीच पैच अप करवाया। 2005 में मांडर विधानसभा क्षेत्र से पहली बार वह विधायक चुने गये। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से मिल जाता है कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए ग्रामीणों ने प्रोत्साहित भी किया और मदद भी की। उस समय अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। उस सरकार में शामिल कराने के लिए एक अधिकारी ने बहुत प्रयास किया। हर तरह की सुविधाएं देने की बात कही। कोई ऐसा प्रलोभन नहीं था, जो उन्हें नहीं दिया गया। लेकिन बंधु तिर्की ने उस अधिकारी के आॅफर को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि उन्हें मैंडेट भाजपा विरोध पर मिला है। वह गरीब-गुरबों के वोट से जीते हैं। उनके प्रति मुसलिम और इसाई मतदाताओं ने अगाध विश्वास जताया है। आदिवासियों ने उन्हें अपनी आवाज बुलंद करने के लिए विधानसभा भेजा है। उसके बाद जब अजुन मुंडा की सरकार गिरी और मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बने, तो बंधु तिर्की को राज्य के शिक्षा और खेल मंत्री का दायित्व सौंपा गया। हालांकि उनके इस कार्यकाल को विवादास्पद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। उन पर कई तरह के संगीन आरोप लगे, उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन आम जनता आज तक यह मानने को तैयार नहीं है कि बंधु तिर्की ने कोई गड़बड़ी की। यही कारण है कि जेल जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आयी। उसके बाद 2009 के चुनाव में वह दोबारा मांडर से विधायक चुने गये। 2014 में वह चुनाव तो हार गये, लेकिन लगातार आदिवासी हितों के लिए संघर्ष करते रहे, समस्याओं के निदान के लिए जूझते रहे। विधायक नहीं रहने के बावजूद वह लोगों के साथ जुड़े रहे। उनके चेहरे या काम करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं हुआ। चाहे किसी को मदद की जरूरत हो या बच्चे के नामांकन में दिक्कत हो रही हो, बंधु ने हमेशा मदद का हाथ बढ़ाया। इसका पुरस्कार उन्हें 2019 में मिला, जब वह मांडर से एक बार फिर विधायक चुने गये।
बंधु तिर्की का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा। वह राजद में थे, लेकिन अपनी शर्तों पर। जिस दिन उन्हें लगा कि वहां उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, उन्होंने अपना रास्ता अलग कर लिया। इसके बाद महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और तृणमूल कांग्रेस में भी रहे, लेकिन वहां भी उन्होंने आदिवासियत नहीं छोड़ी और अपनी शर्तों पर राजनीति करते रहे। जब दिक्कत हुई, तो उन्होंने रास्ता बदल लिया। उन्हें लगा कि बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा के साथ उनकी पटरी बैठ सकती है, क्योंकि उन्हें झारखंड के लिए काम करना है। वह झाविमो में शामिल तो हुए, लेकिन हमेशा अपनी राह पर ही चलते रहे। बंधु को भाजपा की विचारधारा कभी रास नहीं आयी, क्योंकि वह झारखंड के मूलवासियों के लिए लड़ने का फैसला कर चुके थे। बकौल बंधु, भाजपा की विचारधारा आदिवासियों की विरोधी है, इसलिए उन्होंने कभी इससे नजदीकी नहीं बनायी। 2019 के चुनाव के बाद जब बाबूलाल मरांडी ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय का फैसला किया, तो बंधु उनसे भी अलग हो गये। हालांकि उनको लेकर राजनीतिक दांव-पेंच भी बहुत हुआ। फिलहाल वह कांग्रेस की धारा से जुड़ कर आदिवासी हितों की रक्षा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को समर्थन करने का फैसला उन्होंने सिर्फ इसलिए किया, क्योंकि उनकी नजर में वही झारखंड के आदिवासियों के हितों की सुरक्षा कर सकते हैं और उनकी विचारधारा भी यही है। वह कहते हैं: झारखंड निर्माण में गुुरुजी का योगदान अद्वितीय है। गुरुजी के आंदोलन ने ही झारखंड को पहचान दिलायी। उस आंदोलन के कारण ही झारखंड के आदिवासी हितों की रक्षा संभव हो पायी, नहीं तो उसे मटियामेट करने की कोशिश तो बहुत हुई। वह कहते हैं हेमंत सोरेन आदिवासी हितों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं। वह कठोर फैसले लेने में भी नहीं हिचकते।
बंधु तिर्की ने हाल के दिनों में रूपा तिर्की की मौत के मामले को जिस तरह अंजाम तक पहुंचाया, उससे उनकी छवि और निखर गयी है। इसके अलावा आदिवासी संस्कृति की पहचान धुमकुड़िया के निर्माण के लिए उन्होंने जिस तरह की सक्रियता दिखायी है, उसकी चौतरफा तारीफ हो रही है। आज भी बंधु तिर्की सुबह अपने आवास से निकलते हैं और देर रात को ही लौटते हैं। कोरोना काल में उन्होंने लोगों की जितनी मदद की है, वह सराहनीय है। पढ़ाई हो या शादी, इलाज हो या श्राद्ध, बंधु तिर्की हमेशा लोगों की उम्मीदों के केंद्र में रहते हैं। वह काम में राजनीति को आड़े नहीं आने देते। पिछले महीने उन्होंने जब इटकी यक्ष्मा आरोग्यशाला को एम्स के रूप में विकसित करने की मांग की, तो उन्होंने तमाम राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भुला कर स्थानीय सांसदों और भाजपा के केंद्रीय नेताओं को पत्र भेजा। मांडर की विकास योजनाओं के लिए वह किसी भी दल के नेता के पास पहुंचते हैं और उनका यही गुण उन्हें दूसरों से अलग करता है। लोग भी उनसे बगैर किसी झिझक के मिलते हैं और यह बताता है कि वह सभी उम्र और वर्ग के लोगों में समान रूप से लोकप्रिय हैं।
झारखंड को आज ऐसे ही नेता और सामाजिक कार्यकर्ता की जरूरत है, जो हर समय तत्परता से लोगों की सेवा में जुटा रहे। राजनीतिक विचारधारा को काम से अलग रखना और अपने बनाये हुए रास्ते पर चलने वाला नेता ही लोगों को लंबे समय तक याद रहता है। झारखंड के दूसरे राजनीतिक नेताओं को इस बात को समझना होगा, क्योंकि बंधु तिर्की बनना असंभव नहीं, तो मुश्किल जरूर है और यह भी कि हर जनप्रतिनिधि बंधु तिर्की नहीं हो सकता।