तरजीह नहीं मिली, तो अप्रासंगिक होना तय : जितिन प्रसाद की विदाई और सचिन पायलट की बगावत से उभरे संकेत
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के भीतर एक बार फिर तूफान की आहट मिलने लगी है। एक के बाद एक चुनावी पराजय का सामना करने के बाद पार्टी के भीतर युवा नेताओं की कतार का दम अब पुराने ढर्रे से घुटने लगा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने, राजस्थान में सचिन पायलट की बार-बार की बगावत, हाल में बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी का सूपड़ा साफ होने और उसके बाद यूपी की राजनीति में अलग स्थान रखनेवाले युवा नेता जितिन प्रसाद के इस्तीफे से स्थिति साफ हो गयी है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। इधर झारखंड के युवा कांग्रेसी विधायक भी बार-बार दिल्ली जाकर अपनी पीड़ा का इजहार कर रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस के युवा नेताओं को मिलिंद देवड़ा की सीख और पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू की बगावत ने कांग्रेस के भीतर ऐसा तूफान मचा दिया है कि नेतृत्व को आगे का रास्ता ही नहीं सूझ रहा। पिछले एक साल में यह पांचवां मौका है, जब कांग्रेस के भीतर से बगावत के स्वर फूटे हैं। लेकिन इस बार खास बात यह है कि बगावत का झंडा युवा नेताओं ने बुलंद किया है। ये नेता चाहते हैं कि कांग्रेस में उन्हें पहचान मिले, आक्रामक राजनीति का जवाब दोगुनी आक्रामकता से दिया जाये, लेकिन आलाकमान का मौन और बुजुर्ग नेताओं के पस्त हो चुके हौसले उनका रास्ता रोक दे रहे हैं। ऐसे में अब यह चर्चा होने लगी है कि यदि कांग्रेस ने खुद को नहीं बदला, तो फिर उसे भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक होने से कोई नहीं बचा सकेगा। एक समय भारतीय राजनीति का पर्याय कही जानेवाली कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति और उसके कारणों का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस एक बार फिर दोराहे पर खड़ी है। यहां से उसके लिए दो रास्ते निकलते हैं। एक रास्ता वह है, जिस पर वह खुद में बदलाव कर दूर तक का सफर तय कर सकती है और दूसरा रास्ता उसे अप्रासंगिक होने की ओर ले जाता है। कांग्रेस के भीतर का युवा खेमा लगातार पहले रास्ते पर आगे बढ़ने की वकालत कर रहा है, जिसमें सबसे पहले पार्टी नेतृत्व को आक्रामक राजनीति के तौर-तरीकों से वाकिफ होकर नये लोगों को अवसर देने की अनिवार्य शर्त है। विडंबना यह है कि इस खेमे को पार्टी के भीतर ही बागी और असंतुष्ट करार दिया जा रहा है, जिसका परिणाम यह हुआ कि मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और फिर यूपी में जितिन प्रसाद ने पाला बदल कर अपने सुरक्षित राजनीतिक कैरियर का रास्ता चुना। अब राजस्थान के सचिन पायलट और महाराष्ट्र के मिलिंद देवड़ा भी उसी रास्ते पर हैं।
एक के बाद एक चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन का सिलसिला लगातार जारी है। बंगाल में पहली बार विधानसभा में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है। मध्यप्रदेश, कर्नाटक, गोवा और मणिपुर में वह बहुमत हासिल करने के बावजूद सत्ता से बाहर है। राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार किसी तरह अपनी सांसें कायम रखने में सफल हो रही है। झारखंड में विधायकों का एक समूह संगठन को सशक्त बनाने और लगातार उपेक्षित होने की अपनी पीड़ा आलाकमान को बता चुका है। पार्टी के भीतर इस तरह के दमघोंटू वातावरण पर एक पुराने कांग्रेस नेता ने कहा कि अब पार्टी को अपने अतीत का मोह त्यागना होगा और उसे भविष्य पर ध्यान देना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो 2024 आते-आते कांग्रेस पूरी तरह मटियामेट हो जायेगी।
इस कांग्रेसी की टिप्पणी इस मायने में उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के पास अब आत्ममंथन का भी समय नहीं बचा है। आज देश की राजनीति जिस आक्रामक दौर में पहुंच गयी है, उसमें किसी को भी बहुत अधिक समय नहीं मिल सकता है। ‘परफॉर्म आॅर पेरिश’, यानी प्रदर्शन करो या मिट जाओ के कॉरपोरेट सिद्धांत ने राजनीति में भी गहरा प्रभाव छोड़ दिया है। इसलिए कांग्रेस के सामने अब अप्रासंगिक होने का खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में कांग्रेस को नया राजनीतिक मॉडल अपनाने के लिए तैयार होना जरूरी है। समय-समय पर पार्टी के भीतर भी आंतरिक चुनाव समुचित तरीके से कराने और हर किसी को चुनाव लड़ने की इजाजत दिये जाने की मांग उठती रही है, लेकिन अब तक कांग्रेस नेतृत्व इस दिशा में कोई सकारात्मक रुख अपनाता नहीं दिख रहा है। कभी देश की राजनीति पर निर्विवाद रूप से छायी रहनेवाली कांग्रेस के सामने चुनौती बहुत बड़ी है और यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इनसे कैसे पार पाती है। पार्टी के खिलाफ हो रहे चौतरफा हमले और नेतृत्व की चुप्पी भी पार्टी के लिए खतरनाक साबित हो रही है। अब कांग्रेसियों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए खुद ही आगे आना होगा और पार्टी को पार्टी की तरह चलाना होगा।
यह हकीकत है कि दिसंबर 2018 में तीन राज्यों की सत्ता में वापस आयी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद से ही लगातार भारतीय राजनीति के हाशिये पर जाती दिख रही है। हालांकि महाराष्ट्र और झारखंड की सत्ता में गठबंधन के सहारे उसकी वापसी ने इस पतन को रोकने की कोशिश की, लेकिन मध्यप्रदेश की सत्ता गंवाने और राजस्थान में पैदा हुए सियासी संकट से पार्टी के भीतर का खोखलापन एक बार फिर सामने आ गया। बिहार और बंगाल के चुनाव ने तो उसके ताबूत में अंतिम कील ही ठोक दी है।
दरअसल कांग्रेस की यह स्थिति कमोबेश उस संस्कृति के कारण हुई है, जिसे कपिल सिब्बल ‘मनोनयन संस्कृति’ बता चुके हैं। कांग्रेस में आज भी गांधी-नेहरू परिवार ही अंतिम है। वहां का आदेश पार्टी का कायदा है और वहां से मनोनीत नेता ही पार्टी चलाते हैं। कांग्रेस को अब यह संस्कृति नुकसान पहुंचाने लगी है। कांग्रेस के विरोधी भी मानते हैं कि कांग्रेस के पास वह सब कुछ है, जो एक मजबूत संगठन में होना चाहिए। कमी केवल नेतृत्व की है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि जो पार्टी अपने पुरखों के सम्मान की रक्षा करने में असमर्थ हो, उससे भविष्य की उम्मीद करना बेकार है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस को हो क्या गया है। वह सन्निपात की स्थिति में क्यों है। क्या पार्टी ने खुद को समाप्त करने का फैसला कर लिया है। इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस पहले कभी संकटों में नहीं फंसी। पार्टी इन संकटों से उबर कर देश के राजनीतिक पटल पर मजबूत नेतृत्व देने को तैयार हुई। आजादी के बाद वैसे तो कांग्रेस में कई संकट आये, लेकिन पार्टी हमेशा उनसे उबरती रही। लेकिन इस बार का संकट सबसे ज्यादा गंभीर है, हालांकि इतिहास बताता है कि पार्टी हर बार मजबूती के साथ उभरी है।
कांग्रेस के साथ एक खास बात यह रही है कि आजादी के बाद से इसकी कमान हमेशा गांधी परिवार के हाथों में रही है। के कामराज और सीताराम केसरी जरूर इसके अपवाद हैं। पार्टी की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी से पहले राहुल गांधी अध्यक्ष थे, लेकिन 2019 के चुनावों में करारी शिकस्त की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने पद छोड़ दिया था। आजादी के बाद के इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि पार्टी में स्थिरता सिर्फ गांधी परिवार के ही नेतृत्व में रही। जब भी गांधी परिवार से बाहर का व्यक्ति पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंचा, किसी न किसी वजह से वह लंबे समय तक सभी को साथ लेकर चलने में विफल रहा। इस वजह से विरोधियों को यह कहने का मौका मिल जाता है कि कांग्रेस गांधी परिवार के प्रभाव से कभी बाहर नहीं आ सकती है। लेकिन अब समय आ गया है कि कांग्रेस अब बुजुर्गों के चंगुल से बाहर निकले और युवा ब्रिगेड को कमान सौंपे। यही एकमात्र रास्ता बचा है, जिससे पार्टी खुद को राजनीति में बनाये रख सकती है।