समर्थकों को चाहिए नयी और ऊर्जावान कांग्रेस
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, जिसके साथ उसका 137 साल का इतिहास खड़ा है, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर क्यों है! कभी देश के एक सौ प्रतिशत भू-भाग पर राज करनेवाली कांग्रेस आज महज सात प्रतिशत भू-भाग पर क्यों सिमट कर रह गयी है! देश के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करनेवाली सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के खत्म होने की भविष्यवाणी राजनीतिक पंडितों द्वारा क्यों की जा रही है! क्यों कहा जाता है कि संघर्ष, त्याग और बलिदान की तर्ज पर बनी कांग्रेस आज अपने आदर्शों और संकल्प को भूल गयी है।
आजादी से पहले स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय राजनीति की धुरी रही कांग्रेस आज धीरे-धीरे भारतीय राजनीति की तस्वीर से ओझल क्यों हो रही है! एक वक्त था, जब इस ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ को केंद्र की सत्ता में पूरे 25 सालों तक सीधी टक्कर देनेवाला भी कोई नहीं था, आज वह अपने अस्तित्व की लड़ाई क्यों लड़ रही है!
आजादी के बाद से देश में सबसे लंबे समय तक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस के मौजूदा राजनीतिक हालात और कांग्रेस से जुड़े कुछ कड़वे पहलुओं पर नजर डालती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।
कभी देश के एक सौ प्रतिशत भू-भाग पर राज करनेवाली कांग्रेस आज राजनीति के हाशिये पर खड़ी है और अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्ष कर रही है। 25 सालों तक देश पर एकछत्र राज करनेवाली पार्टी के मौजूदा राजनीतिक हालात पर नजर डालें तो कई सवाल मुंह बाये खड़े मिलते हैं।
ये सवाल कुछ इस तरह के हैं-
* क्या भविष्य में कांग्रेस सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जायेगी या वह फिर से पुनर्जीवित होगी?
* क्या सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के खात्मे का गवाह बनेंगे?
* या फिर अपने पूर्वजों के खून-पसीने और बलिदान से खड़ी की गयी पार्टी को फिर से सत्ता के शीर्ष पर पहुंचायेंगे?
अपने उद्देश्यों से भटक गयी है कांग्रेस
इस तरह के कई सवाल देश के लोगों के दिल-दिमाग में कौतूहल पैदा कर रहे हैं और कांग्रेस पार्टी के भीतर और बाहर राजनीतिक हलकों में भी इस पर जोरदार बहस हो रही है। अगर कांग्रेस को अपना अस्तित्व बचाना है और पार्टी को पुनर्जीवित करना है, तो उसे कड़े कदम उठाने होंगे, लेकिन उससे पहले कांग्रेस को उन बीमारियों को दूर करना होगा, जिसने उसकी जीवंतता और ताकत को क्षीण किया है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के इतिहास के बिना अधूरा है। आजादी के बाद देश के बंटवारे के दर्दनाक दौर को झेल कर भी पार्टी ने सरकार को महत्वपूर्ण निरंतरता प्रदान की और देश की एकता और अखंडता को कायम रखा। लेकिन 80 के दशक के दौरान कांग्रेस समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के अपने उद्देश्यों से भटकने लगी।
आज से ठीक 137 साल पहले कुछ खास मकसद के लिए कांग्रेस पार्टी की स्थापना की गयी थी, लेकिन आज यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि कांग्रेस अब सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार के आसपास सिमट कर रह गयी है। परिवार की धुरी पर चल रही कांग्रेस पार्टी की हालत दिन पर दिन बदतर होती जा रही चलता रहता है।
धीरे-धीरे कांग्रेस पर गांधी परिवार का दबदबा
कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों से लेकर अब तक 60 लोग संभाल चुके हैं।
वर्तमान में कांग्रेस पार्टी कामचलाऊ अध्यक्ष के सहारे सांस ले रही है। मैडम सोनिया गांधी को कांग्रेस की अतंरिम अध्यक्ष के तौर जिम्मेदारी तो मिली हुई है, लेकिन तबीयत खराब होने के चलते वह घर से बाहर नहीं निकल पातीं। सभा-जुलूस में नहीं जा पातीं। इसका दुष्परिणाम भी सामने आ रहा है। नेतृत्व को लेकर कांग्रेस में गृह युद्ध की स्थिति बनी हुई है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पार्टी के 60वें अध्यक्ष चुने गये थे, लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी को मिली करारी हार के बाद राहुल ने खुद अध्यक्ष पद छोड़ कर किनारा कर लिया। उन्हें मनाने की
बहुत कोशिश हुई, लेकिन उन्होंने कमान नहीं ली।
आपको जान कर हैरानी होगी कि आजादी के बाद पार्टी के 19 अन्य अध्यक्षों में से 14 गांधी या नेहरू परिवार से नहीं थे। यानी सिर्फ पांच अध्यक्ष ही गांधी परिवार के थे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब बात तो यह है कि आजादी के बाद पार्टी अध्यक्ष पद पर सबसे लंबे वक्त तक सोनिया गांधी बनी रहीं, इन्होंने बतौर अध्यक्ष 19 वर्षों तक कांग्रेस की बागडोर अपने हाथों में रखी। इतना ही नहीं, सोनिया गांधी इस वक्त भी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हैं। उनकी सास इंदिरा गांधी अलग-अलग कार्यकाल में सात वर्ष तक पार्टी अध्यक्ष रही थीं। जानकारी के अनुसार सोनिया गांधी ने साल 1997 में कांग्रेस की सदस्यता ली थी और अगले ही साल यानि 1998 में उन्हें पार्टी की कमान मिल गयी थी।
इससे साफ जाहिर होता है कि आजादी के बाद भले ही कांग्रेस के 19 अध्यक्षों में से सिर्फ पांच अध्यक्ष ही गांधी परिवार के थे, लेकिन उनके कार्यकाल से यह साफ है कि कांग्रेस की बागडोर धीरे-धीरे एक ही परिवार के हाथों में रह गयी।
पॉलिटिकल मतलबियों का सबसे बड़ा ठिकाना बन चुकी है कांग्रेस
बदलते समय के साथ कांग्रेस पार्टी एक खास परिवार के नाम से ही पहचानी जाने लगी। आज कांग्रेस पार्टी का मतलब सोनिया, राहुल, प्रियंका के नाम से है। कांग्रेस में इनकी मर्जी के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। पहले के नेता अपनी पार्टी द्वारा बनाये गये सिद्धातों और आदर्शों पर चलते थे, लेकिन आज राजनीति पर सियासत, स्वार्थ और खुदगर्जी हावी होती जा रही है। ये ऐसी बीमारियां हैं, जो किसी भी पार्टी को अर्श से फर्श पर पहुंचा सकती हैं। आज के समय में कांग्रेस इसका जीता-जागता उदाहरण है। कांग्रेस पार्टी में छिड़ी राजनीतिक कलह इस बात का एक बड़ा सबूत है कि कांग्रेस पॉलिटिकल मतलबियों का सबसे बड़ा ठिकाना बन चुकी है।
अपनी गलती को कभी नहीं स्वीकारा
अच्छा शासक वही होता है, जो अपने द्वारा लिये गये निर्णय की समीक्षा करता है। यदि उसके द्वारा लिये गये निर्णय में थोड़ी सी भी कमी हो, तो उसे सहज स्वीकार कर उसे ठीक करता है। कांग्रेस के भी कार्यकाल में कई गलत निर्णय हुए, कई गलतियां हुईं, लेकिन कांग्रेस ने इसे कभी नहीं स्वीकारा और समय दर समय यही गलती कांग्रेस के लिए मुसीबत बनती गयी। आज हम उन 10 प्रमुख गलतियों को सामने ला रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस पार्टी ने कभी स्वीकार नहीं किया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी भी सख्त नहीं हुई
कांग्रेस के शासन काल में देश में कई भ्रष्टाचार हुए और देश के संसाधनों की जम कर लूट हुई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के कार्यकाल तक कई भ्रष्टाचार उजागर भी हुए। लेकिन कांग्रेस ने ये कभी नहीं स्वीकारा, ना कभी इन भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। नतीजा हुआ कि भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ता ही चला गया और देश के संसाधनों की जम कर लूट हुई।
देखिए फेहरिश्त
1948 जीप घोटाला जवाहर लाल नेहरू
1951 मूंदड़ा स्कैम जवाहर लाल नेहरू
1971 नागरवाला स्कैंडल इंदिरा गांधी
1973 मारुति घोटाला इंदिरा गांधी
1989 बोफोर्स घोटाला राजीव गांधी
1991 यूरिया घोटाला पीवी नरसिम्हा राव
2004-2009 कोयला घोटाला मनमोहन सिंह
2008 सत्यम घोटाला मनमोहन सिंह
2010 कॉमनवेल्थ घोटाला मनमोहन सिंह
2011 नेशनल हेराल्ड केस मनमोहन सिंह
2010 अनाज घोटाला मनमोहन सिंह
2012 वाड्रा डीएलएफ घोटाला मनमोहन सिंह
2012 टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला मनमोहन सिंह
2013 आॅगस्टा वेस्टलैंड घोटाला मनमोहन सिंह
तुष्टीकरण के लिए संविधान बदला गया
वर्ष 1987 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा शाहबानो के फेवर में अपना फैसला देते हुए पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया, लेकिन मुस्लिमों ने पर्सलन लॉ में दखल किया और विरोध किया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए पर्सलन लॉ में कोर्ट के दखल को न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि संसद से एक कानून भी पास करा लिया।
आपातकाल लगा कर लोकतंत्र को कलंकित किया
25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर पूरे देश को एक बड़े जेल खाने में बदल दिया था। इस दौरान लोगों के मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया था, यहां तक कि जीने का अधिकार भी छीन लिये थे। लोगों को जबरदस्ती जेलों में बंद किया जा रहा था। इंदिरा गांधी सरकार ने जयप्रकाश नारायण सहित लगभग एक लाख राजनीतिक विरोधियों को देश के अलग-अलग जेलों में ठूंस दिया था। मीडिया और अखबारों की भी आजादी छीन ली गयी थी। कांग्रेस ने कभी भी आपातकाल को गलत नहीं ठहराया।
कश्मीर समस्या का हल नहीं निकाल पायी कांग्रेस
भारत के विभाजन के समय कश्मीर समस्या का हल निकाल पाने में जवाहरलाल नेहरू की असफलता की देश ने भारी कीमत चुकायी। कश्मीर को अनुच्छेद 370 के जाल में फंसा कर छोड़ दिया गया था। 1971 में भी भारत ने कश्मीर मुद्दे को हल करने का मौका गंवा दिया था। 1990 में हिंदुओं के नरसंहार के बाद कांग्रेस की चुप्पी ने तो कट्टरपंथियों के हौसले को नये उत्साह से भर दिया था। इसका दंश कश्मीरी पंडितों को झेलना पड़ा और लाखों की तादाद में उन्हें विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर भी कांग्रेस ने चुप्पी साधे रखी।
वोट बैंक के लिए बांग्लादेशियों को बसाया
असम, पश्चिम बंगाल समेत देश के पूर्वोत्तर इलाके में बांग्लादेशियों की आबादी बढ़ती गयी। कांग्रेस के शासनकाल में बांग्लादेशियों को असम समेत पूर्वोत्तर में नागरिकता दी गयी, वोटर कार्ड दिये गये, राशन कार्ड भी दिये गये। ऐसे जनसांख्यिकीय असंतुलन से देश की एकता अखंडता को खतरा उत्पन्न होने लगा, लेकिन कांग्रेस इसे नजरअंदाज करती रही।
लाल बहादुर शास्त्री की मौत रहस्य बन कर रह गयी
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के रहस्य से अब तक पर्दा नहीं उठा है। उनकी पुत्रवधू नीरा शास्त्री ने इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नीरा का आरोप है कि उनके ससुर की हत्या हुई थी और कांग्रेस ने ये बात छिपायी। मौत की स्थितियों पर कांग्रेस ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया। दूध में जहर दिये जाने की बात को सामने नहीं लाया गया। शव का भारत में पोस्टमार्टम नहीं कराने, नीले शरीर को चंदन से लपेट कर जनता से छिपाने, शरीर पर दो कट के निशान के बारे में नहीं बताने जैसे सवाल अब भी कांग्रेस के सामने हैं, लेकिन कांग्रेस ने इस पर कोई सफाई नहीं दी।
देश को तोड़ने की साजिश पर चुप रही कांग्रेस
कश्मीर को धारा 370 के जरिये देश की मुख्यधारा से जुड़ने नहीं देने का आरोप भी कांग्रेस पार्टी पर है। वहीं दक्षिण में द्रविड़नाडु जैसे आंदोलन, जो देश को उत्तर और दक्षिण भारत को अलग करने की मंशा से चलाये गये थे, इस पर भी कांग्रेस ने चुप्पी साध ली थी। वहीं कर्नाटक में अलग झंडे को कांग्रेस ने मंजूरी देकर देश में अलगाववाद की नयी आवाज को हौसला दे दिया।
शब्दों का चयन और मुद्दों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण
कांग्रेस नेतृत्व द्वारा अतीत में अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए सूट-बूट की सरकार, चौकीदार चोर है, मौत का सौदागर, शहीदों के खून की दलाली, खेती का खून, दिल में खंजर जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जो उनकी छवि और विरासत के साथ मेल नहीं खाता। ड्रामेबाजी, खोखली ऊंची आवाज या अत्यधिक सजावटी शब्दों का मायाजाल लोगों के मुद्दे को पीछे छोड़ देता है। वहीं असल मुद्दे, शांत और सभ्य भाषा अधिक प्रभावी ढंग से लोगों का दिल जीत सकते हैं।
पिछले दो बार हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ज्यादातर व्यक्तिगत टिपप्णी ही करती नजर आयी। कांग्रेस के बोेल से मुद्दा गायब था और सजावटी और तल्ख टिप्पणी अधिक थी। जो कहीं ना कहीं कांग्रेस को अंदर से कमजोर करती गयी और अपने प्रतिद्वंद्वी को मजबूत करती गयी। कांग्रेस व्यक्तिगत टिप्पणी करने में इतनी रम गयी कि वह देश की मौजूदा स्थिति और जनता के मुद्दों से भटक गयी और अपने पर्सनल मुद्दों को ही देश का मुद्दा समझ बैठी। इसी सोच के साथ कांग्रेस अति उत्साहित होकर जनता के बीच गयी, जिसका खमियाजा 2014 और 2019 के विधानसभा चुनाव में उसे झेलना पड़ा।
आत्ममंथन करने की है जरूरत
देश की सबसे पुरानी पार्टी और स्वतंत्रता संग्राम की धुरी रही कांग्रेस का इतिहास बताता है कि इस पार्टी में कितनी संभावनाएं हैं। लेकिन आज कुछ गलतियों की वजह से वह अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रही है। अगर अपने अस्तित्व को बरकरार रखना है तो कांग्रेस को आत्ममंथन करना होगा और यह किसी एक कमरे में बैठ कर नहीं हो सकता। समय है देश की जनता से रूबरू होकर अपनी खामियों को स्वीकार कर आगे बढ़ने का। समय है अपनी खोई हुई जमीन, आदर्श और संकल्प को आत्मसात करने का। समय है, कुसंस्कारों को त्याग कर सुसंस्कृति को अपनाने का। कर्कश स्वर में गाली देने से त्वरित प्रसिद्धि तो मिल सकती है, लेकिन इसका दूरगामी परिणाम खतरनाक होता है। यह देश बड़बोलेपन को स्वीकार नहीं करता। लोकतंत्र में भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है। और कांग्रेस है कि जन भावनाओं को पहचान ही नहीं पा रही। देश की जनता दुश्मनों को सबक सिखाना चाहती है और कांग्रेस है कि अपने जवानों से ही सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगती है। देश पुलवामा में शहीद हुए जवानों के गम में आंसू बहा रहा होता है, तो कांग्रेस इसे पा्रयोजित बताती है। देश को दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए राफेल पसंद है, लेकिन कांग्रेस को इसकी खरीद में घोटाला नजर आता है। राजनीति का माहिर खिलाड़ी वही है, जो समय को पहचाने, मंशा को भांपे और सही समय पर सटीक चाल चले। कांग्रेस में नीचे से लेकर ऊपर तक बदलाव की जरूरत है। युवा हिंदुस्तान में बूढ़ों के सहारे जंग जीतने का ख्वाब भी नहीं देख सकते।