पिछले छह दिनों से देश के विभिन्न हिस्सों में केंद्र सरकार द्वारा घोषित अग्निपथ स्कीम का हिंसात्मक विरोध हो रहा है। रेलवे और दूसरी सरकारी संपत्तियों को फूंका जा रहा है। पुलिस थानों, रेलवे कार्यालयों और भाजपा नेताओं पर हमला किया जा रहा है। पथराव हो रहे हैं, गाड़ियों में आग लगायी जा रही है। इस हिंसात्मक विरोध प्रदर्शन के कारण आम लोग जहां परेशान हो रहे हैं, वहीं युवाओं का बड़ा हिस्सा भी भविष्य को लेकर चिंताग्रस्त हो रहा है। दो साल तक कोरोना के कारण भर्तियां बंद होने से पहले से परेशान बेरोजगारों को समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें, कहां जायें। दूसरी तरफ विरोध प्रदर्शन करनेवालों को यह एहसास तक नहीं हो रहा है कि वे अपने भविष्य को अनिश्चितता और बेरोजगारी की उस अंधेरी खाई में धकेल रहे हैं, जहां से बाहर निकलना लगभग असंभव हो जायेगा। ये लोग उन तत्वों की सोची-समझी साजिश का शिकार बन रहे हैं, जो लगातार शक्तिशाली होते भारत को कमजोर करना चाहते हैं, देश की सुरक्षा को खतरे में डालना चाहते हैं। इतना ही नहीं, अपने स्वार्थ और सरकारी नीतियों-योजनाओं के अंधविरोध में वे यह भी भूल गये हैं कि हिंसा और आगजनी से किसी का भला नहीं हो सकता। रेलवे ने तो एक्शन शुरू कर भी दिया है। सेना ने भी अपने भर्ती नियमों में साफ कर दिया है कि तोड़फोड़ और आंदोलन में शामिल होनेवाले सेना की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के योग्य नहीं होंगे। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इन आंदोलनों से किसका हित सधा है। क्या किसी सरकारी योजना का हिंसात्मक विरोध ही एकमात्र उपाय रह गया है। अग्निपथ स्कीम के हिंसात्मक विरोध के तमाम पहलुओं को कुरेदती, इसके असर पर प्रकाश डालती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।
अग्निपथ योजना के विरोध में हिंसक प्रदर्शनों के बीच सोमवार को भारत बंद का आह्वान किया गया था। हालांकि जनता ने बंद के औचित्य पर सवाल उठाते हुए इसे पूरी तरह से नकार दिया। जाहिर है यह बंद युवाओं के हित में नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के इरादे से कुछ दलों और संगठनों ने किया था। दूसरी तरफ रविवार को ही तीनों सेनाओं की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कह दिया गया था कि सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना में संशोधन हो सकता है, लेकिन इसे किसी भी हाल में वापस नहीं लिया जायेगा। वैसे, चार दिन के उग्र प्रदर्शन के बाद रविवार को बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा और तेलंगाना समेत उन सभी 10 राज्यों में शांति रही, जहां युवाओं ने हिंसात्मक प्रदर्शन किये थे। आंदोलन के शांत पड़ने का साफ संकेत है कि युवाओं को अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा है। उन्हें इस बात का एहसास हो चुका है कि उपद्रव और हिंसा से भारतीय रेलवे को हजारों करोड़ का नुकसान हो चुका है। सिर्फ बिहार में ही रेलवे की 700 करोड़ की संपत्ति स्वाहा हो चुकी है। युवाओं को यह संदेश भी मिल चुका है कि कैसे बिहार और उत्तरप्रदेश में कोचिंग संस्थानों ने देश को अस्थिर करने के लिए युवाओं का इस्तेमाल किया। अभी तक बिहार में छह कोचिंग संस्थान चिह्नित हो चुके हैं। फर्जी खबरें फैलानेवाले 35 व्हाट्सऐप ग्रुप पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। अब तक हिंसा फैलानेवालों के खिलाफ की गयी कार्रवाई से भी छात्रों को यह समझ आ रहा है कि उनसे कहीं न कहीं गलती हुई है और यह गलती भविष्य में उन्हें भारी पड़ेगी।
भारतीय सेना की अग्निपथ योजना को लेकर जिस तरह से देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए, आगजनी, हिंसा हुई, ट्रेनें जलायी गयीं, बसें जलायी गयीं, निजी गाड़ियां जलायी गयीं, पुलिस वालों पर और थानों पर हमला किया गया, उससे हलकान तो आम आदमी ही हो रहा है। हंगामा के मद्देनजर रेलवे ने लगभग पांच सौ टेÑनों को रद्द कर दिया, कई जगहों पर बसों का परिचालन रोक दिया गया, इससे परेशान तो आम जनता ही हो रही है। जिनको कहीं आना-जाना है, उनकी सारी यात्रा, सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है और देश की संपत्ति का इतना बड़ा नुकसान हो रहा है। यह कौन कर रहा है। यह सब वे लोग कर रहे हैं, जो दावा कर रहे हैं कि वे भारतीय फौज में जाना चाहते हैं, देश की रक्षा करना चाहते हैं। जो देश की रक्षा करना चाहते हैं, वे देश में आग नहीं लगाते, आग बुझाने का काम करते हैं। तो जो आग लगाये, वह राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता। जो देश की संपत्ति में आग लगाता है, वह फौजी नहीं हो सकता है, एक उपद्रवी या उत्पाती ही होगा। आपकी कितनी भी बड़ी शिकायत हो, आपकी शिकायत कितनी भी जेनुइन हो, आपकी शिकायत कितनी भी वाजिब हो, आपकी परेशानी कितनी भी सही हो, लेकिन आपको राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं मिलता। लोगों का जीवन खतरे में डालने का अधिकार नहीं मिलता, लेकिन अभी पूरे देश में यह हो रहा है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, उनसे यह सब करवा कौन रहा है। सवाल इसका है। जिन लोगों ने इनको इस स्थिति में पहुंचाया है, वे यह भूल गये हैं कि वे अपना भला कर रहे हैं या बुरा कर रहे हैं। अगर वे किसी सरकारी नौकरी के इच्छुक हैं, यहां तक कि निजी नौकरी के इच्छुक हैं, तो इस विरोध प्रदर्शन के बाद वे इसके अयोग्य हो जायेंगे। वे जो यह दंगा-फसाद, आगजनी कर रहे हैं, इसके बाद पुलिस उनके खिलाफ एफआइआर करेगी और उसके बाद उनको कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। इसलिए ऐसे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि जिस नौकरी के लिए आप यह तांडव कर रहे हैं, उस नौकरी के मिलने का रास्ता वे खुद ही बंद कर रहे हैं। यह तो बात बड़ी स्पष्ट हो जाती है कि ये वे लोग नहीं हैं, जिनको यह नौकरी चाहिए। ये वे लोग नहीं हैं, जो भारतीय सेना में जाकर देश की रक्षा के लिए जान कुर्बान करने को तैयार हैं। ये वे लोग नहीं हैं, जो अपने देश से प्रेम करते हैं। ये वे लोग नहीं हैं, जो अपने देश को आगे ले जाना चाहते हैं। यह देश को पीछे ले जानेवाले लोग हैं। उनका इस्तेमाल हो रहा है या वे ऐसा खुद कर रहे हैं, यह जांच का विषय है। हालांकि पहली नजर में तो लगता है कि उनका इस्तेमाल हो रहा है। और एक बात शीशे की तरह साफ है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह इस बात की कोशिश, इस बात का संकेत, इस बात का प्रमाण भी है कि इस देश में जो भी अच्छा करने की कोशिश होगी, उसका विरोध होगा। जो भी सुधार का कार्यक्रम शुरू किया जायेगा, उसका विरोध होगा। जो भी लोगों के व्यापक हित के लिए काम शुरू होगा, उसका विरोध करना है।
तो ये कौन ताकतें हैं। ये देश का हित चाहनेवाली ताकतें तो नहीं हो सकती हैं। इनको कहां से समर्थन मिल रहा है। इनके पीछे कौन खड़ा है। इनके पीछे का जो हाथ है, उसकी पहचान जरूरी है और उस हाथ को निष्क्रिय करना जरूरी है, क्योंकि बात यह नहीं है कि रक्षा मंत्रालय ने यह योजना घोषित की और उसके बाद उसका विरोध शुरू हो गया। जिस तरह से घोषणा होते ही विरोध हुआ, ऐसा लगा कि जैसे विरोध करने के लिए लोग तैयार बैठे थे कि घोषणा हो और विरोध शुरू कर देना है। इसलिए ऐसा लगता है कि यह विरोध स्वाभाविक और स्वत:स्फूर्त नहीं है। यह आयोजित विरोध लगता है। इसके पीछे कोई गहरी साजिश लगती है। अब तो यह साजिश भी सामने आने लगी है। इस विरोध के पीछे साजिश की बू सूंघने का खास कारण भी है। पहले उन कारणों पर एक नजर डालते हैं। आजादी के बाद से अब तक भारत जैसे विशाल देश में कभी बेरोजगारी के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ था। बेरोजगारों ने इक्का-दुक्का ढंग से सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन जरूर किया, लेकिन आज की तरह का संगठित विरोध प्रदर्शन कभी नहीं हुआ था। इस देश ने कई आंदोलन देखे हैं। जेपी का जो आंदोलन हुआ था, वह भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ था। उसके अलावा अयोध्या के लिए आंदोलन हुआ। अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ। वह भी भ्रष्टाचार के खिलाफ था। वीपी सिंह का आंदोलन भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ। मंडल आंदोलन हुआ, जो आरक्षण के लिए था। किसान आंदोलन हुआ, जो कृषि बिल की वापसी के लिए था। ये तमाम आंदोलन आम तौर पर शांतिपूर्ण तरीके से, संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में रह कर हुए। लेकिन सीएए और नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलन में क्या हुआ, हिंसा हुई, आगजनी हुई। लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारे देश में संविधान लागू है। इस संविधान ने आपको बड़ी ताकत दी है। विरोध प्रदर्शन करने का, अपनी बात को मनवाने का, अपनी बात के समर्थन में खड़े होने का, इन सबका अधिकार दिया है। लेकिन संविधान ने आपको ट्रेनें जलाने का अधिकार नहीं दिया है। लोगों की जिंदगी खतरे में डालने का अधिकार नहीं दिया है। इन विरोध प्रदर्शनों से दुनिया भर में क्या संदेश जा रहा है। भारत और यहां के युवाओं के बारे में। यही ना कि ये लोग अराजक होते हैं, किसी कानून या संविधान को नहीं मानते।
अभी केंद्र सरकार ने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद घोषणा की है कि अगले डेढ़ साल में सरकारी विभागों में 10 लाख नौकरियां दी जायेंगी और तीन महीने में इसकी परीक्षा होगी। उसके बाद प्रोसेसिंग होगी और उसके बाद नौकरी देने का सिलसिला शुरू हो जायेगा। इस घोषणा के बाद राज्य सरकारों ने घोषणा की कि उनके यहां भी भर्तियां होने वाली हैं। कई विभागों में भर्ती होने वाली है। सरकार बेरोजगारी की समस्या के समाधान की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में इस तरह के आंदोलन इन तमाम कोशिशों पर फुलस्टॉप ही लगायेंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि बेरोजगारी के विरोध में हिंसक आंदोलन या प्रदर्शन नहीं हो सकता है। यह रोजगार के लिए नहीं हो सकता है, बल्कि यह रोजगार के रास्ते रोकने के लिए, उसे बंद करने के लिए हो सकता है।
अब इस सवाल पर भी विचार करना होगा कि यह सब अभी क्यों हो रहा है। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आ रहा है कि भारत महाशक्ति बने। इसलिए नागरिकता कानून का विरोध हुआ। सबने माना कि जो तीन कृषि कानून थे, वे किसानों के हित में और देश के हित में थे। फिर भी परिस्थिति ऐसी बनायी गयी कि सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। उस आंदोलन के दौरान लाल किले पर जो कुछ हुआ, 26 जनवरी को जो कुछ हुआ, वह हिंसा का तांडव नहीं तो और क्या कहलायेगा। उसके बाद नियोजित ढंग से हिंदुओं के त्योहारों पर निकलने वाले जुलूसों पर हमला किया गया। यह हमला बेवजह हुआ। लोग यह समझने को तैयार नहीं हैं कि कोई समुदाय यदि अपना त्योहार मना रहा है, जुलूस निकाल रहा है, तो आपको क्या समस्या है। उसके बाद कर्नाटक से शुरू हुआ हिजाब को लेकर एक अनावश्यक विवाद खड़ा किया गया। एक पहनावे को लेकर उसको धर्म से जोड़ दिया गया और धर्म के अस्तित्व का मुद्दा बनाकर उस पर आंदोलन हुआ। उसके बाद नूपुर शर्मा के बयान के बाद पत्थरबाजी, आगजनी, सब कुछ हुआ। जुमे की नमाज के बाद मस्जिदों से निकले, तो हाथों में पत्थर, पेट्रोल बम थे। यह सब अचानक तो नहीं ही हुआ। जाहिर है, इसकी तैयारी लंबे समय से की जा रही थी। इसके लिए पैसा बाहर से आ रहा था। इसमें पीएफआइ और उसके जैसे दूसरे संगठन में शामिल हैं। छोटे बच्चों को बिरयानी के लालच में और अग्निपथ को लेकर विरोध के लिए उकसाया जा रहा है। जो योजना किसी के नुकसान की नहीं है, जो योजना ज्यादा लोगों के फायदे की है, युवाओं के लिए फायदे की है, जिनको आमतौर पर कोई रोजगार मिलने की संभावना नहीं है, वही लोग इस हिंसा में शामिल होते हैं।
सेना की भर्ती को इस तरह से राजनीतिक मुद्दा बनाने वाले राजनीतिक दल देश का भला कर रहे हैं या नुकसान कर रहे हैं, यह सोचनेवाली बात है। ये वही लोग हैं, जो नहीं चाहते कि भारत विकास के रास्ते पर आगे बढ़े। भारत का कद दुनिया में और ज्यादा बढ़े। जिन्हें भारत की प्रगति से समस्या है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि इससे देश का नुकसान हो रहा है या फायदा। उन्हें देश के नुकसान की कोई चिंता नहीं है। इनके मन में एक ही सवाल होता है कि इससे मोदी का नुकसान हो रहा है या नहीं। इसके अलावा इस तरह की योजना से पेट में दर्द उन कोचिंग संस्थानों को भी हो रहा है, जिनको लग रहा है कि उनकी कमाई कम होनेवाली है। पिछले दिनों कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने तो खुलेआम कह दिया था कि भाजपा ने पूरे देश में केरोसिन छिड़क दिया है। बस एक चिंगारी लगने की देर है। और अब चिंगारी लगानेवाले पकड़े जा रहे हैं, तो वे एनएसयूआइ के, युवा कांग्रेस के निकल रहे है। यह सब क्या है। यह सब भारत को पीछे ले जाने की साजिश है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना इस योजना का नाम लिये युवाओं को एक बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा है कि उनकी सरकार ने पिछले आठ सालों में स्पेस और डिफेंस सेक्टर को युवाओं के लिए खोल दिया है। रीफॉर्म का रास्ता ही हमें नये लक्ष्यों की ओर ले जा सकता है। हमने डिफेंस और स्पेस के सेक्टर को युवाओं के लिए खोल दिया है, जिनमें दशकों तक सरकार का एकाधिकार था। ड्रोन से लेकर हर दूसरी टेक्नोलॉजी में हम युवाओं को काम करने का मौका दे रहे हैं। आज हम युवाओं से कह रहे हैं कि सरकार ने जो वर्ल्ड क्लास टेक्नोलॉजी बनायी है, वहां युवा अपने आइडिया दें, अपने इनपुट दें।,
आर्ट आॅफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने अग्निपथ योजना के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के खिलाफ निराशा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि देश की रक्षा के लिए समर्पित और त्याग के मनोभाव से निकले हुए युवाओं के लिए यह एक सुअवसर है। बहकावे में न आयें, इसे ठीक ठीक समझें और मिलने वाली सुविधाओं और प्रक्षिशण से स्व तथा राष्ट्र का हित करें। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में, यहां तक की स्विट्जरलैंड और सिंगापुर जैसे छोटे देशो में भी, एक से दो वर्ष सेना में सर्विस देना अनिवार्य है। इनकी तुलना में भारत की नयी सैन्य सेवा योजना अति उत्तम है। उम्मीद की जानी चाहिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्री श्री रविशंकर के उदगार से युवाओं का दिमाग खुलेआ और वे देशहित में देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना छोड़ देंगे। ऐसे भी कोई उन्हें जोर जबरदस्ती नहीं कर रहा है कि आप सेना में भर्ती हो ही जाओ। अब तो सेना ने आठवीं पास युवाओं के लिए भी अपने द्वार खोल दिये हैं। युवा सोचें-विचारें, आठवीं पास के लिए ऐसे अवसर कहां मिलेंगे। अब तो बंद होना चाहिए हिंसक आंदोलन।