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    Home»Top Story»कोयला तस्करों के रैकेट को अब तक तोड़ नहीं पायी एनआइए
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    कोयला तस्करों के रैकेट को अब तक तोड़ नहीं पायी एनआइए

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskJuly 28, 2019No Comments6 Mins Read
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    केंद्र सरकार ने कोयला तस्करी के इस गठजोड़ और नक्सलियों को हो रही टेरर फंडिंग को भेदने की जवाबदेही भारत की स्वतंत्र जांच एजेंसी एनआइए को सौंपी है। दो साल से एजेंसी जांच कर रही है। दर्जनभर व्यवसायियों और नक्सलियों के यहां छापेमारी हुई। छह महत्वपूर्ण डायरी, कंप्यूटर और 25 से अधिक मोबाइल फोन जब्त किये गये। डायरी और कंप्यूटर में जो कुछ दर्ज है, वह इसकी पुष्टि करता है कि किस तरह से यह छौकड़ी चतरा की आम्रपाली, मगध और पिपरवार परियोजना में जोंक की तरह लिपट गयी है। कोयला परिवहन में अरबों रुपये की वसूली टीपीसी की दबंग कमेटी करती रही है। 254 रुपये प्रति टन लिया जाता है। इसका बंटवारा सीसीएल, टीपीसी, दबंग कमेटी के लोग, झारखंड पुलिस, रैयत, लोडर, पत्रकार, प्रदूषण विभाग और सुरक्षा गार्ड के बीच होता है। जांच एजेंसी पर विश्वास करें, तो इसमें शामिल छौकड़ी ने पिछले तीन साल में 10 अरब 97 करोड़ रुपये की वसूली की है। देखते ही देखते इस अवैध धंधे में शामिल लोग करोड़पति बनते चले गये। चाहे सीसीएल के अधिकारी हों, उस इलाके में पदस्थापित पुलिस अधिकारी हों या एसपी, सफेदपोश हों या नक्सली हर तबका इससे लाभान्वित हुआ। काली कमाई का आकर्षण इतना बढ़ा कि उग्रवाद ग्रस्त चतरा में पदस्थापन के लिए बोली लगने लगी।
    ऐसे हुई एनआइए जांच की शुरुआत
    बड़े उद्योगपति नवीन जिंदल उस इलाके से कोयला के कारोबार से जुड़ना चाहते थे। उनकी कंपनी के कुछ लोग टंडवा, पिपरवार इलाके में पहुंचे भी थे और सीसीएल के अधिकारियों से संपर्क किया था। उनकी कंपनी को कोयला परिवहन की इजाजत नहीं मिली। अधिकारियों को भय सता रहा था कि अगर कोयला परिवहन का ठेका जिंदल की कंपनी को मिल गया, तो उनकी अवैध वसूली बंद हो जायेगी। नवीन जिंदल ने टंडवा इलाके की तीन कोलियरियों में हो रहे अवैध कारोबार की जानकारी उस समय के गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिख कर दी थी, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि इस इलाके से नक्सलियों को टेरर फंडिंग की जाती है, तब इसकी जांच एनआइए को सौंपी गयी और पाया गया कि तीन साल में पांच अरब से ज्यादा की राशि लेवी के रूप में नक्सलियों को दी गयी है।
    ताबड़तोड़ हुई छापेमारी, सब बन गये सरकारी गवाह
    एनआइए ने जब जांच की शुरुआत की, तब चतरा से लेकर रांची तक हड़कंप मच गया। कई पुलिस अफसरों की तो नींद ही उड़ गयी। एनआइए को छापेमारी में जो डायरी हाथ लगी है, उसमें पुलिस अधिकारियों के भी नाम हैं। अभी तो जांच सिर्फ नक्सलियों के खिलाफ हो रही है। जिन अफसरों ने इसे पोसा, उन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, न ही पूछताछ। जिन काले कारोबारियों ने टेरर फंडिंग की, उन्हें एनआइए ने सरकारी गवाह बना लिया है। ट्रकों से काला कारोबार करनेवाले ट्रक एसोसिएशन के पदाधिकारी भी गवाह बन गये।
    इन पर चार्जशीट
    एनआइए ने बिंदू गंझू को गिरफ्तार किया। उसकी निशानदेही पर छोटू सिंह उर्फ गंझू को पकड़ा गया। एनआइए के अधिकारी जब उसको मोबाइल और घड़ी जमा करने को कह रहे थे, तब उसने हाथ में पहनी घड़ी की कीमत आठ लाख रुपये बतायी थी। वह टीपीसी के लिए कूरियर का काम करता था। अभी भी एनआइए को मुख्य आरोपी आक्रमण की तलाश है। एनआइए मुकेश गंझू, आक्रमण, गोपाल सिंह, करमपाल गंझू, कमलेश गंझू के खिलाफ चार्जशीट कर चुकी है। नौ जुलाई 2018 को कमलेश के यहां से 36 लाख रुपये बरामद किये गये थे।
    बिंदू गंझू के कहने पर हुई छापेमारी
    एनआइए ने डेढ़ साल पहले नक्सलियों की आतंकी फंडिंग केस मामले में झारखंड के रांची, जमशेदपुर, हजारीबाग और पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर सहित कुल 15 स्थानों पर छापेमारी की थी। इसमें एनआइए को कई आपत्तिजनक दस्तावेज मिले थे, जिससे नक्सलियों की उग्रवादी गतिविधियों के लिए की गयी फंडिंग की पुष्टि होती है। एनआइए द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक जांच एजेंसी की 15 टीमों ने जांच अभियान में हिस्सा लिया। झारखंड पुलिस के सहयोग से की गयी जांच में आम्रपाली और मगध कोल फील्ड से निकलने वाले कोयले की खरीद और परिवहन से जुड़ी कंपनियों के प्रबंधकों के यहां छापेमारी की गयी थी। इन पर नक्सली संगठन टीपीसी को फंड उपलब्ध कराने का आरोप है।
    जब्त दस्तावेजों की हो रही जांच
    जांच के दौरान एनआइए की टीम ने कई डाक्यूमेंट्स बरामद कीं, जिनसे आतंकी फंडिंग के आरोपों को बल मिला है। जांच एजेंसी ने फंडिंग से जुड़े दस्तावेज जब्त किये। बैंक एफडी, लेवी राशि की कटौती से जुड़े कागजात, कम्प्यूटर, हार्ड डिस्क, मोबाइल, डायरी आदि जब्त की गयी है। इन दस्तावेजों में टीपीसी और पीएलएफआइ (पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आॅफ इंडिया) को दिये गये पैसों की इंट्री दर्ज है।
    रियल इस्टेट में पैसा लगा रहे नक्सली
    एनआइए सूत्रों का कहना है कि नक्सलियों की फंडिंग के मामले में कई तरह की परतें खुल रही हैं। कंपनियों से जबरन वसूली के अलावा आपसी सांठगांठ के पुख्ता सबूत एजेंसियों को मिले हैं। जांच एजेंसी संबंधित लोगों से पूछताछ और मिले दस्तावेजों की गहन जांच के बाद मामले को आगे बढ़ा रही है। जांच एजेंसी की नजर नक्सलियों के अलग अलग धंधों में लिप्त होने पर भी है। कई नक्सली नेता अपना पैसा रियल एस्टेट के कारोबार में लगा रहे हैं।
    विदेशी मुद्रा भी जब्त
    एनआइए ने छापे के दौरान करीब 68 लाख रुपये की भारतीय मुद्रा के साथ ही 1300 यूएस डालर एवं 10 हजार सिंगापुर डॉलर के साथ 86 हजार रुपये जब्त किये थे। इसके साथ ही पुराने नोट भी जांच एजेंसी ने जब्त किये थे।
    बड़े व्यवसायी बन गये सरकारी गवाह
    एनआइए ने जांच के दौरान बड़े व्यवसायियों को सरकारी गवाह बना लिया। सरकारी गवाह बनने का मतलब अब उनके खिलाफ जो आरोप हैं, उन पर कार्रवाई बंद। जिन लोगों ने करोड़ों रुपये देकर नक्सलियों को पाला-पोसा अब उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। यही नहीं, जरूरत पड़ने पर उन्हें सरकारी सुरक्षा भी दी जायेगी।
    इन व्यवसासियों के यहां छापेमारी
    एनआइए ने नक्सली कमलेश गंझू, करमपाल गंझू, अमर सिंह भोक्ता, मुकेश गंझू, आक्रमण उर्फ नेता जी के अलावा कई व्यवसासियों के यहां भी छापेमारी की। इनमें ये शामिल हैं: –
    सोनू अग्रवाल: रांची के बांधगाड़ी स्थित बालाजी अपार्टमेंट स्थित उनका दफ्तर
    विष्णु अग्रवाल: ट्रांसपोर्टर (सोनू अग्रवाल का मैनेजर) संतोषी अपार्टमेंट बरियातू (रांची)
    आधुनिक इस्पात कंपनी: मेनरोड, चर्च कांप्लेक्स (रांची), कांड्रा (जमशेदपुर) स्थित कार्यालय
    सुदेश केडिया: ट्रांसपोर्टर, रातू रोड में कार्यालय (रांची)
    विनीत अग्रवाल: ट्रांसपोर्टर, लाइन टैंक रोड (रांची)
    विपिन मिश्रा: ट्रांसपोर्टर, दफ्तर, स्टेट स्क्वायर अपार्टमेंट, चेशायर होम रोड (रांची)
    रघुराम रेड्डी: बीजीआर कंपनी के जीएम, आवास पंडितजी रोड (हजारीबाग)
    कौन है रघुराम रेड्डी
    रघुराम रेड्डी एक बड़ा ट्रांसपोर्टर है। इनका हजारीबाग में किराये का मकान है। वह उस समय चर्चा में आये , जब उन्होंने यह बयान दे डाला था कि बगैर टीपीसी को लेवी या पैसा दिये चतरा में काम करना मुश्किल है। पुलिस सुरक्षा नहीं दे सकती। रघुराम रेड्डी की हैसियत दिन ब दिन बढ़ती जा रही है।

    छापेमारी के बाद भी नहीं रुका है काला कारोबार
    एनआइए की छापेमारी के बाद भी कोयले का कारोबार नहीं रूका है। न ही अवैध वसूली ही रूकी है। हां इतना जरूर हुआ है कि आम्रपाली इलाके में वसूली करनेवाली दबंग कमेटी को फिलहाल भंग कर दिया गया है। और वसूली के नये रास्ते इजाद कर लिये गये हैं।

    NIAs could not break the racket of coal smugglers so far
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