साइड इफेक्ट : जमा-पूंजी खत्म: नौकरी नहीं-कमाई बंद, नतीजा: आर्थिक महामारी से घिर रहे लोग
कोरोना महामारी की चर्चा चहुंओर है। एक जगह खास चर्चा चल रही थी। इसी चर्चा में लोग बता रहे थे कि कैसे देश और खासकर झारखंड के लोगों ने कोरोना की पहली लहर को मनोरंजन के रूप में मनाया। लॉकडाउन के दौरान तरह-तरह के व्यंजन बनाये। डांस से लेकर योग तक किया। जीने की कला सीखी। लेकिन दूसरी लहर ने लोगों को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। इसी चर्चा के बीच जाने-अनजाने एक व्यक्ति ने हकीकत बयां कर दी: कोरोना महामारी ने फैला दी, उधार की महामारी। अचानक उस व्यक्ति की बातों ने सबका ध्यान खींचा। सभी ने महसूसा कि दरअसल कोरोना ने उधार की महामारी खैरात में दे दी है। लोगों की जमा-पूंजी खत्म होती जा रही है। नौकरी और रोजगार नहीं है। यहां तक कि जिनके पास प्रोविडेंट फंड का पैसा था, उसे भविष्य के लिए रखने की चिंता छोड़, वर्तमान में ही उस पर कर्ज ले लिया। बैंक से जितने तरह का कर्ज हो सकता है, वह ले रखा है। घर की इज्जत यानी जेवर को भी अब बेचने या गिरवी रखने का प्रयास शुरू हो गया है। महंगाई के कारण अब खाने-पीने में भी कटौती होने लगी है। देखते ही देखते घर में दूध के पैकेट्स कम हो रहे हैं। सब्जियां और अन्य चीजों में कटौती होने लगी है। आय का कोई स्रोत नहीं दिख रहा। जिनके पास आय का स्रोत है, उस पर भी काले बादल मंडरा रहे हैं। इन सबके बीच तीसरी लहर की आशंका डरा रही है। पता नहीं भविष्य में क्या हो। लोगों की डांवाडोल आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की रिपोर्ट।
देश की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है। देश पर हर दिन कर्ज बढ़ता जा रहा है। महंगाई चरम पर है। इन सबके बीच कोरोना संक्रमण। डेढ़ साल से लोग इससे जूझ रहे हैं। हर कोई परेशान है। नौकरी-पेशा, व्यापारी, व्यवसायी, मजदूर कोई ऐसा वर्ग नहीं है, जो इस समय आर्थिक संकट से नहीं जूझ रहा। कोरोना महामारी का लोगों की आय और आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा है। परिवार के स्तर पर कर्ज बढ़ा है। वित्त वर्ष 2020-21 में जीडीपी 37.3 फीसदी तक पहुंच गयी है। यह इससे पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में 32.5 प्रतिशत थी। भारतीय स्टेट बैंक समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने कहा है कि वित्त वर्ष 2020-21 में बैंक जमा में कमी और दूसरी तरफ स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ने से परिवार का कर्ज जीडीपी के अनुपात के रूप में 2021-22 में और बढ़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महामारी का असर चालू वित्तीय वर्ष में तो दिखेगा ही, अगले वित्तीय वर्ष पर भी असर पड़ सकता है।
पहली लहर में जमा राशि भी निकली
बीते साल कोरोना की पहली लहर के दौरान लॉकडाउन हुआ था। लोगों के रोजगार सुरक्षित थे, उनकी नौकरी सही-सलामत थी। लोगों के पास पहले से जमा पूंजी थी और लॉकडाउन के दौरान भी थोड़ी बहुत कमाई होती रही।
लिहाजा लोगों ने पहले लॉकडाउन को इन्जॉय किया था। सोशल मीडिया पर लोग अपने इन्जॉयमेंट, पर्यावरण सुधार आदि की तस्वीर शेयर कर रहे थे। आरबीआइ के आंकड़े बताते हैं कि बैंक में लोगों की जमा राशि बढ़ी थी, क्योंकि लॉकडाउन की वजह से खर्च कम हो रहे थे। लॉकडाउन खुलते-खुलते आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी। जब तक स्थिति सुधरती, दूसरी लहर आ गयी और लोगों की आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी। आय का साधन घट गया। मार्च के आखिर में जब कोरोना की दूसरी लहर ने रफ्तार पकड़ी, तो अलग-अलग राज्यों में लॉकडाउन और कोरोना कर्फ्यू की शुरूआत हो गयी। इससे करीब एक करोड़ लोगों ने अपनी नौकरी गंवायी। जमा-पूंजी बैंक से निकलने लगी। स्वास्थ्य पर खर्च बेतहाशा बढ़ा। पहले की जमा पूंजी और कोरोना के पहले दौर की कुछ बचत, दूसरी लहर में निकल गयी।
3.5 करोड़ लोगों ने पीएफ से निकाला पैसा
कोरोना की दूसरी लहर का असर अर्थव्यवस्था के साथ-साथ लोगों की कमाई पर भी पड़ा है। इसकी वजह से बड़ी संख्या में लोगों ने प्रोविडेंट फंड एकाउंट से पैसा निकाला है। देश में इस समय छह करोड़ इपीएफओ सदस्य हैं। कोरोना की वजह से 1 अप्रैल 2020 से अब तक 3.5 करोड़ लोगों ने पीएफ एकाउंट से पैसा निकाला है, जबकि यह पैसा उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए था। उन्होंने मजबूरी में भविष्य की चिंता छोड़ जीवन जीने के लिए राशि निकाल ली। अभी तक पीएफ एकाउंट से 1.25 लाख करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं। बीते साल 2019-20 वित्तीय वर्ष में 81 हजार 200 करोड़ रुपये का सेटेलमेंट किया गया था। वहीं 1 अप्रैल 2020 से 12 मई 2021 तक 72 लाख लोगों ने 18 हजार 500 करोड़ रुपये का नॉन रिफंडेबल कोविड फंड का लाभ उठाया है।
तीसरी लहर का खतरा मंडरा रहा
लोग अभी कोरोना की दूसरी लहर के थपेड़े से बाहर नहीं निकले हैं। पेट्रोल-डीजल सौ का कांटा पार कर रहा है। दूध, तेल, आटा, दाल, चावल आदि ग्रोसरी आइटम में 25 फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई है। लोग जीनव को पटरी पर लाने की मशक्कत में लगे हैं। नौकरी, रोजगार छूटा तो विकल्प की तलाश कर रहे हैं। इनके बीच अब तीसरी लहर की आशंका जतायी जा रही है। वह भी केवल एक-दो महीने के अंदर आने का संकेत दिया जा रहा है। कोरोना महामारी की तीसरी लहर से लोग सहमे हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रॉस ए गेब्रेयेसिस ने कहा है कि कोरोना की तीसरी लहर अभी शुरूआती दौर में है। दुनियाभर में डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित मरीजों की संख्या अभी गिनती में है। अभी इसे बेकाबू होने से रोकना संभव है। हमेशा की तरह इस बार भी अगर लापरवाही हुई, तो पहले से भी भयावह नतीजे सामने होंगे। भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना वायरस की तीसरी लहर अगस्त महीने में आ सकती है। सितंबर में अपने चरम पर होगी। यानी कोरोना महामारी की तीसरी लहर आयी, तो फिर लॉकडाउन या कोरोना कर्फ्यू लगाने जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। एक बार फिर सब ठप पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इससे लोगों की नौकरियां जाने और बेरोजगारी दर बढ़ने की आशंका है।
चौतरफा मार झेल रहे लोग असमंजस में
लोग चौतरफा मार झेल रहे हैं। जमा राशि खत्म है। भविष्य के लिए भी बचत नहीं है। बैंकों का कर्ज है। महंगाई चरम पर है। अब उन्हें जीने की राह नहीं मिल रही। लोग असमंजस में हैं। जिनकी नौकरी गयी है, वे तीसरी लहर की आशंका में कुछ नया भी शुरू नहीं कर पा रहे हैं। जिन्होंने पहली लहर के दौरान नौकरी जाने के बाद छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू किया था, उनकी भी दूसरी लहर के लॉकडाउन ने स्थिति खराब कर दी है। अब उनके पास अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए भी रास्ता नहीं दिख रहा। अगर देखा जाये, तो बाजार से लिक्विड कैश कम होता जा रहा है। छोटी जगहों पर दो हजार के नोट तक बाजार में नहीं दिख रहे। लोगों को इस भंवर से निकालने के लिए सरकार से मदद की जरूरत है। सरकार को सेक्टर वाइज बांट कर लोगों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। क्योंकि हर सेक्टर एक-दूसरे से जुड़ा है। जब बाजार में पैसे का फ्लो बढ़ेगा, तभी फिर से स्थिति सुधरेगी। वरना कोरोना से अगर बच भी गये, तो आर्थिक महामारी तबाह कर देगी।