प्रशांत झा
कोल्हान के संस्कृत विद्यालयों ने मध्यमा (दसवीं) में मुस्लिम छात्रों का नामांकन लेने से मना करने की बात सामने आ रही है। ऐसा नहीं कि इन स्कूलों में सभी सीटें फुल हो गयी हैं। बच्चों का नामांकन केवल इसलिए नहीं लिया गया, क्योंकि वह एक विशेष जाति और संप्रदाय के हैं। स्कूल प्रबंधन का कहना है, ये संस्कृत विद्यालय हैं। यहां मुस्लिम बच्चों का नामांकन नहीं ले सकते हैं। उनके लिए मदरसा है। ये संस्कृत स्कूल जमशेदपुर, चाईबासा, सरायकेला और चक्रधरपुर में हैं। यह अजीबो-गरीब घटना ने शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे भेदभाव को सोचने के लिये मजबूर कर दिया है।

देश में शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव बहुत पहले से व्याप्त है। महाभारत में गुरू द्रोण ने यही काम किया था। उन्होंने कर्ण को सूतपुत्र होने के नाम पर शिक्षा देने से मना कर दिया था। जिसका नतीजा था कि कर्ण में गुरू द्रोण के प्रति गुस्सा और नफरत देखने को मिला। कर्ण की छवि में यह अपमान अंत तक झलकता रहा। देश में आज भी यही हो रहा है। खासतौर पर स्कूली शिक्षा में भेदभाव की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसको खाद, पानी, पोषण देने वाला ताकतवर समूह शिक्षा का बाजारीकरण कर दिया है। साथ ही उस बाजार का नियंत्रक बना बैठा है, जो संगठित माफिया की तरह कार्यरत है। वह न केवल नियमों को तोड़ता है, बल्कि मनमाफिक नियम निर्धारण में भी पर्याप्त सक्षम है। गरीबों और अमीरों के बच्चों की शिक्षा में स्पष्ट अंतर दिखता है। इसका असर छोटे-छोटे संस्थानों पर भी होने लगा है। बाल्यपन में शिक्षा में अंतर एक ‘विषबेल’ को जन्म दे रहा है।

भारतीय संविधान के पहले ही पन्ने पर सभी के समानता की बात लिखी है। सवाल है यह कैसी समानता है? बच्चों की शिक्षा में भेदभाव क्या समानता को दर्शता है? शिक्षा क्षेत्र में हुए विभिन्न सर्वे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि शिक्षण संस्थाओं में जातीय या सांप्रदायिक भेदभाव के चलते छात्र हीनभावना का शिकार हो रहे हैं।

कई बार छात्र अपमान और उपेक्षा के चलते अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। झारखंड के कोल्हान के तीन संस्कृत स्कूलों में संप्रदाय के नाम पर बच्चों को दाखिला नहीं देने की यह घटना संभवत: पहली बार हुआ है। पर इस पहली घटना के साथ ही सचेत होने की जरूरत है। क्योंकि इसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता है। इस पर गंभीरता से विचार और रोकथाम के लिये ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

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