चुनावी रणनीतिकार : कभी वे नेताओं से मिलने के लिए समय लेते थे, आज विपक्षी नेता उनसे मिलने के लिए समय ले रहे हैं
हमारे देश के विपक्षी दल राजनीतिक रूप से इतने कंगाल हो गये हैं कि अब वे अपने को पार्टी के लिए खुद की रणनीति बनाने के काबिल भी नहीं समझते। कहने को तो विपक्षी दल पूरे देश पर राज करने का सपना देख रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अपने दल के लोगों को टिकट देने में भी उनके हाथ-पैर फूल रहे हैं। चुनाव में एजेंडा क्या होगा, वायदे क्या किये जायेंगे, किन्हें टिकट दिया जायेगा, नेता क्या पहनेंगे, कैसे चलेंगे, किस तरह का ड्रामा करेंगे, कैसे वे चुनावी वैतरणी पार करेंगे, यह सब अब ठेका पर दिया जाने लगा है। इतना नहीं, अब तो विपक्ष के राजनीतिक दलों में यह ताकत और विजन भी नहीं रहा कि वे अपने प्रयास से एक मंच पर आ सकें। अब यह सब कुछ करने की जिम्मेदारी प्रशांत किशोर को दे दी गयी है। विपक्ष की राजनीति के अस्तित्व को बचाने की अब पूरी जिम्मेदारी प्रशांत किशोर के कंधों पर आ गयी है। कभी प्रशांत किशोर को राजनीतिक दलों के सुप्रीमो से मिलने के लिए समय लेना पड़ता था, अब स्थिति यह है कि राजनीतिक दलों को अब प्रशांत किशोर से मिलने के लिए समय लेना पड़ रहा है। शरद पवार, यशवंत सिन्हा, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव के साथ-साथ अब तो कांगे्रस की खेवनहार सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी तक प्रशांत किशोर पर डिपेंड हो गये हैं। कयास तो यहां तक लगाया जा रहा है कि किसी न किसी दिन प्रशांत किशोर के कंधे पर कांग्रेस की नैया को पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी न दे दी जाये। यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए कितना मुफीद होगा, यह तो समय बतायेगा, लेकिन यह कम आश्चर्यजनक नहीं कि कॉरपोरेट कल्चर से निकला हुआ एक व्यक्ति अब राजनीतिक दलों के लिए एजेंडा तय करने लगा है। हाल के सात साल में प्रशांत किशोर ने कहां से कहां तक की यात्रा तय की है, और कैसे विपक्षी दलों की निर्भरता उन पर बढ़ी है, इस पर प्रकाश डालती दयानंद राय की रिपोर्ट।
44 साल के प्रशांत किशोर की 13 जुलाई को हुई राहुल गांधी से मुलाकात चर्चा में है। इस मुलाकात में दोनों के बीच क्या बातें हुर्इं यह तो साफ नहीं है, पर जो बातें छन कर बाहर आयीं, उसका लब्बोलुआब यह है कि करीब एक घंटे तक चली मुलाकात में प्रशांत किशोर ने पंजाब चुनाव से लेकर विपक्ष की राजनीति तक पर चर्चा की। इस बैठक में प्रियंका गांधी भी मौजूद थीं। बैठक को लेकर जो दूसरी बात सामने आयी, वह यह थी कि बैठक में 2022 में के उत्तरप्रदेश में होनेवाले चुनाव की रणनीति पर भी चर्चा हुई। प्रशांत किशोर और राहुल गांधी का एक साथ बैठक में शामिल होना इस बात का द्योतक है कि अब कांग्रेस जैसी पार्टी भी प्रशांत किशोर पर आश्रित होने लगी है। एक अटकल यह भी लगायी गयी कि 2024 में होनेवाले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सत्ता में वापसी चाहती है और इसे लेकर भी बैठक में चर्चा हुई। बैठक में चाहे जो भी बातें हुईं हों यह तो तय हो गया कि भारतीय राजनीति और खासकर विपक्ष की राजनीति में दल के नेताओं का कद छोटा और प्रशांत किशोर का कद लगातार बड़ा होता चला जा रहा है और अब कमोबेश हर राजनीतिक दल के लिए वे उस संजीवनी बूटी की तरह हैं जिसकी जरूरत उस दल विशेष की चुनावी सफलता के लिए अनिवार्य है।
क्या दलों की चुनावी रणनीति बनाने में भूमिका सिमटती जा रही है
राजनीति में प्रशांत किशोर के उत्थान की कहानी विभिन्न राजनीतिक दलों में उनके वरीय नेताओं की चुनावी रणनीति बनाने में सिमटती भूमिका की भी कहानी है। दरअसल बदलते राजनीतिक परिवेश में जैसे-जैसे राजनीति हाइटेक होती गयी। चुनावी रणनीति के निर्धारण में सोशल मीडिया, मुद्दों का चुनाव और स्लोगन के साथ मैनेजमेंट स्ट्रेटजी का दखल बढ़ता गया। चुनावी रणनीति तय करने में विभिन्न राजनीतिक दलों के वरीय नेताओं और नीति निर्धारकों की भूमिका सिमटती गयी। हाइटेक होने के साथ जटिल होती इस प्रक्रिया में पुराने चुनावी हथियार भोथरे होने लगे और इसी के साथ प्रशांत किशोर जैसे चुनावी रणनीतिकार की राजनीतिक दखल और अहमियत बढ़ने लगी। प्रशांत किशोर की इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी यानी आई-पैक ने पहले वर्ष 2014 में बीजेपी में नरेंद्र मोदी के लिए पूरा चुनावी अभियान संचालित किया, जिसमें राजनीतिक रणनीति, तकनीक और सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल देश में पहली बार देखा गया। इसी समय प्रशांत किशोर का नाम एक बड़े राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर उभरा। लेकिन बहुत जल्द भाजपा ने किन्हीं कारणों से अपने को उनसे अलग कर लिया। इसके बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की टीम ने जदयू और खासकर नीतीश कुमार के लिए चुनाव प्रचार संभाला। उन्होंने रणनीति तैयार की और चर्चित नारा भी दिया कि बिहार में बहार है, नीतीशै कुमार है। यह नारा काफी छाया रहा। इस चुनाव में जदयू, राजद और कांग्रेस के महागठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला। 2016 में प्रशांत किशोर ने पंजाब विधानसभा चुनाव में अमरिंदर सिंह और कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति तैयार की और कांग्रेस को बड़ी जीत दिलवायी। 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस ने भी कुछ समय के लिए उनका सहारा लिया, लेकिन वहां के नेताओं के विरोध के कारण उन्हें अलग होना पड़ा और वे वहां कुछ नहीं कर पाये। कांग्रेस को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिली थीं। पर 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की जीत ने एक बार फिर प्रशांत किशोर का सितारा बुलंद कर दिया। इस चुनाव में प्रशांत किशोर का एक ट्वीट चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा बंगाल में 294 सदस्यीय विधानसभा में दोहरे अंकों को पार करने के लिए संघर्ष करेगी। अगर भाजपा का प्रदर्शन इससे बेहतर रहा तो वह ट्विटर छोड़ देंगे। बाद में उनकी यह भविष्यवाणी सही साबित हुई। बंगाल में खेला होबे का नारा भी प्रशांत किशोर का दिया हुआ माना जाता है।
विपक्ष को एकजुट कर उन्हें नयी धार दे सकते हैं पीके
केंद्र में सत्ता संभाल रही मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जिस प्रकार महंगाई बढ़ी है और लोगों की नौकरियां गयी हैं ऐसे में भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए नये मुद्दे और रणनीति की जरूरत पड़ेगी। कोरोना संकट से निपटने में केंद्र सरकार को विफल बताते हुए विपक्ष ने उन पर प्रहार भी किया है। ऐसे में संभव है कि पहले वर्ष 2022 में होनेवाले यूपी विधानसभा चुनाव और 2024 मेें होनेवाले लोकसभा चुनावों में प्रशांत किशोर विपक्ष के मुख्य चुनावी रणनीतिकार की भूमिका में हों। विपक्षी दलों के नेताओं के साथ उनकी बैठक और मिलना-जुलना इसी ओर संकेत करते हैं। अब तक प्रशांत किशोर ने जिस तरीके से चुनावी रणनीति बनायी और संचालित की है उससे यही लगता है कि वे विपक्षी नेताओं को एकजुट करने और उनमें एका लाने में सफल हुए तो वे उन्हें नयी धार दे सकते हैं। राजनीति संभावनाओं का खेल है और प्रशांत किशोर इस खेल के जादूगर की भूमिका में दिखायी देते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह कवायद क्या गुल खिलाती है।