सियासत : डॉ रामेश्वर उरांव और आलमगीर आलम को असंतोष पर काबू पाना होगा
झारखंड की गठबंधन सरकार में दूसरी बड़ी भागीदार कांग्रेस पार्टी का प्रदेश नेतृत्व कई समस्याओं से जूझ रहा है। पार्टी के सामने जहां दल के भीतर उभर रहे नेताओं और विधायकों के असंतोष को दूर करने की चुनौती है, वहीं पार्टी के विधायकों को बाहरी प्रलोभन से बचाने का चुनौतीपूर्ण टास्क भी है। ऐसा नहीं है कि पार्टी को इस असंतोष की जानकारी नहीं है और उसने इसे दूर करने के लिए कुछ नहीं किया। पर जो कुछ किया गया है वह पर्याप्त नहीं दिखता। पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने अपने विधायकों के साथ कई वार्ताएं की हैं पर समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के दो आला नेताओं डॉ रामेश्वर उरांव और कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम के जिम्मे यह टास्क आन पड़ा है कि वे न सिर्फ पार्टी के जिलाध्यक्षों, नेताओं और कार्यकर्ताओं की बात सुनकर उनकी समस्याओं का समाधान करें बल्कि विधायकों की भी नाराजगी दूर करें। यह कोई आसान काम नहीं है, पर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को यह करना ही होगा। प्रदेश कांग्रेस में उभरे असंतोष और उसे दूर करने की कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व की कवायद पर नजर डालती दयानंद राय की रिपोर्ट।
सत्ता की मलाई किसे रास नहीं आती। पर जब सत्ता में भागीदार होने के बाद भी इसका रस न मिले और मिले भी तो उम्मीदों से कम मिले तो असंतोष स्वभाविक है। प्रदेश कांग्रेस में उभरे असंतोष और विधायकों में पनपी बेचैनी की एक बड़ी वजह सत्ता में भागीदार रहने के बावजूद सत्ता से उनकी उम्मीदों का पूरा न हो पाना है। इस असंतोष की तह में जायें तो इसकी एक नहीं कई वजहें निकलकर सामने आती हैं। राज्य में गठबंधन सरकार बने डेढ़ साल से अधिक का वक्त गुजर चुका है पर न तो अब तक बोर्ड, निगमों और आयोगों के खाली पड़े पदों को भरा गया है और न निगरानी समिति और 20 सूत्री समितियों में ही कार्यकर्ताओं को एडजस्ट किया गया है। राज्य में ढाई दर्जन से अधिक बोर्ड, निगमों और आयोगों में पद खाली पड़े हैं। वहीं 20 सूत्री और निगरानी समितियों के जरिये करीब तीन हजार लोगों को पावर का एहसास कराया जा सकता है। यह काम हो नहीं रहा इसलिए प्रदेश कांग्रेस के नेताओें और विधायकों के भीतर बेचैनी है। कांग्रेस के भीतर के असंतोष को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद फुरकान अंसारी का बयान महत्वपूर्ण है। फुरकान ने बीते माह कहा था कि सरकार में कांग्रेस विधायकों की बात नहीं सुनी जा रही है। आखिर कोई कब तक इंतजार करेगा। अधिकारियों की पोस्टिंग में कांग्रेस विधायकों की नहीं चलती है और विकास कार्य हो नहीं पा रहे हैं। विधायकों को भी अपने क्षेत्र में जनता को जवाब देना है। ऐसे में कोई भी कदम उठाने के लिए विधायक बाध्य होंगे। प्रदेश अध्यक्ष पर जहां संगठन को मजबूत करने का दायित्व है वहीं विधायक दल के नेता की जिम्मेदारी है कि वे सभी को साथ लेकर चलें।
12वां मंत्री पद भी एक वजह
राज्य की गठबंधन सरकार में मंत्री का 12वां पद रिक्त है। इस पद पर भी कांग्रेस के कई विधायकों की निगाहें टिकी हुई हैं। इसे लेकर कांग्रेस और झामुमो दोनों दावा करते रहे हैं। इसी माह अपने सिमडेगा दौरे के क्रम में डॉ रामेश्वर उरांव ने इसे लेकर पार्टी का रूख साफ किया। उन्होंने साफ किया कि मंत्री के लिए कांग्रेस का दावा मजबूत है लेकिन मंत्री किसे बनाना है इसपर सीएम का विशेषाधिकार है। हालांकि 12 वें मंत्री को लेकर झामुमो भी दावा करता रहा है। झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य भी कह चुके हैं कि हेमंत मंत्रिमंडल में जब भी 12वां मंत्री बनेगा वह झामुमो का ही होगा। जाहिर है कि राज्य का 12वां मंत्री बनने की चाहत भी कांग्रेस के विधायकों के मन में है और यह बहुत स्वाभाविक भी है।
कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने क्या किया है
पार्टी के भीतर उभरे असंतोष को कम करने के लिए प्रदेश कांग्रेस के नेता समय-समय पर कदम उठाते रहे हैं। इसे लेकर कांग्रेस विधायक दल की एक बैठक 24 जून को रॉक गार्डेन में हुई थी। इसमें 12 वें मंत्री पद से लेकर विधायकों के उठाये गये मसलों पर चर्चा हुई थी। इसमें यह भी तय हुआ था कि विधायकों के मसलों पर बात करने के लिए पार्टी का पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से बात करने जायेगा। इसके अलावा कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम ने भी कांग्रेस विधायकों के साथ वार्ता भी की थी और उनकी समस्याओं के समाधान का भरोसा दिया था। यही नहीं 27 जुलाई को गोड्डा के कांग्रेस कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता मेें उन्होंने कहा कि जिसकी जो समस्या थी, उसका निराकरण कर दिया गया है। 20 सूत्री और निगरानी समितियों का गठन 15 अगस्त तक होगा।
आगे का रास्ता क्या है
यह तो साफ है कि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं खासकर डॉ रामेश्वर उरांव और आलमगीर आलम को न सिर्फ पार्टी में उभरे असंतोष की वजहों की जानकारी है बल्कि उनका समाधान करने की भी वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। यदि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तय होने के साथ 20 सूत्री समितियों और निगरानी समितियों का गठन हो जाता है और बोर्ड-निगमों तथा आयोगों में कांग्रेस के नेताओं और विधायकों को जगह मिल जाती है तो कांग्रेस नेताओं और विधायकों का असंतोष बहुत हद तक दूर किया जा सकता है। इस दिशा में कांग्रेस आगे बढ़ रही है। आलमगीर आलम का बयान यह साफ संकेत देता है कि राज्य सरकार 20 सूत्री और निगरानी समितियों का गठन करने की दिशा में आगे बढ़ चली है और बोर्ड और निगमों का गठन भी जल्द हो जायेगा। इन कवायदों से यदि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं और विधायकों की असंतुष्टि दूर हो जाती है तो यह कांग्रेस के हित में ही होगा पर यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर असंतोष की यह आग क्या गुल खिलायेगी कहना मुश्किल है।
पार्टी के विधायकों को बाहरी प्रलोभन से बचाना भी चुनौती
प्रदेश कांग्रेस के सामने न सिर्फ पार्टी के नेताओं और विधायकों के असंतोष से निबटने की चुनौती है बल्कि बाहरी प्रलोभन से भी बचाने की जिम्मेदारी है। कांग्रेस के सिमडेगा विधायक नमन विक्सल कोन्गाड़ी यह साफ कर चुके हैं कि उन्हें मौजूदा सरकार को गिराने के लिए 50 करोड़ रुपये और मंत्री पद का आॅफर किया गया था। मैंने उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और मुख्यमंत्री के साथ ही कांग्रेस के वरीय नेताओं को भी इसकी जानकारी दी। इससे साफ है कि कांग्र्रेस के भीतर के असंतोष का फायदा उठाने के लिए बाहरी ताकतें लगी हुई हैं। अब जब कांग्रेस के सामने सब कुछ साफ है तो उसके सामने अपने विधायकों को बाहरी प्रलोभन से भी बचाने की चुनौती है।