प्रशांत झा
देश जब आजाद हुआ था, तो भारत की जनसंख्या मात्र 36 करोड़ थी। वर्ष 1991 में 86 करोड़, 2001 में 102 करोड़ और 2011 की जनगणना के अनुसार आबादी 121 करोड़ पर पहुंच गयी। वर्तमान में भारत की जनसंख्या 136 करोड़ से ऊपर है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत की आबादी 1 अरब 52 करोड़ 80 लाख हो जायेगी। देश का भविष्य को चुनौती देता जनसंख्या विस्फोट, ‘आबादी युद्ध’ में चीन को भी परास्त कर देगा। इस विषय पर सभी को सोचने की जरूरत है।
70 के दशक में स्व. संजय गांधी ने जबरन नसबंदी की शुरूआत की थी। कहा जाता है संजय गांधी ने जनसंख्या नियंत्रण के लिये गलत तरीके का इस्तेमाल किया था। यह एक बड़ी राजनीतिक भूल थी। जिसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा। संजय गांधी ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए जो रास्ता अपनाया संभव है वह गलत रहा हो, लेकिन मंशा को गलत करार नहीं दिया जा सकता है। मंशा देश के लोगों को हर नागरिक सुविधा मिले, जीडीपी बेहतर हो यही थी। अगर 70 के दशक की स्थिति पर ध्यान दिया जाये, तो उस वक्त देश एक बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा था। लोग बेरोजगारी और महंगाई से जूझ रहे थे। देश में आज भी लगभग वैसे ही हालात बनते जा रहे हैं। गिरती मुद्रास्फीति, घटती बचत दरें, सरकार के कर्ज लेने में इजाफा, गिरता रुपये का मूल्य, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी देश की मौजूदा स्थिति को बयां कर रही है। इस बार जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून का सहारा लिया जा रहा है। सभी को बढ़ती जनसंख्या की समस्या को समझाने का प्रयास किया जा रहा है। बढ़ती आबादी ही सारी समस्याओं का जड़ है। इस पर काबू पाना जरूरी है। इसे समझना होगा।
उत्तर प्रदेश ने जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू किया है। अन्य राज्य इस राह पर हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी इस पर कायदा-कानून बनाने की कवायद चल रही है। पर जनसंख्या नियंत्रण को लेकर विरोध के स्वर भी उभर रहे हैं। ऐसे में जनसंख्या-वृद्धि पर नियंत्रण कठिन हो जायेगा। इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जनता को भी निजी स्वार्थ त्याग कर देशहित में परिवार का स्वरूप निर्धारित करना होगा। जनसंख्या निंयत्रण कानून पर सभी को एकमत होना होगा। जिससे सभी को कम से कम स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, आवास, समेत अन्य बुनियादी सुविधाएं मयस्सर हो सके।