आबोहवा : जनसंख्या के बोझ ने रोक दी है जीवन की रफ्तार, अब तो सांस लेने में भी हो रही है परेशानी
झारखंड की राजधानी रांची के फेफड़ों में अब जंग लगनी शुरू हो चुकी है। यहां की आबोहवा खराब हो गयी है, घुटन महसूस होने लगी है। सांस लेने में भी तकलीफ हो रही है। व्यक्ति के जीवन में शुद्ध हवा, परिष्कृत पर्यावरण का क्या महत्व है, यह कोरोना काल में हर व्यक्ति समझ चुका है। लोगों ने महसूसा है कि कैसे कोरोना वायरस ने इंसानी फेफड़ों को संक्रमित कर उसे अपना ग्रास बनाया। उससे बचने के लिए कैसे सांस लेने के लिए फेफड़ों को आॅक्सीजन की जरूरत पड़ी है। कोरोना फैला ही शुद्ध हवा नहीं मिलने, प्रदूषित पर्यावरण और रहन-सहन के लिए उचित जगह की कमी के कारण। इन सबके कारण लोगों की इम्युनिटी गिरी और कोरोना वायरस ने आक्रमण कर दिया। दरअसल रांची की आबोहवा अब वह नहीं रही, जिसके लिए वह जानी जाती थी। यहां की आबोहवा में हमेशा ताजगी महसूस होती थी। तापमान स्वस्थ शरीर के अनुकूल होता था। लेकिन बढ़ती आबादी के कारण यहां की आबोहवा भी प्रदूषित होने लगी। आबादी तो बढ़ती गयी, लेकिन उसके अनुपात में रांची के रिहायशी क्षेत्रफल में इजाफा नहीं हुआ। लोगों को शुद्ध हवा भी नसीब होने से रुक गयी। मौजूदा स्थिति में रांची को भी अब वृहद् पैमाने पर आॅक्सीजन की दरकार है। इसके लिए भीड़ के भार को बांटने की दरकार है। रांची के बाहरी इलाके जो बहुत ही खूबसूरत और खाली हैं, उन्हें अब इस्तेमाल में लेने का वक़्त आ गया है। मतलब अब ग्रेटर रांची राजधानी की जरूरत बन गयी है। बार-बार बेतरतीब तरीके से रांची बसती है। अतिक्रमण होता है। उसे ध्वस्त करने का आदेश निर्गत होता है। आदेश का पालन होता है, लेकिन कुछ दिन बाद ही फिर बड़े पैमाने पर लोग उसी स्थान पर बस जाते हैं। यह एक तरह से जीवन की साइकिल बन गयी है। इसका खामियाजा राज्य की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ लोगों को भी भुगतना पड़ता है। इसका एकमात्र समाधान है-बृहद रांची का निर्माण यानी रिहायशी इलाकों का फैलाव। इससे लोगों को शहर के बाहर बसने का मौका मिलेगा और शहर में जनसंख्या दबाव का बोझ भी कम होगा। रांची को विकसित होने का मौका मिलेगा। अनप्लांड सिटी का तमगा लिये रांची को प्लांड सिटी का तमगा भी मिलेगा। इन तमाम बिंदुओं पर प्रकाश डालती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की रिपोर्ट।
रांची से लगभग 130 किलोमीटर दूर जमशेदपुर है। इस शहर का नाम ‘जमशेदपुर’ टाटा के संस्थापक जमशेदजी नाशवरवानजी टाटा के नाम पर रखा गया। किसी व्यक्ति के नाम पर सड़क, पार्क, भवन आदि का नाम रखा जाना सामान्य बात है। पर पूरे के पूरे एक शहर का नाम किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर रखना खासियत को इंगित करता है। अगर देखें तो जमशेदजी में सबसे बड़ी खासियत थी विजन। टाटा की स्थापना 1907 में हुई। उस वक्त उन्होंने स्टील प्लांट के साथ-साथ एक प्लांड सिटी की परिकल्पना की। जो बाद के समय में टाटा क्षेत्र में फलीभूत हुआ। हालांकि टाटा के बाहरी क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया गया, जिस वजह से वहां अव्यवस्थित विकास हुआ, लेकिन टाटा क्षेत्र एक प्लांड सिटी के रूप में उभर कर सामने आया। एक बार फिर टाटा की तरह प्लानिंग और विजन सिर्फ रांची ही नहीं, झारखंड के अन्य जिलों को भी चाहिए। हर जिले के लिए न्यू झारखंड का एक प्लांड प्रोजेक्ट बनना चाहिए। इसकी शुरूआत राजाधानी रांची से ग्रेटर रांची योजना को अमलीजामा पहना कर तो की ही जा सकती है।
ग्रेटर रांची सुविधा से लैस हो
लोगों की बुनियादी जरूरतें सीमित हैं। सड़क, बिजली, पानी, आवास, स्कूल, कॉलेज, बाजार, स्वास्थ्य व्यवस्था, रेलवे, बस और हवाई सेवा आदि की जरूरत ही मुख्य रूप से लोगों को होती है। मुंबई सिकुड़ा तो नवीं मुंबई का निर्माण हुआ। दिल्ली सिकुड़ी तो एनसीआर और द्वारिका जैसे क्षेत्र खड़े हुए। अगर इन शहरों के बढ़ाव को देखें, तो नये क्षेत्र में पहले सुविधाएं पहुंचीं। सड़क, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, रिहायशी क्षेत्र, आवागमन की सुविधा आदि तैयार हुए। ये सुविधाएं जब वहां पहुंचीं, तो लोग धीरे-धीरे बसने भी लगे। व्यावसायिक गतिविधियां भी वहां होने लगी। लेकिन अगर ध्यान दें तो अब लोग काफी-काफी दिनों तक अपने क्षेत्र में ही सिमटे रह जाते हैं और पुराने क्षेत्र में आते तक नहीं हैं। इसका दो लाभ हुआ। एक तो पुरानी जगह पर भार कम हुआ और दूसरा नयी जगह योजनाबद्ध तरीके से तैयार हो गयी। ग्रेटर रांची के लिए भी इसी तरह का कुछ कदम उठाने की जरूरत है। शहर के बाहर एक नये इलाके को योजनाबद्ध तरीके से बसाने की जरूरत है। ग्रेटर रांची में इन सारी सुविधाओं पर अच्छे तरीके से विचार किये जाये, तो आनेवाला भविष्य बहुत ही खूबसूरत और सरल हो सकता है। सुविधा होगी, तो लोग बसेंगे, लोग बसेंगे तो व्यावसायिक गतिविधियां भी शुरू होंगी। रोजगार का अवसर भी मिलेगा। निवेशक भी आयेंगे। इससे झारखंड का नाम विश्व में वेल प्लांड सिटी के रूप में हो सकता है।
20 साल से खयाली पुलाव ही पकते रहे
झारखंड गठन हुए 20 साल बीत चुका है। अब तक ग्रेटर रांची को लेकर केवल खयाली पुलाव ही पकते रहे हैं। खयाली पुलाव से तो पुलाव की खुशबू भी नहीं आती। खुशबू बिखेरने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी हों या इसके बाद बने राज्य के अन्य मुखिया, रांची के विस्तार की चर्चा हर समय रही। कभी सुकरहुटू में, कभी कुटे में, तो कभी एचइसी में। अभी स्मार्ट सिटी का निर्माण हो रहा है, तो वह भी आम लोगों के लिए सोच कर नहीं है। हालत यह है कि 20 सालों में स्थिति वहीं की वहीं रही। शहर के बीचों-बीच बड़ी-बड़ी बहुमंजिली इमारतें खड़ी होती गयीं। नर्सिंग होम, स्कूल, मॉल सब कुछ इन 20 सालों में शहर के अंदर ही निर्माण होता रहा। सुविधा और आवागमन के अभाव में लोगों ने भी शहर के बाहर बसने का प्रयास नहीं किया। यहां तक कि नये सरकारी कार्यालय भी शहर के बाहर नहीं बने। नतजीतन कभी सड़क पर अतिक्रमण, कभी नदी नालों पर अतिक्रमण, तो कभी खाली जमीनों पर अतिक्रमण होता रहता है। झुग्गी झोंपड़ी तैयार होती और उजड़ती हैं। कोर्ट के आदेश पर पुलिस-प्रशासन जागी, सब कुछ खाली कराया, फिर कुछ महीनों बाद पुरानी स्थिति। सड़कों पर वाहनों का दबाव दिन ब दिन बढ़ रहा। गाड़ियां चलती नहीं, रेंगती हैं। आखिर लोग भी क्या करें। शहर से 30 किलोमीटर दूर रहेंगे, तो आपातकाल में अस्पताल आते-आते ही मरीज दम तोड़ देगा। ट्रेन या फ्लाइट पकड़ने जायेंगे, तो रास्ते में ही फंसे होने का डर बंधा रहेगा।
अब बदलाव पर सोचना जरूरी
ग्रेटर रांची के लिए सोचना और उसे योजनाबद्ध तरीके से जमीन पर उतारना जरूरी हो गया है। सबसे पहले वहां लोगों को ध्यान में रख कर आवागमन को व्यवस्थित करना होगा। साथ ही मौजूद शहर को भी व्यवस्थित किये जाने की जरूरत है। रांची का मास्टर प्लान और जोनल प्लान तैयार है। प्लान के अनुसार काम किये जाने की जरूरत है। ग्रेटर रांची जिस भी क्षेत्र में तैयार हो, वहां सबसे पहले बिजली, पानी और सड़क की व्यवस्था हो। वहां कुछ सरकारी कार्यालयों को ले जाया जाये। शहर के बीचों बीच चल रहे बड़े व्यावसायिक गतिविधियों को वहां जगह दी जाये और शहर को खाली कराया जाये। बस अड्डा को शहर के बाहर किया जाये। संपर्क मार्ग को व्यवस्थित किया जाये। शहर के अंदर बड़े-बड़े मल्टीस्टोरेज बिल्ंिडग के निर्माण को रोका जाये। इससे मौजूदा शहर में भी सांस लेने की जगह मिल सकेगी। शहर पर भार कम होगा और नया क्षेत्र जल्द विकसित हो सकेगा। सरकार यह कर सकती है। इतिहास गवाह है कि कई शहरों का स्वरूप बदल गया है। नये शहर के साथ-साथ पुराने शहर भी स्वच्छ और सुंदर बन गये हैं। जरूरत है सरकार की इच्छाशक्ति की।