- अशोक के धर्म स्तंभ से धर्म को क्यों अलग करना चाह रहे लिबरल
- आखिर ओवैसी और तथाकथित सेक्यूलरों को पूजा से क्यों है दिक्कत
इस देश का मूल मंत्र है सत्यमेव जयते। मुंडक उपनिषद से लिया गया यह मंत्र अशोक स्तंभ पर लिखा गया है। आजादी के बाद भारत के संविधान ने न सिर्फ इस मंत्र को अपनाया, बल्कि अशोक स्तंभ पर बने सिंह को राष्टÑीय प्रतीक के तौर पर स्वीकार किया। आज संसद की नयी इमारत पर लगे उसी राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न अशोक स्तंभ को लेकर इन दिनों खूब हंगामा खड़ा किया जा रहा है। विपक्ष ने केंद्र सरकार पर इसकी डिजाइन में छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है। जिस दिन इसका अनावरण हुआ, उसी दिन से विपक्ष इसको लेकर केंद्र सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहा है। विपक्ष कह रहा है कि संसद के नये भवन में स्थापित विशालकाय अशोक स्तंभ सारनाथ में स्थापित मूल अशोक स्तंभ से भिन्न है। हालांकि सरकार और मूर्तिकार दोनों की ओर से विपक्ष के आरोप को सिरे से खारिज किया गया है। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 जुलाई को इस अशोक स्तंभ का विधिवत पूजा-पाठ के साथ उद्घाटन किया। एआइएमआइएस चीफ असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि चूंकि संसद भवन के नये परिसर का निर्माण हो रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को इसका उद्घाटन करना चाहिए था। वहीं सरकार का तर्क है कि अभी संसद की इमारत का नहीं, बल्कि सिर्फ अशोक स्तंभ का अनावरण हुआ है और इसका निर्माण सीपीडब्ल्यूडी करा रहा है। यह सरकारी कार्यक्रम था और चूंकि प्रधानमंत्री सभी मंत्रियों से ऊपर होते हैं, ऐसे में उन्होंने इसका उद्घाटन किया है। वहीं विपक्ष की ओर से यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि राष्ट्रीय प्रतीक में फेरबदल किया गया है। इसमें बने हुए शेर सारनाथ में स्थित स्तंभ से अलग हैं। कई विपक्षी नेताओं ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि संसद की नयी इमारत की छत पर स्थापित राष्ट्रीय प्रतीक के शेर आक्रामक मुद्रा में नजर आते हैं, जबकि मूल स्तंभ के शेर शांत मुद्रा में हैं। यह पहला अवसर नहीं है, जब विपक्ष हंगामा कर रहा है। भारत जैसे विशाल देश में इस तरह का विवाद पूरी तरह गैर-जरूरी और महज दूसरे जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ही खड़ा किया जाता है। वैसे पिछले आठ साल में विपक्ष ने जितने भी विवाद खड़े किये हैं, वे सभी नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हुए हैं। चाहे नोटबंदी हो या जीएसटी, राम मंदिर हो या धारा 370, नया संसद भवन हो या फिर कोई और नयी योजना, देश की 130 करोड़ जनता मोदी सरकार के हर फैसले का समर्थन करती नजर आती है। ऐसे में क्या है अशोक स्तंभ का ताजा विवाद और क्यों खड़ा किया गया है इसे, इसका विश्लेषण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।
1988 में आयी फिल्म वारिस से लता मंगेशकर का गाया एक गाना है, मेरे प्यार की उमर हो इतनी सनम, तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे खतम। यह लाइन आज की तारीख में विपक्ष की राजनीति के लिए पूरी तरह से सटीक बैठती है। विपक्ष का मोदी प्रेम भला किससे छिपा हैं! इसलिए तो इनकी राजनीति मोदी के नाम से शुरू और मोदी के नाम पर ही खत्म होती है। आज का जो विपक्ष है, उसका काम यही रह गया है कि कब मोदी मुंह खोलें और उनके बिना कुछ कहे ही विपक्ष के मुंह से रट्टा लगना शुरू हो जाये कि यह तो लोकतंत्र की हत्या है। अभी हाल ही में दिल्ली के नये संसद भवन में स्थापित अशोक स्तंभ के शेरों को लेकर विपक्ष ने हाय तौबा मचा दिया है कि शेर इतना दहाड़ क्यों रहे हंै। शेरों का मुंह इतना क्यों खुला है। उनके दांत इतने बड़े क्यों दिखायी दे रहे हैं। कोई यह भी कह रहा है कि शेर इतने गुस्से में क्यों हैं। आजकल तो विपक्ष का हाल कुछ ऐसा हो गया कि इधर मोदी मुंह खोले नहीं, उधर विपक्ष छाती पीटने लग जाता है। पहले मुंह से शब्द तो निकलने दो भाई, बुराई करते रहना। चलिए मुद्दे पर लौटते हैं। दिल्ली में नया संसद भवन बन रहा है। इसके शीर्ष पर साढ़े छह मीटर ऊंचा और साढ़े नौ हजार किलोग्राम वजन वाला अशोक स्तंभ स्थापित किया गया है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का राजकीय प्रतीक भी है। सारनाथ में सम्राट अशोक ने जो स्तंभ बनवाया था, यह प्रतीक वहीं से लिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब विधिवत पूजा-अर्चना कर इसका अनावरण किया, तो विपक्ष हल्ला मचाने लगा। किसी को हिंदू रीति-रिवाज से पूजा के बाद अनावरण से आपत्ति है, तो किसी को प्रधानमंत्री के हाथों अनावरण से। इतना ही नहीं, इसकी डिजाइन को लेकर भी बहुत से लोगों ने आपत्ति जतायी है।
क्या है भारत का राजकीय प्रतीक
सबसे पहले आपको अपने राजकीय प्रतीक के बारे में बता देते हैं। आप इससे अनजान नहीं हैं, क्योंकि आपने एक-दूसरे की ओर पीठ किये चार सिंहों वाले इस प्रतीक को कई बार देखा है। अशोक स्तंभ के चार सिंह शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और गौरव का प्रतीक हैं। इसके नीचे घंटे के आकार के पद्म के ऊपर एक चित्र वल्लरी में हाथी, चौकड़ी भरता हुआ एक घोड़ा, एक सांड और सिंह की उभरी हुई मूर्तियां होती हैं, जिसके बीच-बीच में चक्र बने हुए हैं। इसे एक ही पत्थर से तराश कर बनाया गया था और इसके ऊपर धर्मचक्र रखा होता है।
26 जनवरी, 1950 को हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे हमारे राजकीय प्रतीक के रूप में मान्यता दी। इसके नीचे देवनागरी लिपि में सत्यमेव जयते भी लिखा होता है, जिसका अर्थ है, सत्य की ही जीत होती है। 268 ईसापूर्व से लेकर 232 ईसापूर्व तक अखंड भारत पर 36 वर्ष शासन करने वाले महान सम्राट अशोक को भला कौन नहीं जानता। हालांकि, मुगलों और फर्ज शाह तुगलक ने इन स्तंभों के साथ बड़ी छेड़छाड़ की और इन्हें इधर-उधर कर दिया।
खुद सम्राट अशोक ने इन स्तंभों को धम्म (धर्म) स्तंभ नाम दिया था। ऐसे में क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूजा-अर्चना कर धर्म के अनुसार इसका अनावरण करने से विपक्ष को क्यों परेशानी हो रही है? सोचिए, 2272 वर्ष पुराने अपने इतिहास को भारत जागृत कर रहा है और सहेज रहा है, तो इससे भी कई लोगों को दिक्कत है। यहीं से भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का चक्र भी लिया गया है। सारनाथ में जब सम्राट अशोक गये थे, तब उनके स्वागत के लिए इसे बनाया गया था।
राजकीय प्रतीक को लेकर क्या है कानून
इस मामले को लेकर जानकारों का साफ कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर भारत में कानून मौजूद है। राष्ट्रीय प्रतीक का इस्तेमाल कौन कर सकता है, इसे लेकर नियम बने हुए हैं। इस प्रतीक का इस्तेमाल संवैधानिक पद पर बैठे लोग ही कर सकते हैं। इसमें भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, राज्यपाल, उपराज्यपाल और उच्च अधिकारी शामिल हैं। यह भारत के राष्ट्रपति की आधिकारिक मुहर होती है। वहीं आइपीएस अधिकारी भी इसे अपनी टोपी में लगाते हैं। राष्ट्रीय चिह्नों का दुरुपयोग रोकने के लिए भारतीय राष्ट्रीय चिह्न (दुरुपयोग रोकथाम) कानून 2000 बनाया गया। इसे 2007 में संशोधित किया गया। इस कानून के मुताबिक अगर कोई आम नागरिक अशोक स्तंभ का उपयोग करता है, तो उसको दो साल की कैद या पांच हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। हालांकि कानून में यह भी स्पष्ट है कि सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों की डिजाइन में बदलाव कर सकती है।
नये अशोक स्तंभ पर हंगामा क्यूं है बरपा
सबसे पहले बात करते हैं, एआइएमआइएम के मुखिया और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की, जो पीएम मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पूजा करते देख कर भड़क गये। उन्होंने कहा कि संविधान संसद, सरकार और न्यायपालिका की शक्तियों को विभाजित करता है। ऐसे में सरकार के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नये संसद भवन के शीर्ष पर राजकीय प्रतीक का अनावरण नहीं करना चाहिए था। उन्होंने दावा किया कि लोकसभा के स्पीकर लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह सरकार के अधीन नहीं हैं। वे यहीं नहीं रूके। उन्होंने तो उस कार्यक्रम में पीएम मोदी की मौजूदगी पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने पीएम मोदी पर सभी संवैधानिक मान्यताओं की धज्जियां उड़ाने के आरोप मढ़ दिये। इस पर कुछ कथित लिबरल ने जोड़ा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने घर में प्रार्थना करनी चाहिए और अगर वह खुले में प्रार्थना करना चाहते हैं, तो यह भारतीय संघ का कोई आधिकारिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। उन्होंने उन्हें बार-बार ऐसा अपराध करनेवाला बता दिया और कहा कि यह स्पष्ट रूप से गलत है।
यह अजीबो-गरीब तर्क है। असदुद्दीन ओवैसी और तथाकथित सेक्यूलर लोग क्यों यह भूल जाते हैं कि देश के लोगों के रग-रग में पूजा-पाठ और भाषा-संस्कृति रची बसी है। यहां हर नये काम और नये अवसर पर हर समुदाय पूजा-पाठ, अरदास करता रहा है। आखिर अशोक स्तंभ के अनावरण के अवसर पर प्रधानमंत्री के पूजा पाठ का विरोध कर ओवैसी अपनी किस मानसिकता को दर्शाना चाहते हैं। वह क्यों भूल जाते हैं कि भारतीय संविधान में भगवान राम का चित्र है। आखिर वह भारतीय संस्कृति और रीति-रिवाज के हिसाब से हुए अनावरण का विरोध कर क्या दर्शाना चाह रहे हैं।
दुनिया जानती है कि भारत देव-पुराणों और उपनिषदों की धरती है। रामायण-महाभारत की धरती है। ऐसे में इन प्राचीन ग्रंथों के हिसाब से यहां कार्य नहीं होगा, तो भला कहां होगा? वेदों के देश में वैदिक नहीं, तो क्या अरब के रीति-रिवाज चलेंगे? सनातन की धरती पर क्या शरिया के हिसाब से चीजें होंगी? यहां तक कि सभी जानते हैं कि दुनिया का सबसे पुराना और मजबूत लोकतंत्र अमेरिका के राष्ट्रपति भी बाइबिल पर हाथ रख कर शपथ लेते हैं। अमेरिका एक इसाई बहुल देश है। वहां तो इसाइयत का जन्म भी नहीं हुआ था, जबकि सनातन भारत में ही प्रकट हुआ और यहीं फला-फूला। फिर यहां किसी काम के आरंंभ में पूठा-पाठ नहीं होगा, तो कहां होगा।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या इन विरोधियों को पता भी है कि इस अशोक स्तंभ को स्थापित करने में कितनी मेहनत लगी है? जिन कर्मचारियों और कामगारों की बदौलत यह संभव हुआ, अनावरण कार्यक्रम में उन्हें भी आमंत्रित किया गया था और पीएम मोदी ने उनसे बातचीत भी की। आठ चरणों में इसका कार्य पूरा हुआ है, जिसमें मिट्टी का मॉडल बनाने से लेकर कंप्यूटर ग्राफिक्स तैयार करना और कांस्य की इस आकृति को पॉलिश करना शामिल है। इसे सहारा देने के लिए साढ़े छह हजार किलोग्राम की स्टील की संरचना इसके आसपास बनायी गयी है।
लेकिन मोदी के हर काम में खोट निकालनेवालों को भला पूजा-पाठ से दिक्कत न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? माकपा ने तुरंत बयान जारी कर दिया कि धार्मिक कार्यक्रमों को राजकीय प्रतीक के अनावरण से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। पार्टी ने दावा किया कि यह सबका प्रतीक है, न कि किसी खास धार्मिक विचार को माननेवालों का। साथ ही राष्ट्रीय समारोहों से धर्म को अलग रखने की बात की। विपक्ष के इस आरोप पर भाजपा ने भी कड़ा प्रतिवाद किया है। उसका कहना है कि कितना अजीब है न? इसे स्थापित करवाने वाले सम्राट अशोक ने भले ही इसे धर्म स्तंभ कहा हो, आज वामपंथी इसमें से धर्म हटाने की वकालत कर रहे हैं। वहीं कामगार एवं कर्मचारी कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ उदित राज भी पूरी तरह भड़क गये और पूछ दिया कि क्या राजकीय प्रतीक भाजपा का है? उन्होंने कहा कि हिंदू रीति-रिवाज से सब कुछ हुआ, जबकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। उन्होंने पूछा कि अन्य राजनीतिक दलों को क्यों नहीं आमंत्रित किया गया? तो इसका जवाब भाजपा यह कह कर दे रही है कि जो अभी से ही भारतीय संस्कृति का अपमान कर रहे हैं और राजकीय प्रतीक को भला-बुरा कह रहे हैं, उन्हें भला इस कार्यक्रम में क्यों बुलाया जाये? आप नेता संजय सिंह से लेकर समाजवादी पार्टी के आइपी सिंह तक, सबने राजकीय प्रतीक का अपमान किया। भाजपा का कहना है कि क्या इन नेताओं ने कभी राष्ट्रपति भवन में इफ्तार पार्टियों पर आवाज उठायी? टोपी पहन-पहन कर इफ्तार पार्टियां करनेवाले ये नेता आज कह रहे हैं कि पीएम मोदी पूजा न करें। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति रहते परिसर में होनेवाली इन इफ्तार पार्टियों पर रोक लगायी। भाजपाइयों का कहना है कि करदाताओं के पैसे से इफ्तार हो सकता है, लेकिन भारत में भारतीय संस्कृति नहीं चलेगी, विरोधियों का यही मानना है।
वैसे भारतीय संस्कृति के विरोध में खुद को दलितों का चिंतक बताने वाले सामने न आयें, तो विरोध अधूरा है। ऐसे लोगों ने ब्राह्मणों को भला-बुरा कहते हुए इसे पाखंड बता दिया। तो फिर क्या सम्राट अशोक द्वारा हजारों स्तूपों और विहारों का निर्माण करवाना भी पाखंड था? बौद्ध धर्म की झूठी कसम खाने वाले इन फर्जी दलित चिंतक ने डर जताया कि बौद्ध धर्म को हड़पा जा रहा है। विश्व के सबसे लोकप्रिय बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा पीएम मोदी की प्रशंसा करते हैं, फर्जी दलित चिंतक विरोध।
यह बौद्धिक जुगाली ही है
मां काली को शराब पीने और मांस खाने वाली देवी बताने वाली तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने ट्वीट कर लिखा कि ‘सच कहा जाये, सत्यमेव जयते से सिंहमेव जयते में बदलाव लंबे समय से आत्मा में पूरा हो रहा है।’ आसान शब्दों में कहा जाये, तो नये संसद भवन की छत पर लगाये जाने वाले राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न के अनावरण के बाद से ही अशोक स्तंभ के शेरों की सौम्यता को लेकर बौद्धिक जुगालियां चल रही हैं। वैसे जिस महुआ मोइत्रा ने मां काली को भी नहीं छोड़ा और उन पर अभद्र टिप्पणी कर डाली, उनसे और उम्मीद ही क्या की जा सकती है। अशोक स्तंभ विवाद में राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न से छेड़छाड़ की बात कहते हुए इसे अपराध बताया जा रहा है। खैर, छेड़छाड़ तो की गयी है, लेकिन छेड़छाड़ इसकी तस्वीरों के एंगल के साथ हुई है। अशोक स्तंभ के शेरों की सोशल मीडिया पर जो तस्वीर वायरल हो रही है, वह नीचे की ओर से खींची गयी है, जिससे राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न के सिंहों का मुंह ज्यादा बड़ा और खुला हुआ नजर आ रहा है, जबकि सामने से ली गयी तस्वीरों और अशोक स्तंभ की अन्य कृतियों में भी शेरों का मुंह ऐसा ही है। आसान शब्दों में कहें, तो ‘सौम्य’ और ‘शांत’ शेरों की परिकल्पना वैसे लोग कर रहे हैं, जो कहते हैं कि सत्ता हमेशा बंदूक की नली से निकलती है। ये ऐसे लोग हैं, जो अनावश्यक विवाद पैदा कर ही सुर्खियों में बना रहना चाहते हैं। अब इनमें जनता के बीच जाने का माद्दा ही नहीं बचा है। लोगों से जुड़े मुद्दों की राजनीति यह करना नहीं चाहते, ऐसे में विवाद खड़ा करना ही इनका मुख्य हथियार हो गया है और इस हथियार की बदौलत वह जनता के बीच अपना चेहरा चमकाना चाहते हैं।
सरकार और मूर्ति बनानेवालों का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय चिह्न में कोई बदलाव नहीं किया गया है। सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि सारनाथ का अशोक स्तंभ 1.6 मीटर लंबा है और संसद की नयी इमारत पर लगाया गया स्तंभ 6.5 मीटर लंबा है, सारनाथ के अशोक स्तंभ से चार गुना लंबा होने और फोटो खींचने के कोण की वजह से शेर आक्रामक दिख रहे हैं। सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं का कहना है कि सौंदर्य की तरह ‘शांति और आक्रोश’ लोगों की आंखों में होता है। वहीं राष्ट्रीय चिह्न बनाने वाले कलाकार सुनील देवरे का कहना है कि इसकी डिजाइन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। उनका कहना है कि मूल आकृति से बड़ी मूर्ति नीचे से देखने में अलग लग सकती है। वहीं, मूर्तिकार लक्ष्मण व्यास ने कहा कि नये स्तंभ का आकार सारनाथ की तुलना में काफी बड़ी है। शायद इस वजह से लोगों को ये अलग लग रही है। अगर इसी को छोटा करके देखें तो इसमें और सारनाथ के स्तंभ में कोई अंतर नहीं दिखेगा।
इस पूरे प्रकरण में आखिरी सवाल तो यह बनता है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी से लेकर अपने परसेप्शन और परिकल्पनाओं को संविधान की ओर से दिया गया अधिकार बताया जाता है। मां काली को शराब पीने वाली और मांस खाने वाली देवी बताने वाली महुआ मोइत्रा अपने इस परसेप्शन पर आखिरी दम तक टिकी रहने की बात कर रही हैं। रचनात्मक आजादी की बात करनेवालों ने अपने परसेप्शन के हिसाब से ही मां काली को सिगरेट पीते और समलैंगिक समुदाय का झंडा पकड़े दिखाया था, तो अशोक स्तंभ को डिजाइन करने वाले कलाकार के लिए रचनात्मक आजादी को मजबूत किया जाने वाला यह परसेप्शन कहां गायब है?