- खुलासा : कांग्रेस के शासनकाल में फर्श से अर्श तक पहुंच गयीं सामाजिक कार्यकर्ता
- तीस्ता शीतलवाड़ के इस चेहरे को भी आप पहचानिये
- आखिर इतनी हिम्मत कहां से हासिल की शीतलवाड़ ने
तीस्ता सीतलवाड़। भारत ही नहीं, दुनिया भर में सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम, लेकिन हाल के दिनों में इस महिला का, जो देश के पहले अटॉर्नी जनरल की पोती है, जो खतरनाक रूप सामने आया है, उसने सामाजिक कार्यकर्ताओं की पूरी जमात को शक के दायरे में ला दिया है। धर्मनिरपेक्षता और समाज सेवा के नाम पर सत्ता और न्यायपालिका का समानांतर तंत्र चलानेवाली तीस्ता के बारे में जो जानकारी सामने आयी है, उससे पता चलता है कि वह केवल भारतीय राजनीति की धारा को प्रभावित करने की ही फिराक मेंं नहीं थी, बल्कि सियासत को अपनी विचारधारा के हिसाब से हांकने की साजिश की सूत्रधार भी है। गुजरात दंगों में संदिग्ध भूमिका निभाने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गिरफ्तार की गयीं तीस्ता सीतलवाड़ पर 20 साल पहले गुजरात की तत्कालीन सरकार को अस्थिर करने की साजिश रचने का भी आरोप लगा है। इतनी सारी साजिशों की सूत्रधार इस महिला ने आखिर इतनी पहुंच और इतना प्रभाव कहां से हासिल कर लिया, यह एक अलग जांच का विषय हो सकता है, लेकिन इतना तय है कि अपनी एक आवाज पर आधी रात को न्यायालय को खुलवाने की हैसियत रखनेवाली यह महिला एकदम मामूली तो नहीं ही हो सकती है। तीस्ता सीतलवाड़ का काम चाहे कुछ भी रहा हो, उन्होंने समाज की चाहे जितनी सेवा की हो, हाल के दिनों में उनके खिलाफ जो आरोप लगे हैं, उनके घेरे से बाहर निकलना भी उनके लिए अब कठिन हो गया है। तीस्ता सीतलवाड़ के बारे में विभिन्न पहलुओं की जानकारी देती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।
बात शुरू करते हैं सोनिया गांधी के खासमखास रहे कांग्रेस के दिवंगत नेता अहमद पटेल से। गुजरात दंगों की जांच कर रही एसआइटी की रिपोर्ट में उनके ऊपर तीस्ता शीतलवाड़ को 30 लाख रुपये देने का आरोप लगा है। तीस्ता शीतलवाड़ पर एक निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने की साजिश रचने का आरोप है। इसके साथ ही इस तथाकथित सोशल एक्टिविस्ट पर कानूनी शिकंजा कस गया है। यहां तथाकथित इसलिए लिखा गया है, क्योंकि अंग्रेजीदां इलीट लोगों की एक लॉबी उन्हें सोशल एक्टिविस्ट कहती है, लेकिन सात-आठ साल तक तीस्ता के साथ काम करनेवाले रईस खान का कहना है कि वह सोशल एक्टिविस्ट नहीं, बल्कि नफरत फैलाने का धंधा करती हंै।
तीस्ता शीतलवाड़ पर 20 साल पहले गुजरात की निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया है। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस से दो किस्तों में 30 लाख रुपये भी लिये। इसके अलावा उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाने का भरोसा भी मिला था। यह आरोप गुजरात दंगों की साजिश की जांच कर रही एसआइटी ने अदालत को दिये गये हलफनामे में लगाया है। ये आरोप तीस्ता शीतलवाड़ के एक सर्वथा नये अवतार को सामने लाते हैं और उनका यह अवतार कीचड़ से लथपथ है। तीस्ता शीतलवाड़ को गुजरात के दंगों को राजनीतिक रंग देने की साजिश के तहत झूठे हलफिया बयान और झूठी गवाहियां बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इससे पहले जब भी उन्हें गिरफ्तार किया गया, एक लॉबी इतनी सक्रिय हो जाती थी कि दुनिया भर में शोर मचता था और उस शोर में अदालतें भी प्रभावित हो जाती थीं। अब पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है, क्योंकि उन्होंने झूठे हलफिया बयान बनवा कर 20 साल तक कानून के साथ खिलवाड़ किया।
तीस्ता की कहानी, रईस खान की जुबानी
तीस्ता शीतलवाड़ के एक्टिविज्म की कहानी 2002 के दंगों से शुरू नहीं होती, बल्कि 1999 से शुरू होती है, जब सोनिया गांधी और जयललिता ने मिल कर वाजपेयी सरकार गिरा दी थी और लोकसभा के चुनाव होनेवाले थे। तब तीस्ता शीतलवाड़ के पति जावेद आनंद ने कंबेट कम्युनलिज्म नाम से एक मैगजीन निकाली थी। यह मैगजीन भाजपा को सत्ता से दूर रखने के एकमात्र उद्देश्य से निकाली गयी थी। कहते हैं कि इस मैगजीन के लिए कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों ने जावेद और तीस्ता शीतलवाड़ को डेढ़ करोड़ रुपया मुहैया करवाया था। फरवरी 2002 में जब गोधरा में 59 कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया और उसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में दंगे शुरू हुए, तो तीस्ता शीतलवाड़ ने दंगों की साजिश रचने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने का बीड़ा उठाया। रईस खान ने खुलासा किया है कि जब दंगे चल रहे थे, तब सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहाकार अहमद पटेल अहमदाबाद आये थे। तीस्ता शीतलवाड़ और वह सर्किट हाउस में उन्हें मिलने गये। तब अहमद पटेल ने कहा कि उन्हें पैसे की कोई कमी नहीं आने दी जायेगी। वह इस काम में जी जान से जुट जायें। अहमद पटेल ने तुरंत अहमदाबाद के होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष को बुलाया और तीस्ता शीतलवाड़ को पांच लाख रुपये नगद दिलवाये।
बाद में तीस्ता शीतलवाड़ और रईस खान दिल्ली आये, तो उन्हें वीपी हाउस में ठहराया गया और सोनिया गांधी से मुलाकात करवायी गयी। सोनिया गांधी ने भी उन्हें आश्वासन दिया कि इस काम के लिए उन्हें पैसे की कोई कमी नहीं आने दी जायेगी। इस साजिश के सबूत कुछ तथ्यों से मिलते हैं। दंगों के बाद 2002 में ही कांग्रेस ने तीस्ता शीतलवाड़ को राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित किया था। बाद में जब कांग्रेस केंद्र में सत्ता में आ गयी तो 2006 में उन्हें प्रतिष्ठित नानी पालखीवाला पुरस्कार और 2007 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।
बाबरी का काम देख तीस्ता को मिला था ठेका
गुजरात दंगों के बाद मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए रची गयी साजिश मामले में तीस्ता शीतलवाड़ की भूमिका पर उनके पूर्व सहयोगी रईस खान पठान ने बड़ा बयान दिया है। पठान ने कहा है कि जब पटेल ने तीस्ता को रुपये दिये थे, उस समय वह उसी जगह मौजूद थे। उनके सामने ही यह 30 लाख रुपये की लेन-देन हुई थी। बकौल पठान, जो बात सामने आ रही 30 लाख रुपयों की, वो बिलकुल दंगों के शुरूआती दिनों की बात है। तीस्ता बहुत पहले से अहमद पटेल को जानती थीं। लेकिन जब दंगे हुए, उसके कुछ दिन बाद की मुलाकात शाही बाग के सर्किट हाउस में हुई थी। वहां उनके साथ मैं भी गया था। उस मुलाकात में पटेल ने तीस्ता को कहा था, आपको मैं अच्छे से जानता हूं। आपके कामों से मैं अच्छे से वाकिफ हूं। आपने बाबरी मस्जिद-राम मंदिर पर जो भूमिका निभायी है, उससे भी मैं बखूबी वाकिफ हूं। लेकिन अभी हम सत्ता में नहीं हैं। पठान के अनुसार, अहमद पटेल से तीस्ता की लंबी बातचीत के बाद शीतलवाड़ ने कहा कि उनके पास फंड नहीं हैं और फंड की कमी हुई तो वे लोग काम नहीं कर पायेंगे, क्योंकि गुजरात में जो कुछ हुआ है, वह बहुत बड़ा है। पठान के मुताबिक अहमद पटेल ने शीतलवाड़ की बात सुनने के बाद कहा, आप अपने काम को जारी रखिये। काम को आगे बढ़ाइये। रहा फंड का सवाल, तो आप बेफिक्र हो जाइये, क्योंकि फंड आपको मिल जायेगा। हमारी पार्टी तो आपको जितना हो सकेगा, फंड देगी, लेकिन साथ में आपको देश-विदेश की एजेंसियों से भी फंड आयेंगे। इसके बाद शीतलवाड़ ने कहा कि जब आप आश्वासन दे रहे हैं, तो ठीक है। आप जैसा चाहेंगे, हम वैसा काम करेंगे।
2002 में केंद्र से 1.40 करोड़ रुपये मिले
तीस्ता शीतलवाड़ ने नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा करने के लिए 2002 में ही अपना एनजीओ बनाया था, जिसे बाद में कांग्रेस की यूपीए सरकार ने 1.40 करोड़ रुपये सरकारी फंड से दिये। तीस्ता शीतलवाड़ का काम तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराने और भाजपा सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने की कहानियां गढ़ने का था। अहमद पटेल ने दिल्ली में तीस्ता शीतलवाड़ को उन पत्रकारों से भी मिलवाया था, जो इस काम में उसके साथ को-आर्डिनेट करनेवाले थे। इनमें टीवी चैनलों के पत्रकार, प्रिंट मीडिया के पत्रकार और कुछ विदेशी मीडिया के लिए काम करनेवाले पत्रकार भी थे। इस तरह एक लॉबी खड़ी की गयी, जिसका काम न सिर्फ मोदी को टारगेट करना था, बल्कि 2004 के लोकसभा चुनाव को भी टारगेट करना था।
कैसे तीस्ता शीतलवाड़ ने दर्जनों हलफिया बयान तैयार कराये
आपको याद होगा, उस समय एक खबर बहुत चलायी गयी थी कि एक गर्भवती औरत के पेट में छुरा घोंप कर मार दिया गया। वह खबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदुओं के खिलाफ प्रचार करने के लिए इस्तेमाल की गयी थी, लेकिन वह खबर तीस्ता शीतलवाड़ और उसके सहयोगी पत्रकारों की गढ़ी हुई झूठी खबर निकली। बाद में उस औरत का इलाज करनेवाले डॉक्टर ने बताया था कि वह औरत आग लगने से मरी थी। इसी तरह अनेक महिलाओं के रेप की खबरें प्रचारित की गयी थीं। एक महिला के रेप का हलफिया बयान सुर्खियां बना था, लेकिन उस महिला ने कोर्ट में कहा कि उसके साथ कोई रेप नहीं हुआ। यह हलफिया बयान तीस्ता शीतलवाड़ ने बनवाया था। उसे अंगरेजी नहीं आती, इसलिए उसने बिना पढ़े दस्तखत कर दिये थे। उस महिला ने बाद में तीस्ता शीतलवाड़ को फोन करके उसे फटकार लगायी थी कि उसने झूठा हलफिया बयान क्यों बनवाया था, वह एक शादीशुदा महिला है। इसी तरह के दर्जनों हलफिया बयान पर लोगों को अंधेरे में रख कर दस्तखत करवाये गये और अदालत में पेश किये गये।
कुतुबुद्दीन अंसारी की तस्वीर का इस्तेमाल
आपको कतुबुद्दीन अंसारी का दंगाइयों से रहम की भीख मांगनेवाला वह फोटो याद होगा। उस कतुबुद्दीन अंसारी को केंद्रीय सुरक्षा बलों ने सुरक्षित बचाया था, लेकिन कांग्रेस ने हर चुनाव में उसके फोटो का इस्तेमाल किया। जब हाल ही में असम विधानसभा चुनाव में उसकी तस्वीर फिर इस्तेमाल की गयी, तो उसने कहा कि वह उस दिन मर ही क्यों नहीं गया। कांग्रेस उसे हर चुनाव में मारती है। इस तरह तीस्ता शीतलवाड़ और मीडिया की एक लॉबी ने कांग्रेस और कम्युनिस्टों के साथ मिल कर सोची-समझी रणनीति के तहत मोदी, भाजपा, गुजरात और भारत को बदनाम करने की योजना पर काम किया। रईस खान ने खुलासा किया है कि तीस्ता शीतलवाड़ को अमेरिका, इंग्लैंड और अरब देशों से भी बहुत पैसा आया।
तीस्ता के निशाने पर भाजपा और मोदी थे
दंगों में मारे गये मुसलमानों के परिजनों की तरफ से नरेंद्र मोदी के खिलाफ एफआइआर तक दर्ज करवाने की साजिश में भी तीस्ता शीतलवाड़ शामिल थी। लेकिन इस साजिश में दो आइपीएस पुलिस अफसर भी सहयोगी थे। उनमें से एक संजीव भट्ट एक अन्य मामले में पहले से जेल में हैं और दूसरे आइपीएस अफसर आरबी श्रीकुमार को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। असल में इन दोनों की गिरफ्तारी का रास्ता सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से खुला, जिसमें नरेंद्र मोदी पर आरोप खारिज करते हुए उन्हें झूठे मुकदमों में फंसानेवालों के खिलाफ कार्रवाई किये जाने की बात कही गयी है। ये तीनों गुजरात के कांग्रेस नेताओं गुजरात विधानसभा में तत्कालीन विपक्ष के नेता शक्ति सिंह गोहिल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोढ़वाडिया के संपर्क में थे। संजीव भट्ट लगातार कोशिश कर रहे थे कि तमाम एनजीओ के जरिये मामले को प्रभावित करने के लिए मीडिया कार्ड खेला जाये। तीस्ता शीतलवाड़ संजीव भट्ट के लगातार संपर्क में थीं। तीस्ता ने ही एडवोकेट एमएम तिरमिजी के साथ झूठे हलफनामे तैयार कराये थे। फिर पहले से टाइप किये गये हलफनामों पर जाकिया जाफरी और अन्यों के हस्ताक्षर लिये गये। शीतलवाड़ ने कई तरीकों से गवाहों को प्रभावित भी किया। इन तीनों ने पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी को मोदी के खिलाफ केस लड़ने के लिए भड़काया और केस लड़ने की पूरी जिम्मेदारी खुद ली। जाकिया जाफरी ने 2006 में नरेंद्र मोदी और 62 अन्य को दंगों का आरोपी बनाते हुए एफआइआर दर्ज करवायी थी। उस समय एक झूठी खबर यह प्रसारित की गयी थी कि पूर्व सांसद एहसान जाफरी ने दंगाइयों से बचाने के लिए नरेंद्र मोदी को फोन किया था, लेकिन मोदी ने उन्हें बचाने के लिए पुलिस भेजने की बजाय एहसान जाफरी को गालियां दीं, जबकि एहसान जाफरी ने नरेंद्र मोदी को कोई फोन किया था, इसका रिकॉर्ड कहीं नहीं मिला।
एसआइटी ने नरेंद्र मोदी को पहले ही क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन तीस्ता शीतलवाड़ ने अपनी आखिरी मुहिम को जारी रखते हुए जाकिया जाफरी से एसआइटी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिलवायी। वही चुनौती अब तीस्ता शीतलवाड़ के लिए मुसीबत बन गयी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में न सिर्फ एसआइटी की ओर से मोदी को दी गयी क्लीन चिट को बरकरार रखा, बल्कि एसआइटी के काम की तारीफ भी की है। कोर्ट ने कहा कि राज्य प्रशासन के कुछ अधिकारियों की लापरवाही का मतलब यह नहीं है कि दंगों के पीछे राज्य प्रशासन की साजिश थी। कोर्ट ने मोदी और अन्य को फंसाने के लिए झूठी गवाही देनेवाले आइपीएस अधिकारियों, आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट को भी फटकारा। कोर्ट ने कहा कि उन आरोपों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं हैं कि गोधरा कांड के बाद हुई हिंसा सुनियोजित साजिश का नतीजा थी। लेकिन तीस्ता शीतलवाड़ जैसे लोगों ने लगातार इसे सुनियोजित साबित करने की साजिश रची और अब सुप्रीम कोर्ट ने ही उनकी साजिश का पर्दाफाश कर दिया है।
कौन हैं तीस्ता शीतलवाड़
तीस्ता शीतलवाड़ एक कथित नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। वह सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस की सचिव हैं, जो 2002 के गुजरात दंगों की वकालत करने के लिए बनायी गयी एक संस्था है। साल 2002 में हुए गुजरात दंगों को लेकर एसआइटी की रिपोर्ट में भारतीय नागरिक अधिकार कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ और पूर्व डीजीपी की भूमिका पर सवाल उठाये गये हैं। इसके बाद गुजरात एसआइटी ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया है। अहमदाबाद डिटेक्शन आॅफ क्राइम ब्रांच ने सेवानिवृत्त राज्य डीजीपी आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार कर लिया, जबकि कोर्ट में जकिया जाफरी की याचिका का समर्थन करनेवाली मुंबई की कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ को गुजरात एटीएस ने गिरफ्तार किया है।
61 साल की तीस्ता के दादा एमसी शीतलवाड़ देश के पहले अटॉर्नी जनरल थे। उनका एक बेटा जिब्रान और बेटी तामारा है। तीस्ता की सारी पढ़ाई मुंबई में ही हुई। तीस्ता का दावा है कि वह गुजरात में भड़के दंगों में मारे गये लोगों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत हैं। पैसे में गड़बड़ करने के कथित आरोप में उनके खिलाफ गिरफ्तारी के आदेश भी गुजरात हाइकोर्ट ने दिये थे। तीस्ता पहले पत्रकार थीं। उसके बाद वह सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में एक्टिव हो गयीं। उनके पति जावेद और गुजरात हिंसा में मारे गये कांग्रेस नेता एहसान जाफरी के बेटे तनवीर पर वर्ष 2002 के दंगों की शिकार गुलबर्ग सोसाइटी में संग्रहालय बनाने के नाम पर एकत्र चंदे के गबन का आरोप है। गुलबर्ग सोसायटी के ही एक निवासी ने तीस्ता, उनके पति और अन्य लोगों के खिलाफ अपराध शाखा में मामला दर्ज कराया था। इन पर आरोप है कि इन लोगों ने म्यूजियम के नाम पर मोटा पैसा खुद पर खर्च कर लिये। हलफनामे में गुलबर्ग सोसाइटी के निवासी फिरोजखान पठान की प्राथमिकी की जांच के दौरान सामने आये व्यक्तिगत उपयोग के लिए धन के कथित दुरुपयोग का भी उल्लेख है। इसने दावा किया कि सीजेपी के आइडीबीआइ बैंक खाते में 63 लाख रुपये और यूनियन बैंक आॅफ इंडिया के सबरंग ट्रस्ट के खाते में 88 लाख रुपये जमा किये गये और कथित तौर पर हेराफेरी की गयी।
तीस्ता ने दावा किया था: तीन दिन के अंदर गुजरात सरकार को देना होगा इस्तीफा
राज्य सरकार को अस्थिर करने के राजनीतिक मकसद के अपने दावे को और पुष्ट करने के लिए हलफनामे में 2006 में पंचमहल के पंडारवाड़ा में दंगा पीड़ितों के शवों को निकालने के बाद दिये गये शीतलवाड़ के बयान का भी हवाला दिया गया था। उन्होंने मीडिया से कहा था कि गुजरात सरकार को तीन दिन के अंदर इस्तीफा देना होगा।
जावेद अख्तर सांसद तो मैं क्यों नहीं?
एसआइटी ने आरोप लगाया कि 2007 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने शीतलवाड़ को पद्मश्री से नवाजा। जांच एजेंसी ने उन पर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को हासिल करने के लिए ये प्रयास करने का आरोप लगाया और कहा कि वह राज्यसभा सदस्य बनना चाहती थीं। एसआइटी ने एक गवाह का हवाला दिया, जिसने दावा किया कि शीतलवाड़ ने एक राजनीतिक शख्सियत से पूछा था कि शबाना आजमी और जावेद अख्तर को सांसद क्यों बनाया गया और उस पर क्यों नहीं विचार किया गया। जावेद-शबाना दोनों मियां बीबी को मौका मिला? मुझे राज्यसभा का सदस्य क्यों नहीं बनाया गया।
आखिर इतनी ताकत कहां से आयी तीस्ता के पास
इन तमाम तथ्यों के बाद यह सवाल तो बनता ही है कि आखिर तीस्ता शीतलवाड़ के पास इतनी ताकत कहां से आ गयी। कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति और कम्युनिस्टों की खारिज हो चुकी विचारधारा ने उन जैसे भारत के सैकड़ों कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आर्थिक और बौद्धिक मदद दी, जो एक तरह से देश के हितों के खिलाफ ही गया। ऐसे में अब जब ऐसे तत्वों की कारगुजारियां सामने आ रही हैं, इन्हें राजनीतिक कुचक्र बताया जा रहा है। यही भारत का दुर्भाग्य है।