पेसा कानून आदिवासियत का वह संरक्षक है, जिसे किसी भी स्थिति में कमतर नहीं आंका जा सकता
आधुनिक लोकतंत्र को आदिवासी स्वशासन की परंपरा से जोड़ता है पेसा
पेसा में ग्रामसभा और परंपरागत संस्थाएं ही स्थानीय शासन का केंद्र होंगी
राकेश सिंह
झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार द्वारा राज्य में पेसा, यानी अनुसूचित क्षेत्रों तक पंचायत का विस्तार कानून लागू करने और इसकी नियमावली बनाने के बाद से यह सवाल उठ रहा है कि इससे झारखंड में क्या बदलेगा। वास्तव में पेसा कानून आदिवासियत का वह संरक्षक है, जिसे किसी भी स्थिति में कमतर नहीं आंका जा सकता है।
आदिवासियत कोई पहचान-पत्र नहीं, कोई जातीय वर्गीकरण नहीं और न ही केवल सांस्कृतिक विविधता का उत्सव है। आदिवासियत एक जीवन-दर्शन है— जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध शोषण का नहीं, सहअस्तित्व का होता है, जिसमें सत्ता ऊपर से नहीं उतरती, बल्कि समुदाय के बीच से उगती है और जिसमें लोकतंत्र पांच साल में एक बार मत डालने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि रोजमर्रा के सामूहिक निर्णयों का अभ्यास है।
आज जब आदिवासी समाज अपने जल, जंगल और जमीन पर अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है, तब यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र के पास आदिवासियत को समझने और संरक्षित करने का कोई संवैधानिक औजार है?
इस प्रश्न का उत्तर है पेसा यानी पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996। यह कोई सामान्य पंचायत कानून नहीं है। यह कानून उन क्षेत्रों के लिए बना है, जहां भारतीय राज्य ने यह स्वीकार किया कि वहां की सामाजिक संरचना, शासन परंपरा और संसाधन-संबंध मुख्यधारा से भिन्न हैं।
पेसा का जन्म संविधान की पांचवीं अनुसूची से हुआ है— जो स्वयं इस स्वीकारोक्ति का प्रमाण है कि आदिवासी समाज को सामान्य प्रशासनिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
पेसा का मूल विचार सरल है, लेकिन क्रांतिकारी— ग्रामसभा सर्वोच्च है। पंचायतें, प्रशासन और विभाग— सब ग्रामसभा के अधीन हैं। यही वह बिंदु है, जहां पेसा आधुनिक लोकतंत्र को आदिवासी स्वशासन की परंपरा से जोड़ता है।
पेसा को केवल एक पंचायत कानून के रूप में देखना इसकी आत्मा को नकारना है। पेसा इसलिए आदिवासियत का सबसे बड़ा संरक्षक है, क्योंकि यह संसाधनों के उपयोग पर लोक-समझ का सम्मान करता है, परंपरागत शासन को वैधानिक दर्जा देता है, संस्कृति और पहचान को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है और देशज और स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास के मॉडल चुनने का अधिकार समुदाय को देता है।
पेसा पहली बार भारतीय संसद द्वारा यह स्वीकारोक्ति है कि आदिवासी जीवन-तत्व, जैसे सामुदायिकता, प्रकृति-निष्ठ जीवन, ग्रामसभा केंद्रित स्वशासन, परंपरागत नियम और संसाधनों पर सामूहिक निर्णय— को केवल सांस्कृतिक विशेषता नहीं, बल्कि मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार माना जाना चाहिए।
आदिवासियत: व्यवस्था नहीं, जीवन-पद्धति
आदिवासियत उस सभ्यता का नाम है, जिसकी जड़ें धरती के साथ साझेदारी में हैं, स्वामित्व में नहीं, सह जीवन में। इस जीवन-पद्धति के तीन मूल स्तंभ हैं। पहला, संसाधनों का सामूहिक स्वामित्व। दूसरा, निर्णय का अधिकार ग्रामसभा को। तीसरा, पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा को सामुदायिक उत्तरदायित्व के रूप में देखना। आदिवासी समाज में जंगल केवल लकड़ी का भंडार नहीं, नदी केवल पानी का स्रोत नहीं और जमीन केवल संपत्ति नहीं है— ये सब जीवन के साझीदार हैं। पेसा इन्हीं मूल स्तंभों को आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में वैधानिक आधार देता है।
आदिवासी समाज ने कभी ‘राज्य’ को अपने जीवन का केंद्र नहीं माना। उनके लिए शासन का अर्थ था— गांव का सामूहिक विवेक। मुंडा समाज में मुंडा-मानकी, संथाल समाज में मांझी-परगना, गोंड समाज में गोटुल आधारित नेतृत्व, ये सभी व्यवस्थाएं बिना लिखित संविधान के भी लोकतांत्रिक थीं। निर्णय खुले में होते थे, सहभागिता अनिवार्य थी, और संसाधनों पर व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक अधिकार था। औपनिवेशिक शासन ने इन व्यवस्थाओं को ‘असभ्य’ कहकर खारिज किया। स्वतंत्र भारत ने लंबे समय तक इन्हें ‘अप्रासंगिक’ मानकर नजरअंदाज किया। पेसा पहला कानून है, जिसने कहा कि परंपरागत संस्थाएं पिछड़ी नहीं, बल्कि वैध हैं।
पेसा का सबसे क्रांतिकारी सिद्धांत है- जो संसाधन ग्राम का है, उस पर निर्णय भी ग्रामसभा का ही होगा। इसी सिद्धांत के तहत पेसा भूमि अधिग्रहण पर ग्रामसभा की अनिवार्य अनुशंसा या सहमति की व्यवस्था करता है, खनन और खनिज परियोजनाओं पर ग्रामसभा को निर्णायक बनाता है, लघु वनोपज पर ग्रामसभा को मालिकाना अधिकार देता है और शराब जैसे सामाजिक मुद्दों पर अंतिम निर्णय का अधिकार ग्रामसभा को सौंपता है। ये शक्तियां कोई नयी देन नहीं हैं। ये वही अधिकार हैं, जो सदियों से आदिवासी परंपराओं में अंतर्निहित थे। पेसा दरअसल उन्हें पुनर्स्थापित करता है।
पेसा परंपरागत संस्थाओं को वैधानिक मान्यता देता है। मांझी-परगनैत, मुंडा-मानकी, परगना, देश परगना— ये केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि जीवित स्वशासन संस्थाएं हैं। पेसा पहली बार यह कहता है कि ग्रामसभा और परंपरागत संस्थाएं ही स्थानीय शासन का केंद्र होंगी। यह औपनिवेशिक सोच से स्पष्ट विच्छेद है, जिसने इन संस्थाओं को ‘अनौपचारिक’ कहकर हाशिये पर डाल दिया था।
आदिवासियत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है— गीत, नृत्य, मृत्यु संस्कार, विवाह, सामुदायिक श्रम, शिल्प और सामाजिक आचार। पेसा यह मानता है कि संस्कृति का संरक्षण कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व है।
यह ग्रामसभा को अधिकार देता है कि स्थानीय प्रथाओं को सर्वोपरि माना जाये। किसी भी कानून की व्याख्या स्थानीय संस्कृति के आलोक में की जाये। इससे आदिवासी समाज पहली बार एक एकीकृत सांस्कृतिक अधिकार का संवैधानिक संरक्षक पाता है।
विकास का वैकल्पिक मॉडल
अक्सर कहा जाता है कि पेसा विकास विरोधी है। यह एक सुनियोजित भ्रम है। पेसा विकास का विरोध नहीं करता, वह बिना सहमति के विकास का विरोध करता है। वह पूछता है कि क्या विकास का मतलब विस्थापन है? क्या विकास का अर्थ संस्कृति का विनाश है? आदिवासी समाज के लिए विकास का अर्थ है— शिक्षा जो संस्कृति से कटे नहीं, स्वास्थ्य जो बाजार पर निर्भर न हो, और रोजगार जो जमीन से बेदखल न करे। पेसा इसी विकास-दृष्टि का संवैधानिक रूप है।
पेसा कहता है कि विकास वही, जो स्थानीय समुदाय सही माने। यह आदिवासी विकास-दर्शन का मूल तत्व है— जन-केंद्रित, प्रकृति-सम्मत और समुदाय-संचालित विकास। यह मॉडल विस्थापन पर नहीं, सहमति पर आधारित है, मुनाफे पर नहीं, जीवन-गुणवत्ता पर केंद्रित है।
पेसा आदिवासियों को अधिकार नहीं देता, बल्कि उनसे छीने गये अधिकार लौटाता है। यही कारण है कि यह सामुदायिक शासन को पुनर्जीवित करता है, सांस्कृतिक नियमों को मान्यता देता है, पर्यावरण-न्याय को कानून बनाता है और परंपरागत नेतृत्व को संवैधानिक ढांचा देता है। यह संरक्षण केवल जमीन का नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, प्रकृति, समुदाय और सबसे बढ़कर जनसत्ता का है।
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि पेसा निवेश के रास्ते में बाधा है। वास्तविकता इसके उलट है। स्पष्ट नियम, ग्रामसभा की पूर्व-सहमति, सामाजिक प्रभाव आकलन और पारदर्शी पुनर्वास व्यवस्था— ये सभी निवेश को स्थिरता और भरोसा देते हैं। संघर्ष कम होते हैं, परियोजनाएं अटकती नहीं, और राज्य की साख मजबूत होती है। झारखंड में खनन, भूमि-अधिग्रहण और वनाधिकार विवाद ही सबसे बड़े संघर्ष उत्पन्न करते हैं। पेसा स्पष्ट करता है कि ग्रामसभा की पूर्व-सहमति, सामाजिक प्रभाव आकलन, पुनर्वास व्यवस्था के बिना कोई परियोजना आगे नहीं बढ़ेगी। ऐसे पारदर्शी नियम निवेशकों को भरोसा देते हैं, क्योंकि प्रक्रिया स्पष्ट है, स्थानीय विरोध कम है, परियोजना अवरुद्ध नहीं होती।
पेसा कानून आदिवासी क्षेत्रों में स्थिर शासन, शांति और पारदर्शिता का ढांचा बनाता है। यह परंपरागत संस्थाओं और पंचायत संरचना को जोड़कर दोनों की वैधता बढ़ाता है। राज्य की शक्ति कम नहीं होती — केवल स्थानीय निर्णय प्रक्रिया को अधिकार मिलता है। यह झारखंड के विकास और निवेश के लिए विश्वास-आधारित मॉडल तैयार करता है। भूमि विवाद, खनन संघर्ष और स्थानीय असंतोष जैसी समस्याएं घटेंगी। यह कानून झारखंड के आदिवासियों की सांस्कृतिक गरिमा और आर्थिक सुरक्षा दोनों को मजबूती देता है।
आज भारत का लोकतंत्र जिन संकटों से गुजर रहा है—केंद्रीकरण, संसाधन लूट, सांस्कृतिक एकरूपता—उनका उत्तर आदिवासियत में छिपा है और आदिवासियत का संवैधानिक संरक्षक है—पेसा। पेसा को लागू करना केवल आदिवासी समाज के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को मानवीय बनाने की शर्त है। यदि ग्रामसभा बचेगी, तो जंगल बचेंगे। यदि जंगल बचेंगे, तो संस्कृति बचेगी और यदि आदिवासियत बचेगी—तो लोकतंत्र बचेगा।
परंपरागत स्वशासन का समावेशन
पेसा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी अलग प्रशासन की मांग नहीं करता, बल्कि मौजूदा पंचायत राज ढांचे के भीतर परंपरा और संविधान का संतुलन स्थापित करता है। ग्रामसभा स्तर पर यह परंपरागत संस्थाओं को सीधा कानूनी दर्जा देता है। ग्राम पंचायत को ग्रामसभा के निर्णयों का क्रियान्वयनकर्ता बनाता है।
पंचायत समिति और जिला परिषद स्तर पर यह परंपरागत नेतृत्व को प्रतिनिधित्व देकर सहमति-आधारित योजना प्रणाली विकसित करता है। इससे टकराव नहीं, बल्कि सहयोग की राजनीति जन्म लेती है। इस तरह पेसा केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत समझौता है, राज्य और आदिवासी समाज के बीच।
यह समझौता कहता है कि विकास बिना गरिमा के नहीं होगा, और लोकतंत्र बिना ग्रामसभा के नहीं। आदिवासियत का संरक्षण दरअसल भारतीय लोकतंत्र का संरक्षण है और इस संरक्षण का सबसे मजबूत संवैधानिक स्तंभ है—पेसा।

