रांची। अंकुरम आइवीएफ ने गुरुवार को एक विशेष कार्यक्रम के तहत विश्व आइवीएफ दिवस और विश्व भ्रूण विज्ञान दिवस मनाया। इस कार्यक्रम का नेतृत्व अंकुरम आइवीएफ के विशेषज्ञ डॉ रूही श्रीवास्तव और डॉ राजनारायण साहू ने किया। डॉ रूही श्रीवास्तव ने आइवीएफ और भ्रूण विज्ञान में नवीनतम शोध और तकनीकी सुधारों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कैसे इन नवाचारों ने अनगिनत जोड़ों के लिए माता-पिता बनने के सपने को साकार किया है। डॉ राजनारायण साहू ने भ्रूण विज्ञान के महत्व और किसी भी आइवीएफ प्रक्रिया की सफलता में भ्रूण वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।
1978 में दुनिया की पहली आईवीएफ बच्ची लुइस ब्राउन का हुआ था जन्म
डॉ रूही श्रीवास्तव ने बताया कि 1978 में दुनिया की पहली आइवीएफ बच्ची लुइस ब्राउन के जन्म ने प्रजनन चिकित्सा में एक क्रांतिकारी क्षण को चिह्नित किया। हर साल 25 जुलाई को हम विश्व आइवीएफ दिवस मनाते हैं।
आइवीएफ तकनीक आधुनिक दुनिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती
डॉ रूही श्रीवास्तव ने बताया कि हाल के वर्षों में आइवीएफ तकनीक में महत्वपूर्ण प्रगति देखी गयी है, इसमें इंट्रा साइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आईसीएसआई), प्री इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (पीजीटी) और टाइम-लैप्स इमेजिंग शामिल हैं। इन तकनीकों ने न केवल सफलता दर में वृद्धि की है, बल्कि निसंतान दंपतियों के अनुभव को भी बेहतर बनाया है। आज आइवीएफ तकनीक आधुनिक दुनिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जहां निसंतानता की समस्याएं बढ़ रही हैं।
अंकुरम आइवीएफ में, निसंतान दंपतियों को सर्वोत्तम उपचार और सेवाएं प्रदान की जाती है। अत्याधुनिक तकनीक और अनुभवी टीम हर जोड़े के लिए एक व्यक्तिगत और सर्वोत्तम अनुभव सुनिश्चित करती है। अंकुरम आइवीएफ का मानना है कि हर जोड़े को माता-पिता बनने की खुशी का अनुभव करने का अवसर मिलना चाहिये और इस लक्ष्य के लिए अथक प्रयास करते हैं। हम लोगों को आइवीएफ और भ्रूण विज्ञान के बारे में अधिक जानने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। निसंतानता से जूझ रहे जोड़ों के लिए, यह जानना महत्वपूर्ण है कि आइवीएफ एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है।