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    Home»विशेष»इंडी अलायंस में सात सीटों पर फंस सकता है पेंच
    विशेष

    इंडी अलायंस में सात सीटों पर फंस सकता है पेंच

    shivam kumarBy shivam kumarJuly 17, 2024No Comments8 Mins Read
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    विशेष
    इंडी अलायंस में सात सीटों पर फंस सकता है पेंच
    -राजद और कांग्रेस की अति महत्वाकांक्षा आ सकती है आड़े
    -कम से कम पांच सीटों पर झामुमो-कांग्रेस कर रहे हैं दावा
    -राजद का झामुमो-कांग्रेस के साथ दो सीटों पर होगा झकझूमर

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    अगले तीन-चार महीने में होनेवाले झारखंड विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। इस बार का विधानसभा चुनाव भी मुख्य रूप से दो गठबंधनों, सत्तारूढ़ इंडी अलायंस और विपक्षी एनडीए के बीच होने के आसार हैं। सत्तारूढ़ गठंबधन में झामुमो, कांग्रेस और राजद के साथ भाकपा माले भी है, जबकि एनडीए में भाजपा और आजसू है। दोनों गठबंधनों के घटक दल अपने-अपने हिसाब से सीटों पर दावे कर रहे हैं।

    एनडीए में यह काम आसान दिख रहा है, क्योंकि उसमें केवल दो घटक हैं, लेकिन इंडी अलायंस में इस मुद्दे पर पेंच फंसता हुआ दिखाई देने लगा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा अभी से पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुका है, तो कांग्रेस भी इस बार अधिक सीटों पर दावे कर रही है। उधर राजद भी इस बार बहुत अधिक झुकने के मूड में दिखाई नहीं दे रहा है। इन तीनों दलों के दावों के बीच कम से कम आठ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां यह पेंच कुछ गहरा ही नजर आने लगा है। अपने सहयोगियों के दावों से झामुमो के भीतर थोड़ी असहज स्थिति देखी जा रही है, जबकि कांग्रेस और राजद भी अभी तक कदम पीछे खींचने को तैयार नहीं हैं। इंडी अलायंस के घटक दलों के बीच उभरी इस महत्वाकांक्षा के कारण झारखंड का विधानसभा चुनाव बेहद रोमांचक होने के आसार नजर आने लगे हैं। क्या हैं इंडी अलायंस के घटक दलों के दावे और कौन-कौन सी सीट पर फंस सकता है पेंच, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    झारखंड में अगले तीन महीने में विधानसभा चुनाव होने की बढ़ती संभावनाओं के बीच दोनों गठबंधनों के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर मंथनों का दौर शुरू हो गया है। सीट शेयरिंग का मुद्दा सत्तारूढ़ इंडी अलायंस में थोड़ा पेंचीदा होने के आसार हैं, क्योंकि इसके घटक दलों के अपने-अपने दावे हैं। विपक्षी एनडीए के दो घटक दलों, भाजपा और आजसू के बीच इस मुद्दे पर कोई टकराव अब तक नहीं दिख रहा है। इसलिए जानकार बताते हैं कि सत्तारूढ़ इंडी अलायंस के सामने सीट शेयरिंग के पेंच को खोलना सबसे बड़ा चैलेंज है।

    क्या है इंडी अलायंस के घटक दलों का दावा
    झारखंड में इंडी अलायंस के सबसे बड़े दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने साफ कर दिया है कि वह विधानसभा चुनाव में न सिर्फ बड़े भाई की भूमिका में रहेगा, बल्कि उसकी चाहत 2019 विधानसभा चुनाव से अधिक सीटें पाने की भी है। झामुमो का कहना है कि वैसे तो सीट शेयरिंग पर फाइनल फैसला महागठबंधन के सभी दलों के बड़े नेता मिल बैठ कर करेंगे, लेकिन यह भी साफ है कि राज्य की राजनीति में ड्राइविंग सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा ही रहेगा। पार्टी का कहना है कि वह महागठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ता है और ज्यादा सीटें जीतता भी है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि महागठबंधन के सहयोगी दलों की धरातल पर क्या स्थिति है, उनकी जमीनी हकीकत क्या है और जीतने की किसकी कितनी संभावना है, यह सब ध्यान में रख कर सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय होगा। वैसे राज्य की जनता और कार्यकर्ताओं की इच्छा है कि 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में 2019 की अपेक्षा पार्टी ज्यादा मजबूती से चुनाव लड़े। ऐसे में कांग्रेस और राजद को विश्वास में लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगा।

    2024 के लिए क्या है झामुमो, कांग्रेस और राजद का दावा
    2019 के विधानसभा चुनाव में झामुमो ने 43 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 30 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि कांग्रेस 31 सीटों पर चुनाव लड़ कर 16 विधानसभा जीत पायी थी और राजद सात सीटों पर चुनाव लड़ कर महज एक सीट जीतने में सफल रहा था। झामुमो का स्ट्राइक रेट करीब 70 फीसदी रहा था, जबकि कांग्रेस का करीब 50 प्रतिशत। 2024 के विधानसभा चुनाव में झामुमो ने 55 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का मन बनाया है।
    उसके इस दावे के पीछे का मुख्य कारण यह है कि पिछली बार की स्ट्राइक रेट को देखते हुए इस बार वह अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति हासिल करना चाहता है। दूसरी तरफ कांग्रेस ने इस बार 33 सीटों पर दावा ठोका है, जबकि राजद ने 15 सीटों से कम पर समझौता नहीं करने की बात कही है।

    इन सीटों पर फंस सकता है पेंच
    झारखंड में कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच कम से कम पांच सीटों पर पेंच फंसने के पूरे आसार हैं, जबकि कम से कम दो सीटें ऐसी हैं, जहां राजद का कांग्रेस और झामुमो के साथ विवाद हो सकता है।
    कांग्रेस और झामुमो के बीच जिन सीटों पर विवाद होने के आसार हैं, उनमें पहली है भवनाथपुर विधानसभा सीट। परंपरागत रूप से यह सीट कांग्रेस की रही है, लेकिन इस बार झामुमो वहां से पूर्व विधायक अनंत प्रताप देव और जनाधार वाले नेता मो ताहिर को अपने खेमे में शामिल करा कर अपनी दावेदारी पेश सकता है। भवनाथपुर से फिलहाल भाजपा के भानु प्रताप शाही विधायक हैं। इसी तरह खूंटी जिले के अंतर्गत तोरपा विधानसभा सीट को लेकर झामुमो और कांग्रेस में मनमुटाव हो सकता है, क्योंकि इस सीट पर 2019 में झामुमो ने उम्मीदवार उतारा था और उसकी हार हो गयी थी। इस बार कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू यहां से चुनाव लड़ना चाहते हैं। खूंटी संसदीय क्षेत्र के तहत आनेवाले तोरपा विधानसभा क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुत बड़ी बढ़त मिली थी और यही उसके दावे का आधार है। रांची ऐसी तीसरी विधानसभा सीट है, जहां सीट शेयरिंग के दौरान कांग्रेस और झामुमो के बीच पेंच फंस सकता है। कांग्रेस रांची विधानसभा सीट को शहरी सीट बताते हुए अपना स्वाभाविक दावा बताती है, वहीं झामुमो 2019 में अपने बेहतरीन प्रदर्शन का हवाला देकर अपना दावा पुख्ता बताता है।

    रांची विधानसभा सीट से 2019 में झामुमो उम्मीदवार के रूप में महुआ माजी महज पांच हजार से कुछ अधिक मतों से चुनाव हारी थीं। वह दूसरे स्थान पर रही थीं। इसी तरह पोड़ैयाहाट भी एक ऐसी विधानसभा सीट है, जहां झामुमो और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग का मामला फंस सकता है। कांग्रेस का तर्क यह है कि 2019 में झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर यहां से जीते प्रदीप यादव कांग्रेस में शामिल हो गये हैं, इसलिए यह सीट कांग्रेस को मिलनी चाहिए, जबकि झामुमो का तर्क यह है कि 2019 में यह सीट उसके कोटे में थी। इसी तरह झामुमो की परंपरागत सीट मांडू विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस यह कह कर दावा कर रही है कि यहां से भाजपा के विधायक जयप्रकाश भाई पटेल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में मांडू से इस बार उसका प्रत्याशी उतरेगा। उधर मांडू झामुमो का गढ़ माना जाता है और अपने इस गढ़ को वह आसानी से कांग्रेस के लिए छोड़ देगा, इसकी संभावना बेहद कम है।

    इसी तरह कांग्रेस और राजद के बीच भी विश्रामपुर सीट को लेकर विवाद संभव है। राजद इस सीट को अपनी परंपरागत सीट मानता रहा है, लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में यह सीट कांग्रेस के खाते में चली गयी थी। अब राजद इस सीट को वापस चाहता है, तो दूसरी ओर कांग्रेस से पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी इस सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं। इसके अलावा झामुमो और राजद के बीच बरकट्ठा विधानसभा सीट को लेकर भी पेंच फंस सकता है। 2019 में यह सीट राजद के खाते में गयी थी, लेकिन इस बार पूर्व विधायक और आवास बोर्ड के चेयरमैन रहे जानकी यादव के झामुमो में शामिल हो जाने के बाद झामुमो अपना दावा इस सीट पर जतायेगा, इसकी पूरी संभावना है।

    इंडी अलायंस के घटक दलों के बीच इन दावों-प्रतिदावों को देख कर बहुत संभावना इस बात की है कि इस बार गठबंधन के बीच का सीट शेयरिंग फॉर्मूला तय करना थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता है, हालांकि यह भी तय है कि सीट शेयरिंग पर झामुमो का पलड़ा भारी रहेगा, क्योंकि कांग्रेस और राजद को यह अच्छी तरह पता है कि झामुमो की मदद के बिना उनका राजनीतिक बेड़ा पार नहीं हो सकता। झारखंड में झामुमो और भाजपा ही ऐसी पार्टी है, जो अपना शत-प्रतिशत वोट सहयोगी दलों में ट्रांसफर करा सकती हैं, बाकी दलों में यह स्थिति नहीं है। दूसरे दल अपने प्रत्याशी के लिए तो जी जान लगा देते हैं, लेकिन सहयोगी दल के प्रत्याशी के पक्ष में वे अपना वोट शत-प्रतिशत ट्रांसफर नहीं करा पाते।

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    shivam kumar

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